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मोबाइल के बिना आपका बच्चा बेचैन हो उठे तो हो जाएं सावधान, अभिभावक इन बातों पर दें ध्यान
Fri, 19 Apr 2019 04:59 PM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Fri, 19 Apr 2019 04:59 PM IST
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केस 1
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हरदोई निवासी 14 वर्षीय छात्र ने हाईस्कूल में 70 फीसदी अंक प्राप्त किए, लेकिन 11वीं में फेल हो गया। उसकी आए दिन शिकायत मिलने लगी कि कक्षा में सो जाता है। इस पर परिवारीजन उसे केजीएमयू की पीयूटी क्लीनिक लेकर आए। यहां प्रो. पीके दलाल ने उसकी काउंसलिंग की। इस दौरान पता चला कि वह रात में पिता का मोबाइल अपने कमरे में रख लेता था। इसके बाद रातभर वीडियो देखता रहता है। खाना खाकर कक्षा में जाने पर उसे नींद आ जाती थी। दिनभर उसके दिमाग में पढ़ाई के बजाय वीडियो के दृश्य चलते थे। प्रो. दलाल ने उसे समझाया कि बाद में वह गंभीर बीमारी का शिकार हो सकता है। कुछ दवाएं दी। इस बार वह फॉलोअप में आया तो पूरी तरह से ठीक हो गया। अब वह अभिभावकों के सामने ही मोबाइल का इस्तेमाल करता है।
केस 2
राजधानी निवासी 10 का छात्र दिनभर मोबाइल पर कुछ न कुछ करता रहता है। परिवारीजन पढ़ाई के लिए कहते तो आक्रोशित हो जाता। उसे लगातार सिरदर्द और बेचैनी रहने लगी। आधी रात को नींद खुल जाती तो भी वह मोबाइल लेकर बैठ जाता। इस पर परिवारीजनों ने उसे केजीएमयू में दिखाया। यहां काउंसलिंग के दौरान छात्र ने स्वीकार किया कि सोने के दौरान भी उसके दिमाग में यह बात कौंधती रहती है कि कोई न कोई मेसेज आया होगा। उसे देखने के लिए वह आधी रात को उठकर मोबाइल चेक करता है। चिकित्सकों ने सिरदर्द और बेचैनी की दवाएं दीं। उसकी काउंसलिंग की। मोबाइल के इस्तेमाल का तरीका बताया। अब उसकी स्थिति में सुधार आ रहा है।
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यदि आपका बच्चा अचानक रात में उठकर मोबाइल चेक करने लगता है। मोबाइल उसके कमरे से हटा देने पर उसे बेचैनी होती है। सिर में दर्द बना रहता है। उसके अंकर अब लगातार कम हो रहे हो। वह रात में मोबाइल छुपाकर रखता है और सबके सो जाने पर उस पर चैटिंग या वीडियो देखता है तो सावधान हो जाएं।
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काउंसलिंग की है जरुरत
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ऐसे बच्चे प्राब्लमेटिक यूज ऑफ टेक्नोलॉजी के शिकार हैं। इन बच्चों को केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग की ‘क्लीनिक फॉर प्रॉब्लमेटिक यूज ऑफ टेक्नोलॉजी ’(पीयूटी) में दिखाएं। यहां हर गुरुवार को विभागाध्यक्ष प्रो. पीके दलाल और उनकी टीम इन मरीजों को देखती और दवाओं के साथ काउंसलिंग करती है।
इन दिनों हर हाथ में मोबाइल और इंटरनेट पहुंच गया है। बच्चे एवं कि शोर इनका इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा कर रहे हैं। वे पढ़ाई के बजाय इंटरनेट पर दूसरी चीजें तलाशने में जुटे रहते हैं, जो धीरे-धीरे उन्हें मानसिक रूप से बीमार बना देता है।
ऐसे लोगों के इलाज के लिए केजीएमयू में क्लीनिक फॉर प्राब्लमेटिक यूज ऑफ टेक्नोलॉजी खोली गई है। चार अप्रैल से हर गुरुवार को यहां मरीज देखे जा रहे हैं। अभी इस क्लीनिक में तीन से पांच मरीज आ रहे हैं। प्रो. दलाल ने बताया कि इसमें दवा से कहीं ज्यादा काउंसलिंग की जरूरत है।
मोबाइल के लती बच्चों को अभिभावक डांटने और पीटने के बजाय समझाएं। खुद भी उनकी काउंसलिंग करें। यदि इसके बाद भी बच्चा नहीं समझ रहा है तो क्लीनिक लेकर आएं। यहां उसका मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया जाएगा। जिद के वक्त उनका व्यवहार कैसा रहता है, इसका आकलन किया जाएगा। फिर कुछ दवाएं भी दी जाती है।
इन दिनों हर हाथ में मोबाइल और इंटरनेट पहुंच गया है। बच्चे एवं कि शोर इनका इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा कर रहे हैं। वे पढ़ाई के बजाय इंटरनेट पर दूसरी चीजें तलाशने में जुटे रहते हैं, जो धीरे-धीरे उन्हें मानसिक रूप से बीमार बना देता है।
ऐसे लोगों के इलाज के लिए केजीएमयू में क्लीनिक फॉर प्राब्लमेटिक यूज ऑफ टेक्नोलॉजी खोली गई है। चार अप्रैल से हर गुरुवार को यहां मरीज देखे जा रहे हैं। अभी इस क्लीनिक में तीन से पांच मरीज आ रहे हैं। प्रो. दलाल ने बताया कि इसमें दवा से कहीं ज्यादा काउंसलिंग की जरूरत है।
मोबाइल के लती बच्चों को अभिभावक डांटने और पीटने के बजाय समझाएं। खुद भी उनकी काउंसलिंग करें। यदि इसके बाद भी बच्चा नहीं समझ रहा है तो क्लीनिक लेकर आएं। यहां उसका मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया जाएगा। जिद के वक्त उनका व्यवहार कैसा रहता है, इसका आकलन किया जाएगा। फिर कुछ दवाएं भी दी जाती है।
मानसिक विकार है ऑनलाइन गेम
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क्लीनिक में काउंसलिंग के साथ साइकोथेरैपी के माध्यम से इंटरनेट और टेक्नोलॉजी की लत छुड़ाने और इसके प्रबंधन की तरकीब बताई जाती है। करीब पांच फीसदी लोग टेक्नोलॉजी एडिक्शन के शिकार होते हैं। इन्हें समझाने की जरूरत होती है। मोबाइल छिनना समस्या का समाधान नहीं है।
ऑनलाइन गेम को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जून 2018 में मानसिक विकार माना है। टेक्नोलॉजी या इंटरनेट का प्रयोग गलत नहीं है, लेकिन उसका इस्तेमाल कितना कर रहे हैं, इसका आकलन जरूरी है। देश में 493 मिलियन इंटरनेट या ब्रॉडबैंड ग्राहक हैं।
भारत में लगभग 28 फीसदी शहरी और 26 फीसदी ग्रामीण जनसंख्या है। 9 फीसदी उपयोगकर्ता प्रति वर्ष बढ़ रहे हैं। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट कहती है कि देश में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले 12 फीसदी लोग इंटरनेट की लत की समस्या से पीड़ित हैं।
ऑनलाइन गेम को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जून 2018 में मानसिक विकार माना है। टेक्नोलॉजी या इंटरनेट का प्रयोग गलत नहीं है, लेकिन उसका इस्तेमाल कितना कर रहे हैं, इसका आकलन जरूरी है। देश में 493 मिलियन इंटरनेट या ब्रॉडबैंड ग्राहक हैं।
भारत में लगभग 28 फीसदी शहरी और 26 फीसदी ग्रामीण जनसंख्या है। 9 फीसदी उपयोगकर्ता प्रति वर्ष बढ़ रहे हैं। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट कहती है कि देश में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले 12 फीसदी लोग इंटरनेट की लत की समस्या से पीड़ित हैं।
यहां देखें. लक्षण
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ये हैं लक्षण
- बच्चा लगातार इंटरनेट का प्रयोग करता रहे। वह मोबाइल के लिए बेचैन रहे।
- चिड़चिड़ा होने के साथ ही कंधे, गले के पास दर्द की शिकायत करने लगे।
- रात में सभी सो जाएं तो भी मोबाइल पर चैटिंग या गेम खेलता रहे।
- घर से कोई सामान चोरी करने लगे।
- किसी बात के लिए टोकने पर अचानक भावुक होकर रोने लगे।
- पढ़ाई में मन न लगे। उसके अकों में लगातार गिरावट आने लगे।
- बाहर आना-जाना पूरी तरह से बंद कर दे।
- दोस्तों से उसकी दूरी बढ़ने लगे और मोबाइल पर ज्यादा समय देने लगे
- बच्चा लगातार इंटरनेट का प्रयोग करता रहे। वह मोबाइल के लिए बेचैन रहे।
- चिड़चिड़ा होने के साथ ही कंधे, गले के पास दर्द की शिकायत करने लगे।
- रात में सभी सो जाएं तो भी मोबाइल पर चैटिंग या गेम खेलता रहे।
- घर से कोई सामान चोरी करने लगे।
- किसी बात के लिए टोकने पर अचानक भावुक होकर रोने लगे।
- पढ़ाई में मन न लगे। उसके अकों में लगातार गिरावट आने लगे।
- बाहर आना-जाना पूरी तरह से बंद कर दे।
- दोस्तों से उसकी दूरी बढ़ने लगे और मोबाइल पर ज्यादा समय देने लगे
इन बातों पर दें ध्यान
प्रो. पीके दलाल
- फोटो : amar ujala
अभिभावक ऐसा करें
- इस बात पर निगरानी करें कि बच्चा मोबाइल व इंटरनेट का प्रयोग पढ़ाई के लिए कर रहा है या किसी और चीज के लिए।
- गेमिंग या चैटिंग में कितना वक्त देता है और पढ़ाई में कितना, इसकी निगरानी करें।
- बच्चे को प्यार से समझाएं। उसके साथ मारपीट न करें।
- सुधार नहीं होने पर केजीएमयू की क्लीनिक में ले आएं।
- क्लीनिक आते वक्त इस बात को मन से निकाल दें कि उनका बच्चा मानसिक रूप से बीमार हो गया है।
कभी भी आ सकते हैं मरीज
क्लीनिक गुरुवार को चलती है, लेकिन मरीज कभी भी आकर कार्यालय में पंजीयन करा सकते हैं। मानसिक रोग विभाग में बच्चों को लेकर आने में अभिभावक संकोच करते हैं, जो गलत है। बच्चा मोबाइल पर क्या देख, पढ़ रहा है, इसकी निगरानी करने की जरूरत है। क्लीनिक में अभी तक जो मरीज आए हैं, वे काफी गंभीर किस्म के थे, लेकिन काउंसलिंग शुरू होने से वे सुधर जाएंगे। पहले दिन की ओपीडी में आए दोनों मरीजों की हालत में सुधार है। - प्रो पीके दला
- इस बात पर निगरानी करें कि बच्चा मोबाइल व इंटरनेट का प्रयोग पढ़ाई के लिए कर रहा है या किसी और चीज के लिए।
- गेमिंग या चैटिंग में कितना वक्त देता है और पढ़ाई में कितना, इसकी निगरानी करें।
- बच्चे को प्यार से समझाएं। उसके साथ मारपीट न करें।
- सुधार नहीं होने पर केजीएमयू की क्लीनिक में ले आएं।
- क्लीनिक आते वक्त इस बात को मन से निकाल दें कि उनका बच्चा मानसिक रूप से बीमार हो गया है।
कभी भी आ सकते हैं मरीज
क्लीनिक गुरुवार को चलती है, लेकिन मरीज कभी भी आकर कार्यालय में पंजीयन करा सकते हैं। मानसिक रोग विभाग में बच्चों को लेकर आने में अभिभावक संकोच करते हैं, जो गलत है। बच्चा मोबाइल पर क्या देख, पढ़ रहा है, इसकी निगरानी करने की जरूरत है। क्लीनिक में अभी तक जो मरीज आए हैं, वे काफी गंभीर किस्म के थे, लेकिन काउंसलिंग शुरू होने से वे सुधर जाएंगे। पहले दिन की ओपीडी में आए दोनों मरीजों की हालत में सुधार है। - प्रो पीके दला