जब रेडियो की मदद से शास्त्री जी ने अंग्रेजों से लड़ने का बनाया प्लान, पढ़ें पूरा वाक्या
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लाल बहादुर शास्त्री यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष थे। उनकी पहल पर सबसे पहले ट्रांसमीटर के प्रयोग से रेडियो के जरिये अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का आह्वान किया गया। शास्त्रीजी ने रफी अहमद किदवई से इस बारे में गुफ्तगू की। निश्चित तारीख पर दोनों दिल्ली पहुंचे।
श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल, चौधरी चरण सिंह, जगन प्रसाद रावत और प्रो. राधेश्याम शर्मा के साथ मीटिंग हुई। ‘क्रांति आंदोलन : कुछ अधखुले पन्ने’ में संस्मरण है, इन लोगों ने तय किया कि शिकागो रेडियो एंड टेलीफोन कंपनी, मुंबई के मालिक मोटवाणी से ट्रांसमीटर लेकर लगाया जाए, जिससे देशवासियों को तुरंत कोई संदेश दिया जा सके।
मोटवाणी गांधी, पटेल, नेहरू, मौलाना आजाद आदि की सभाओं के लिए मुफ्त में माइक्रोफोन, लाउडस्पीकर देते थे। इसीलिए वह अंग्रेजों की आंख में खटक रहे थे। गुप्तचर विभाग की ‘संदिग्ध व्यक्तियों की सूची’ में उनका भी नाम था।
चिट्ठियां भी होती थीं सेंसर
उनकी निगरानी भी होती थी। पर, सबूत न होने से अंग्रेज कुछ कर नहीं पा रहे थे। एक दिन रफी अहमद किदवई ने जगन प्रसाद रावत को मुंबई जाने का रेल टिकट देते हुए मोटवाणी के पास भेजा। एक चिट्ठी भी भेजी, जिसमें लिखा था,‘अमुक जरूरी दवा फौरन भिजवा दो।’
मोटवाणी को पत्र मिला तो उन्होंने रफी साहब को लताड़ लगाते हुए पत्र लिख दिया, ‘मुझे जो करना है मैं स्वयं करूंगा। आपकी सलाह से नहीं। काम हो जाने पर बता दूंगा। कुछ दिन बाद मोटवाणी ने मुंबई में गुप्त ट्रांसमीटर लगवा दिया।
समाजवादी अच्युत पटवर्धन और उनकी सहयोगिनी फिल्म अभिनेत्री अरुणा बनर्जी (अरुणा आसफ अली) को जिम्मेदारी सौंपकर शास्त्री व किदवई को उसका नंबर भिजवा दिया, जिस पर संदेश प्रसारित होने लगे।’