जिस मुख्यमंत्री के सीने में दफन हो गया नेताजी सुभाष चंद्र बोस का राज
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इंग्लैंड में 1945 के आम चुनावों में लेबर पार्टी के क्लीमेंट एटली प्रधानमंत्री बने। इन्होंने ही ब्रिटिश पार्लियामेंट में भारत का स्वतंत्रता संबंधी प्रस्ताव रखा था। वह 1956 में तीन सप्ताह की सद्भावना यात्रा पर भारत आए। यूपी के मुख्यमंत्री थे डॉ. संपूर्णानंद, जो सुभाष चंद्र बोस नेताजी के अनन्य भक्त थे।
उस समय नेताजी के जीवन को लेकर तमाम चर्चाएं थीं। उन्होंने एटली से नेता जी के बारे में पूछ लिया। एटली ने भी उन्हें निराश नहीं किया। अंग्रेजी हुकूमत और बाद में मुख्यमंत्री आवास पर तैनात रहे खुफिया अधिकारी धर्मेंद्र गौड़ ने एक संस्मरण में लिखा है, ‘एटली ने डॉ. साहब को बताया ‘रूस में हैं।’
संपूर्णानंद ने और जानकारी पूछी। एटली ने बताया, ‘महायुद्ध के अंतिम दौर के वक्त मैं ब्रिटेन का प्रधानमंत्री था। आजाद हिंद फौज के समर्पण से एक दिन पहले 24 अगस्त 1945 को सुभाष चंद्र बोस ने अपने कुछ चुनिंदा फौजी अफसरों और सिविलियन मित्रों को सिंगापुर में डिनर पर बुलाया।
बोस को जापानी जहाज से रूसी सीमा तक लाया गया
डिनर में वे हल्के क्रीम कलर का सूट पहने हुए थे, जिस पर लाल टाई थी। वह पूरी तरह शांत थे। उनके चेहरे पर कहीं से ऐसा नहीं लग रहा था कि वह तनाव में हैं। पर, जापान नहीं चाहता था कि देश के इस महान कर्मयोगी, अदम्य देशप्रेमी और क्रांति के अनोखे पुजारी को कैदी के रूप में हमें (ब्रिटेन को) सौंपा जाए।
इसलिए उसने सोवियत यूनियन के प्रधानमंत्री मार्शल जोसफ स्टालिन को सुभाष चंद्र बोस को अपने यहां रूस में प्रवेश देने को राजी कर लिया। बोस को जापानी जहाज से रूसी सीमा तक लाया गया और फिर वहां से जीप से वह रूसी सीमा में प्रवेश कर गए। जापान को इसकी जानकारी भी दी गई।’
यह सुनते ही डॉ. संपूर्णानंद के आंखों में आंसू छलक आए। इसके बाद एटली ने डॉ. संपूर्णानंद के कान में धीरे से कुछ कहा उसके बाद डॉक्टर साहब का चेहरा खिल उठा और होठों पर मुस्कराहट भी आ गई। पर, पता नहीं वह क्या बात थी। जो कभी इस मुख्यमंत्री की जुबान पर नहीं आई।