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यहां टूट गई पांच सौ साल पुरानी रवायत
आशुतोष/लखनऊ
Updated Sun, 17 Nov 2013 02:31 PM IST
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कार्तिक पूर्णिमा पर राजधानी की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा पर ग्रहण लग गया है। पूर्णिमा पर गोमा के किनारे सैकड़ों साल से लगते चले आ रहे ‘कतिकी मेले’ की रौनक से इस बार शहर अछूता ही रहेगा।
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अनुमति न मिल पाने के कारण प्रशासन ने इस बार मेले को लगने नहीं दिया। ऐसा पहली बार होगा। अनुमति के फेर में फंसने के चलते प्रदेश भर से दर्जनों की संख्या में आए व्यापारी सकते में है।
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अरसे से सूरजकुंड पार्क और पूरी बांसमंडी में कार्तिक पूर्णिमा से हफ्तों पहले तक सजने वाली दुकानें शनिवार रात तक नहीं लग सकी थीं। दोपहर में पुलिस ने दुकानदारों को कई बार भगाया।
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दुकानें न लग पाने के कारण भारी मात्रा में माल लेकर दूर दराज से आये दुकानदार हजारों के नुकसान की बात कह रहे हैं। प्रशासन अनुमति के पीछे शांति व्यवस्था का हवाला दे रहा है।
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पिछले कई सालों से कार्तिक पूर्णिमा के दिन से अगले 40 दिनों तक सूरजकुंड पार्क, बांसमंडी, शहीद स्मारक तक लगने वाले कतिकी मेले की रंगत से शहर बेनूर ही रहेगा।
मेरठ से आए झूला संचालक तेजबीर ने बताया बीते कई सालों से यहां मेले में वो झूले चला रहे हैं। एक हफ्ते पहले ही पूरे क्रू के साथ यहां पहुंचकर उन्होंने भारी भरकम झूले फिट कर दिये लेकिन, अंतिम समय में इस अनुमति के चक्कर से अब हजारों डूबने की कगार पर है।
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माल भाड़े में ही 40- 50 हजार का खर्च आ चुका है। पूरा दिन डीएम कार्यालय में बिताया लेकिन, अनुमति नहीं मिल सकी। आगरा से आये दुकानदार जमील ने बताया कि क्राकरी का तमाम सामान यहां ढोकर लाने में ही 20 हजार से अधिक का खर्च हो चुका है।
ऐसे में मेला न लगने से इस बार भारी घाटा होगा। दशकों से यहां दुकानें लगा रहे डालीगंज के दिनेश ने बताया कि मेले में मिर्जापुर, फिरोजाबाद से आये कई दुकानदार तो अनुमति ने मिलने की बात सामने आते ही सुबह ही रवाना हो गए।
जबकि आसपास के ग्रामीण इलाकों से आए दुकानदार शाम तक सामान समेट कर वापस जाते दिखे। इतिहासकार योगेश प्रवीन ने बताया कि सूरजकुंड का ये मेला सैकड़ों साल पुराना है।
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अकबर के समय से ही इसका जिक्र सूरजकुंड मेले के नाम से पाया जाता है। ये शहर के तीन ऐतिहासिक मेलों में से एक है। कार्तिक पूर्णिमा के नहान के बाद यहां श्रद्धालु जायकों के साथ खरीददारी भी करते हैं।
हालिया दिनों में ये भले ही सिमटा हो लेकिन, तब ये गोमा के किनारे काफी दूर तक लगता था। महिलाओं और बच्चों के लिए घरेलू जरूरतें पूरे करने का एकमात्र साधन ये तब भी था और अब भी।
शहर में आज भी इसे लोकल ‘लखनऊ महोत्सव’ के नाम से लोग जानते हें। जहां हर छोटी-मोटी जरूरत की चीजें आसानी से कम दामों में मिल जाती हैं।
आज भी यहां की गुनगुनी सिंघाड़े की गूदी का चटखारा और दूर तक बिछे सिलबट्टे का नजारा हर छोटे-बड़े शहरी की यादों में बसा है।
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