‘वेटिकन सिटी के पोप बन सकते थे राजा महेंद्र’
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दुनिया को ‘एक ग्राम’ की नजर से देखने वाले जाट किंग राजा महेंद्र प्रताप ने सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन उन्हें जमीन के टुकड़े में समेट दिया जाएगा। आज राजा महेंद्र की 128वीं जयंती पर पर भले ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के परिसर में रैली या सेमिनार न हो, पर राजा के नाम पर हो रही सियासत ने उनके कुछ करीबियों को हस्तक्षेप पर मजबूर कर दिया।
वे मानते हैं कि युवा पीढ़ी को ये जानना जरूरी है कि राजा महेंद्र सिर्फ एएमयू की तीन एकड़ जमीन तक ही सीमित नहीं थे, वे उससे कहीं ज्यादा विशाल व्यक्तित्व थे। राजा महेंद्र के काफी करीबी रहे स्वर्णकेतु भारद्वाज उन्हीं चंद लोगों में हैं, जो लंबे समय तक राजा की जिंदगी के गवाह बने रहे।
राजा महेंद्र पर हो रही सियासत से क्षुब्ध भारद्वाज याद करते हैं, ‘जो लोग राजा को उस तीन एकड़ जमीन से ही जानते हैं, उन पर तरस आती है। उन्हें पता होना चाहिए कि राजा महेंद्र ने वृंदावन के अपने महल और उसकी 250 एकड़ जमीन पर देश में टेक्निकल एजुकेशन के लिए प्रेम महा विद्यालय की स्थापना 1907 के आसपास करवाई थी। 1909 में यहां नियमित पढ़ाई शुरू हो गई।’
भारद्वाज सवाल उठाते हैं कि क्या ये लोग प्रेम महा विद्यालय में जाकर उनकी जयंती नहीं मना सकते, क्या इन लोगों को म़थुरा के केसरी घाट पर उनकी समाधि की बदहाल सूरत नहीं नजर आत़ी, क्या इनको नहीं पता कि राजा महेंद्र ने अलीगढ़ के ही टीकाराम कॉलेज में हिंदू-मुस्लिम विवाह की बात रखी थी?
नेहरू से पहले टेक्निकल एजुकेशन की जरूरत समझी
भारद्वाज कहते हैं कि एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं और उन्हें राजा महेंद्र की ही याद नहीं आ रही। बकौल भारद्वाज, राजा महेंद्र ने नेहरू से कहीं पहले टेक्निकल एजुकेशन की जरूरत समझी थी और मदन मोहन मालवीय को यह कहकर स्थापना पूजा में शामिल किया था कि उनके बेटे का जन्मदिन है।
बाद में मालवीय के पूछने पर उन्होंने बताया कि प्रेम महा विद्यालय उनका बेटा है। भारद्वाज बताते हैं कि इसके लिए राजा महेंद्र ने वेनिस से महल के लिए मंगवाया फर्नीचर और योकोहामा से मंगाए अपने पसंदीदा पौधे तक दे दिए थे। महात्मा गांधी से लेकर नेहरू, रबींद्रनाथ टैगोर, सीएफ एंड्रयूज और शिव प्रसाद गुप्ता जैसे लोग इस विचार से बहुत प्रभावित थे।
कृष्ण रीति के साधक और बौद्ध स्वभाव वाले राजा महेंद्र सिंह की छवि दुनियाभर में एक बेहद सौम्य और प्रभावी व्यक्तित्व की थी। भारद्वाज बताते हैं कि राजा महेंद्र ने आजादी के लिए खासा संघर्ष किया। बकौल भारद्वाज, ‘उनका योगदान महात्मा गांधी या सुभाष चंद्र बोस से कतई कम नहीं था।
उन्होंने ही अफगानिस्तान में आजाद हिंद सरकार बनवाई थी और मौलवी बरखतुल्ला को प्रधानमंत्री बनाकर खुद राष्ट्रपति बने थे। उनके क्त्रसंतिकारी विचारों के चलते ही रूस के राष्ट्राध्यक्ष लेनिन से उनकी अच्छी दोस्ती थी और लेनिन ने राजा को सोने की कुर्सी भी भेंट की थी।’
नेहरू और राजेंद्र प्रसाद खड़े हो जाते थे उनके सम्मान में
भारद्वाज बताते हैं कि राजा की शख्सियत किसी जमीन, जायदाद, जाति, धर्म या पंथ से कहीं बढ़कर थी। वे एकईश प्रार्थना, धार्मिक समभाव और अंखड विश्व की बात करते थे।
भारद्वाज याद करते हैं, ‘एक बार राजा महेंद्र ने खुद बताया था कि उन्हें वेटिकन सिटी का पोप बनाने पर विचार हो रहा था, दुनिया के कई बड़े धार्मिक गुरु राजा को मना रहे थे पर उन्होंने खुद को किसी पदवी से दूर रखा था। शर्म की बात है कि लोग उन्हें चंद एकड़ जमीन के टुकड़े से बांध दे रहे हैं।’
वैश्विक एकता के लिए राजा ने वर्ल्ड फेडरेशन बनाई, जिसकी मूल परिकल्पना के आधार पर ही यूनाइटेड नेशन का गठन किया गया था। राजा महेंद्र का सम्मान भारतीय राजनेता भी बखूबी करते थे।
भारद्वाज याद करते हैं, ‘राजा महेंद्र ने कई बार अपनी राष्ट्रीय यात्राओं में मुझे साथ ले गए। मैंने देखा कि नेहरू और राजेंद्र प्रसाद जैसे लोग भी उनके सम्मान में कुर्सी छोड़कर खड़े हो जाते थे। उनका सम्मान महात्मा गांधी से कम नहीं था।’
भारद्वाज यह भी बताते हैं कि राजा महेंद्र प्रताप ने ही पंचायती राज व्यवस्था की बात गांधीजी से की थी। उनका मानना था कि पंचायती राज व्यवस्था के जरिए ही सत्ता की असली शक्ति आम आदमी के हाथ में हो सकती है और इससे भ्रष्टाचार भी कम होगा।
जानें, क्या है विवाद:
दरअसल, राजा महेंद्र प्रताप अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़े थे और उन्होंने करीब तीन एकड़ जमीन विश्वविद्यालय को दान की थी। इस पर भाजपा ने पिछले दिनों ऐलान किया कि विश्वविद्यालय परिसर में राजा महेद्र प्रताप के जन्मदिवस पर कार्यक्रम आयोजित होगा।
विपक्षी राजनीतिक दल और स्टूडेंट यूनियन वाइस चांसलर ले. जनरल जमीरउद्दीन शाह ने कैंपस में सांप्रदायिक तनाव केडर से मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को पत्र लिखकर मांगी मदद।
कुछ अन्य रोचक तथ्य---
-राजा महेंद्र का जन्म अलीगढ़ में 1 दिसंबर, 1886 को हाथरस केराजा घनश्याम सिंह बहादुर मुरसान के तीसरे बेटे केरूप में हुआ था।
-राजा महेंद्र ने आजादी के पहले ही दुनिया के सभी बड़े देशों की यात्रा कर ली।
-आजादी के आंदोलन में राजा महेंद्र प्रताप की भूमिका बेहद सशक्त थी। वे अकेले बड़े नेता थे, जो विश्व युद्ध के बाद भारत लौट सके। सभी राष्ट्राध्यक्षों ने उन्हें राजनीतिक शख्सीयत नहीं बताया।
-भारत जब आजाद हुआ तभी राजा महेंद्र प्रताप की आत्मकथा ‘माई लाइफ स्टोरी ऑफ फिफ्टी फाइव ईयर्स’ प्रकाशित हुई। इसकी कीमत महज 6 रुपये थी।
अटल बिहारी वाजपेयी को दी थी करारी मात
-1957 के लोकसभा चुनाव में राजा महेंद्र ने मथुरा से चुनाव लड़ा और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को बुरी तरह हराया।
-राजा की शादी जींद (पंजाब रियासत) की महारानी से हुई। राजा ने अपने बेटे का नाम प्रेम और बेटी का नाम भक्ति रखा। रानी की मृत्यु 1925 में ही हो गई। राजा महेंद्र की मृत्यु 29 अप्रैल, 1979 को हुई।
कौन हैं स्वर्णकेतु भारद्वाज?
सन् 1939 में मथुरा में जन्मे स्वर्णकेतु भारद्वाज ने पत्रकारिता की शुरुआत अमर उजाला दैनिक के साथ की और उसी दौरान राजा महेंद्र के जीवन से बहुत प्रभावित हुए। उसी दौरान उन्होंने राजा महेंद्र से मुलाकात की। उसके बाद मथुरा से ब्रज आंदोलन की शुरुआत की, फिर राजा महेंद्र से मुलाकातें बढ़ीं।
भारद्वाज ने ब्रज प्रदेश नाम से साप्ताहिक अखबार शुरू किया। आपातकाल के दौरान जेल भी गए। चौधरी चरण सिंह, मोरार जी देसाई व राजीव गांधी से भी काफी अच्छे रिश्ते रहे। धनबल के दौर में हाशिए पर पहुंच गए। फिलहाल, लखनऊ के इंदिरा नगर में एक किराए के कमरे में रहते हैं।