रहें सतर्क! लाइलाज है ये बीमारी, स्क्रीनिंग से जान सकते हैं पैदा होने वाला बच्चा तो नहीं है ग्रस्त
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एक व्यस्क को बच्चे की तरह व्यवहार करता देख बरबस मुंह से निकल जाता है कि यह तो मंदबुद्धि या स्पेशल चाइल्ड है। दरअसल, ऐसे लोग डाउन सिंड्रोम के शिकार होते हैं। चिंता की बात यह है कि इसके मामले बढ़ते जा रहे हैं। एसजीपीजीआई के मेटरनल हेल्थ एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ डिपार्टमेंट के आंकड़े बताते हैं कि हर महीने चार से पांच भ्रूण में डाउन सिंड्रोम के मामले सामने आ रहे हैं।
विभाग की प्रमुख डॉ. मंदाकिनी प्रधान कहती हैं कि हालांकि यह सुखद संकेत है कि लोग जागरूक होने लगे हैं। रोजाना 8 से 10 माता-पिता यह संशय लेकर आते हैं कि उनका बच्चा मंदबुद्धि तो नहीं है। डॉ. मंदाकिनी प्रधान के मुताबिक, इस लाइलाज बीमारी से बचने का एकमात्र जरिया है सजगता।
इस बीमारी का कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है, लेकिन जिस तरह के मामले आ रहे हैं, उसके आधार पर देर से शादी और अधिक उम्र में गर्भधारण को इसका कारण कहा जा सकता है। 35 साल से अधिक उम्र की गर्भवती में ऐसे मामले ज्यादा देखने में आ रहे हैं। खास बात है कि ये सभी मामले ऐसे हैं जिनके परिवार में डाउन सिंड्रोम बीमारी की कभी नहीं रही। पीजीआई के जेनेटिक डिपार्टमेंट की प्रो. एंड हेड डॉ. शुभा फड़के बताती हैं कि रोजाना 2-4 मामले डाउन सिंड्रोम की जांच के लिए आ रहे हैं।
बीमारी और इसके लक्षणों को जानें
डाउन सिंड्रोम जन्मजात गंभीर बीमारी है। सामान्यतया गर्भावस्था में भ्रूण को 46 क्रोमोजोम मिलते हैं, जिनमें से 23 माता व 23 पिता के होते हैं। जब यह 46 के बजाय 47 हो जाता है तो बच्चा ट्राइसोमी 21 या डाउन सिंड्रोम का शिकार होता है। पीड़ित का शारीरिक व मानसिक विकास सामान्य बच्चों की तरह से नहीं होता है।
पीड़ित बच्चे की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और वह सामान्य बच्चों से अलग व्यवहार करता है। बौद्धिक विकास धीमा होता है। इसके अलावा कान छोटा होना, चेहरा सपाट, आंखों का तिरछापन, जीभ बड़ी होना के अलावा रीढ़ की हड्डी भी विकृत सकती है।
गर्भवती का सवाल, मेरा बच्चा तो मेरे भाई की तरह नहीं होगा
राजधानी निवासी गर्भवती पीजीआई के मेटरनल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ डिपार्टमेंट में मां और डाउन सिंड्रोम पीड़ित भाई के साथ पहुंची। वह स्वस्थ थी, फिर भी उसे डर था कि कहीं उसका बच्चा भी उसके दोनों भाइयों की तरह तो नहीं होगा। हालांकि समय रहते जांच कराने से उसे इस डर से मुक्ति मिल गई।
डॉ. मंदाकिनी प्रधान बताती हैं कि पैदा होने वाला बच्चा मंदबुद्धि तो नहीं है, इसका पता लगाना आसान है। गर्भवती की स्क्रीनिंग जरूरी है। इसमें दो तरह की जांच होती है। एक है एनआईपीटी, जिसमें महज 8000 रुपये का खर्च आता है और दो सप्ताह में रिपोर्ट आ जाती है।
इसमें 12 हफ्ते का गर्भ होने पर मां के खून का नमूना लेकर जांच होती है। इस जांच की संवेदनशीलता 99 फीसदी है। दूसरा टेस्ट अल्ट्रासाउंड व खून जांच के आधार पर होता है और हाई व लो रिस्क पता करते हैं। इसकी रिपोर्ट आने में चार हफ्ते लगते हैं और परिणाम 80-85 प्रतिशत तक सही आते हैं। हाई रिस्क आने पर पक्की जांच कराएं और यदि डाउन सिंड्रोम निकलता है तो गर्भपात कराना चाहिए।