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टूट गयी सैकड़ों साल पुरानी परंपरा, नहीं लगेगा ये मेला
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sat, 04 Nov 2017 01:53 PM IST
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डेमो
- फोटो : डेमो
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कार्तिक पूर्णिमा पर लखनऊ डालीगंज पुल पर लगने वाला कतकी मेला इस बार नहीं लगेगा। जिला प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी। डीएम कौशल राज शर्मा ने बताया कि आचार संहिता के दौरान ऐसे आयोजन की अनुमति नहीं दी जाएगी। यदि किसी ने सड़क पर दुकान लगाई तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।
एडीएम पश्चिम संतोष कुमार वैश्य ने बताया कि बिना अनुमति किसी भी संस्था, समिति या सदस्यों को मेला नहीं लगाने दिया जाएगा। इतिहासकारों के मुताबिक मेला कम से कम 400 से अधिक साल पुराना तो माना ही जा सकता है। नगर के पुराने लोग बताते हैं कि नदी के किनारे की सड़क लोगों के बीच ठंडी रोड के नाम से जानी जाती थी।
वहां से लेकर शहीद स्मारक तक मेले में आए लोग जुटते थे। इतिहासकार योगेश प्रवीण के मुतबिक कतकी नहान पर डुबकी के बाद सब घाटों पर एक साथ सत्यनारायण की कथा सुना करते थे। कई दिन पहले से ही घाटों के किनारे जगह पक्की कर लिया करते थे, उसके बाद लौटते समय मेले से खरीदारी भी कर लेते थे। तब 90 प्रतिशत नहान और 10 प्रतिशत तमाशबीन हुआ करते थे।
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एडीएम पश्चिम संतोष कुमार वैश्य ने बताया कि बिना अनुमति किसी भी संस्था, समिति या सदस्यों को मेला नहीं लगाने दिया जाएगा। इतिहासकारों के मुताबिक मेला कम से कम 400 से अधिक साल पुराना तो माना ही जा सकता है। नगर के पुराने लोग बताते हैं कि नदी के किनारे की सड़क लोगों के बीच ठंडी रोड के नाम से जानी जाती थी।
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वहां से लेकर शहीद स्मारक तक मेले में आए लोग जुटते थे। इतिहासकार योगेश प्रवीण के मुतबिक कतकी नहान पर डुबकी के बाद सब घाटों पर एक साथ सत्यनारायण की कथा सुना करते थे। कई दिन पहले से ही घाटों के किनारे जगह पक्की कर लिया करते थे, उसके बाद लौटते समय मेले से खरीदारी भी कर लेते थे। तब 90 प्रतिशत नहान और 10 प्रतिशत तमाशबीन हुआ करते थे।
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मुगलों के समय में मिलता है इसका जिक्र
सामान लेकर पहुंचे दुकानदार
- फोटो : amar ujala
इतिहासकारों के मुताबिक इसका जिक्र मुगलों के समय मिलता है। सूरजकुंड पार्क के पास लगने वाले कतकी (बुड़की) मेले का जिक्र शम्सी तालाब के नाम से मिलता है। लखनऊ में नवाबों ने गंगा-जमुनी संस्कृति को बढ़ावा देने लिए मेलों को खूब संरक्षण दिया। इसी का परिणाम है कि यहां पर खूब मेले लगते हैं।
इसमें जेठ के मंगल पर लगने वाला मेला और नवरात्र पर चौक में लगने वाला मेला काफी प्रसिद्ध हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन लोग स्नान करके जरूरतमंदों को दान आदि करते थे। शुरुआती दिनों में सूरजकुंड पार्क के पास स्थित सरोवर पर लोग बैलगाड़ियों के लिए जानवरों के लिए चारा और अपने ठहरने का इंतजाम करते थे। धीरे-धीरे यहां व्यापारियों ने दुकानें लगा लीं। इस तरह कतकी मेला अस्तित्व में आया।
इसमें जेठ के मंगल पर लगने वाला मेला और नवरात्र पर चौक में लगने वाला मेला काफी प्रसिद्ध हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन लोग स्नान करके जरूरतमंदों को दान आदि करते थे। शुरुआती दिनों में सूरजकुंड पार्क के पास स्थित सरोवर पर लोग बैलगाड़ियों के लिए जानवरों के लिए चारा और अपने ठहरने का इंतजाम करते थे। धीरे-धीरे यहां व्यापारियों ने दुकानें लगा लीं। इस तरह कतकी मेला अस्तित्व में आया।