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मुख्तार अंसारीः आपराधिक किरदार, सियासी कारोबार, ... इस परिवार से है ताल्लुक
Sat, 29 Aug 2020 10:52 AM IST
पंकज श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Sat, 29 Aug 2020 10:52 AM IST
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मुख्तार अंसारी।
- फोटो : अमर उजाला।
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मुख्तार अंसारी! बड़ा आपराधिक किरदार, लेकिन उतने ही बड़े सियासी सरोकार। नाम लेते ही आंखों के सामने राजनेता के बजाय घूमने लगती है एक ऐसे शख्स की शक्ल जिसका नाम पूर्वांचल में ही नहीं बल्कि प्रदेश और देश के दूसरे राज्यों में घटने वाली बड़ी आपराधिक घटनाओं में चर्चा में आता रहा। जमीन पर कब्जा, अवैध निर्माण, हत्या, लूट, सहित अपराध की दुनिया के कुछ ही ऐसे काम होंगे, जिनसे मुख्तार का नाम न जुड़ा हो। पर, विरोधाभास देखिए कि लोगों के जेहन में खौफ पैदा कर देने वाला नाम विधानसभा में पूर्वांचल की मऊ सीट से लगातार लोगों की पहली पसंद बनकर पांचवीं बार विधायक है।
जानकारी के मुताबिक, मुख्तार पर अब तक 46 आपराधिक मामले दर्ज हुए। इनमें 6 सिर्फ मऊ में दर्ज हुए। बताया जाता है कि इनमें ज्यादातर में वह बरी भी हो चुका है। मुख्तार के सफर पर नजर डालें तो वह और उनका परिवार तमाम विरोधाभास का भी प्रतीक बनकर उभरता है। जिस परिवार के सदस्य की मौजूदगी लोगों को दहशत में डाल देती है, उस परिवार के पास आजादी के पहले कांग्रेस की अध्यक्षी रही है।
बड़ी राजनीतिक पृष्ठभूमि
अतीत के पन्नों पर नजर डालें तो ताज्जुब होता है कि इतने बड़े परिवार के सदस्य की इतनी कुख्यात छवि। मुख्तार के दादा डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह गांधी जी के साथ हमेशा खड़े रहे और 1926-27 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। मुख्तार अंसारी के नाना ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को 1947-48 की लड़ाई में मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। गाजीपुर में साफ-सुथरी छवि रखने वाले और कम्युनिस्ट बैकग्राउंड से आने वाले मुख्तार के पिता सुभानउल्ला अंसारी स्थानीय राजनीति में प्रभावी और प्रतिष्ठित नाम थे।
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जानकारी के मुताबिक, मुख्तार पर अब तक 46 आपराधिक मामले दर्ज हुए। इनमें 6 सिर्फ मऊ में दर्ज हुए। बताया जाता है कि इनमें ज्यादातर में वह बरी भी हो चुका है। मुख्तार के सफर पर नजर डालें तो वह और उनका परिवार तमाम विरोधाभास का भी प्रतीक बनकर उभरता है। जिस परिवार के सदस्य की मौजूदगी लोगों को दहशत में डाल देती है, उस परिवार के पास आजादी के पहले कांग्रेस की अध्यक्षी रही है।
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बड़ी राजनीतिक पृष्ठभूमि
अतीत के पन्नों पर नजर डालें तो ताज्जुब होता है कि इतने बड़े परिवार के सदस्य की इतनी कुख्यात छवि। मुख्तार के दादा डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह गांधी जी के साथ हमेशा खड़े रहे और 1926-27 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। मुख्तार अंसारी के नाना ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को 1947-48 की लड़ाई में मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। गाजीपुर में साफ-सुथरी छवि रखने वाले और कम्युनिस्ट बैकग्राउंड से आने वाले मुख्तार के पिता सुभानउल्ला अंसारी स्थानीय राजनीति में प्रभावी और प्रतिष्ठित नाम थे।
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ऐसे हुई बड़ी शुरुआत
इतनी समृद्ध राजनीतिक विरासत से आने वाले मुख्तार पर मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट) और गैंगस्टर एक्ट के तहत भी मुकदमे कायम हुए। वर्ष 1996 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचने वाले मुख्तार ने 2002, 2007, 2012 और फिर 2017 में भी बसपा के टिकट पर मऊ से जीत हासिल की। इनमें से 2007, 2012 और 2017 के चुनाव उन्होंने जेल में रहते हुए लड़े। 2017 में उन्होंने अपने पुत्र को भी चुनाव लड़ाया, लेकिन वह जीत नहीं सका। बताते हैं कि 80 और 90 के दशक में अपने चरम पर रहे आपराधिक दुनिया के बड़े नाम बृजेश सिंह और मुख्तार का गैंगवार गाजीपुर से शुरू हुआ था ।
मुख्तार का अपराध की दुनिया में पहली बार 1988 में मंडी परिषद की ठेकेदारी को लेकर स्थानीय ठेकेदार सच्चिदानंद राय की हत्या के मामले में नाम आया। फिर त्रिभुवन सिंह के भाई कांस्टेबल राजेंद्र सिंह की हत्या का आरोप भी उन पर लगा। उधर, तब तक बृजेश सिंह का नाम भी पूर्वांचल में तमाम सरकारी ठेकों पर भी कब्जेदारी को लेकर आने लगा था।
इसी प्रतिस्पर्धा में मुख्तार के गैंग से उनका टकराव हुआ। यहीं से बृजेश सिंह के साथ उनकी दुश्मनी शुरू हो गई। पहली बार वह 1991 में पुलिस की गिरफ्त में आया। पुलिस जब उसे लेकर जा रही थी तो वह फरार हो गया। इस दौरान दो पुलिस कर्मी मारे गए। इनकी हत्या का आरोप भी मुख्तार पर लगा। इसके बाद मुख्तार का नाम सरकारी ठेकों, शराब के ठेकों, कोयला के काले कारोबार में आने लगा। उस पर 1996 में एएसपी उदय शंकर पर जानलेवा हमले का भी आरोप लगा।
मुख्तार का अपराध की दुनिया में पहली बार 1988 में मंडी परिषद की ठेकेदारी को लेकर स्थानीय ठेकेदार सच्चिदानंद राय की हत्या के मामले में नाम आया। फिर त्रिभुवन सिंह के भाई कांस्टेबल राजेंद्र सिंह की हत्या का आरोप भी उन पर लगा। उधर, तब तक बृजेश सिंह का नाम भी पूर्वांचल में तमाम सरकारी ठेकों पर भी कब्जेदारी को लेकर आने लगा था।
इसी प्रतिस्पर्धा में मुख्तार के गैंग से उनका टकराव हुआ। यहीं से बृजेश सिंह के साथ उनकी दुश्मनी शुरू हो गई। पहली बार वह 1991 में पुलिस की गिरफ्त में आया। पुलिस जब उसे लेकर जा रही थी तो वह फरार हो गया। इस दौरान दो पुलिस कर्मी मारे गए। इनकी हत्या का आरोप भी मुख्तार पर लगा। इसके बाद मुख्तार का नाम सरकारी ठेकों, शराब के ठेकों, कोयला के काले कारोबार में आने लगा। उस पर 1996 में एएसपी उदय शंकर पर जानलेवा हमले का भी आरोप लगा।
...और तेज हो गई गैंगवार
मुख्तार पहली बार 1996 में बसपा के टिकट पर मऊ से विधायक चुना गया। उस पर 1997 में पूर्वांचल के बड़े कोयला व्यवसायी रुंगटा के अपहरण का आरोप लगा । इसी बीच भाजपा नेता कृष्णानंद राय राजनीतिक शख्सियत बनकर उभरने लगे। बताया जाता है कि बृजेश ने भी उनकी मदद की।
भाजपा ने उन्हें 2002 में गाजीपुर की मोहम्मदाबाद सीट से चुनाव लड़ाया। वह जीत गए। उन्होंने 1985 से अंसारी परिवार के पास रही गाजीपुर की मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट को 17 साल बाद उनके परिवार से छीन लिया। मुख्तार के बड़े भाई अफजाल चुनाव हार गए। पर, कृष्णानंद राय विधायक के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। तीन साल बाद उनकी हत्या कर दी गई। क्रिकेट मैच का उद्घाटन करके वापस लौट रहे कृष्णानंद राय की गाड़ी को घेरकर अंधाधुंध फायरिंग की गई। राय के साथ गाड़ी में मौजूद सभी लोग मारे गए ।
भाजपा ने उन्हें 2002 में गाजीपुर की मोहम्मदाबाद सीट से चुनाव लड़ाया। वह जीत गए। उन्होंने 1985 से अंसारी परिवार के पास रही गाजीपुर की मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट को 17 साल बाद उनके परिवार से छीन लिया। मुख्तार के बड़े भाई अफजाल चुनाव हार गए। पर, कृष्णानंद राय विधायक के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। तीन साल बाद उनकी हत्या कर दी गई। क्रिकेट मैच का उद्घाटन करके वापस लौट रहे कृष्णानंद राय की गाड़ी को घेरकर अंधाधुंध फायरिंग की गई। राय के साथ गाड़ी में मौजूद सभी लोग मारे गए ।