बाराबंकी : कांग्रेस की आंधी में रामसेवक ने जलाई थी समाजवाद की मशाल, नेहरू व इंदिरा भी मानते थे लोहा
दिग्गजों के बीच संसदीय दल के नेता बाराबंकी के बाबू रामसेवक यादव बनाए गए थे। उनका परिवार अब राजनीतिक रूप से हाशिये पर है। कहा जाता है कि समाजवादी पार्टी के नेता जिस घर से दिया बाती लेकर गए थे उसी में उजाला करना भूल गए।
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जवाहरलाल नेहरू व डॉ. राम मनोहर लोहिया के करीबी रामसेवक यादव का राजनीति में बड़ा कद रहा। कांग्रेस की आंधी में भी उन्होंने समाजवाद की मशाल जलाई रखी। नेहरूजी बीच सदन उन्हें अपना नेता मानते थे। रामसेवक यादव का जन्म दो जुलाई 1926 को हैदरगढ़ इलाके के ताला रुक्नुद्दीनपुर में हुआ था। वर्ष 1952 में जब कांग्रेस से मुकाबला करने के लिए डॉ. राम मनोहर लोहिया ने सोशलिस्ट पार्टी बनाई तो बाराबंकी से रामसेवक यादव को प्रत्याशी बनाया गया। वह चुनाव हार गए, लेकिन 1955 के विधानसभा उपचुनाव में रामसेवक पहली बार रामनगर के विधायक बने।
1957 में रामसेवक यादव निर्दलीय सांसद बने। इसके बाद 1962 और 1967 में सोशलिस्ट पार्टी से सांसद चुने गए। 1974 में वह रुदौली से तो पत्नी पार्वती देवी बाराबंकी से विधायक बनीं। रामसेवक यादव ने समाजवादी विचारधारा को इतना मजबूत किया कि मुलायम सिंह यादव उन्हें अपना गुरु मानते थे। वर्ष 1954 में सोशलिस्टों द्वारा जमींदारी उन्मूलन के लिए विधानसभा घेराव किया गया तो बाबू रामसेवक को फैजाबाद, गोंडा, बाराबंकी जिलों का नेतृत्व मिला।
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तब लखनऊ से बाराबंकी तक 75 हजार से अधिक प्रदर्शनकारी उनकी अगुवाई में शामिल हुए। उनके राजनीतिक प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि डॉ. राम मनोहर लोहिया, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडीस और किशन पटनायक जैसे दिग्गज लोगों ने रामसेवक यादव को ही संसदीय दल का नेता बनाया। 1967 के लोकसभा चुनाव में रामसेवक यादव का प्रभाव देखकर कांग्रेस उम्मीदवार हुसैन कामिल किदवई के प्रचार के लिए इंदिरा गांधी को खुद बाराबंकी आना पड़ा था।
पुत्र और पौत्र को नहीं मिला मौका, हाशिए पर परिवार
बाबू राम सेवक यादव एक ऐसे नेता थे जिनका जुड़ाव जन-जन से था। गांव में उनके पड़ोसी 90 साल के राम जियावन यादव बताते हैं कि बाबू जी कोसों पैदल चलकर वोट मांगते थे। बस या ट्रेन से दिल्ली जाते थे। राम सेवक के इकलौते बेटे अमिताभ यादव है जो केंद्रीय विद्यालय में बाबू के पद से रिटायर हो चुके हैं। भाई प्रदीप यादव विधायक रहे तो भतीजे अरविंद कुमार यादव एमएलसी। उनके पौत्र हिमांशु यादव ने कई बार पार्टी से एमएलसी और विधायक पद का टिकट मांगा, मगर नहीं मिला। वर्तमान में परिवार राजनीति में हाशिए पर है। पौत्र हिमांशु यादव तो कहते हैं कि समाजवादी पार्टी के नेता जिस घर से दिया बाती लेकर गए थे उसी में उजाला करना भूल गए।