जाफरी बोले, गरजने नहीं बरसने आया हूं
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'आप' प्रत्याशी जावेद जाफरी हफ्ते भर से ज्यादा समय से लखनऊ में है। कभी रिक्शा चला रहे हैं, तो कभी बस में टहल रहे हैं।
नामांकन करने से पहले उनके घर केवजूद पर सवाल भी उठे तो उनका प्रचार शेड्यूल उनकी सेलेब्रिटी होने की वजह से बिगड़ भी रहा है।
मैदान में उनके सामने राजनीति के बड़े सूरमा हें, लेकिन जावेद मान कर चल रहे हैं कि वे उनकी तरह गरजने नहीं बरसने आये हैं।
वो कमाने के दौरान वेट भी घटा मान रहे हैं, लेकिन बात जब घर की चली तो बताते हैं कि चुनाव जीतने के बाद सबसे पहले एक अच्छा घर खरीदेंगे ताकि परिवार भी साथ रह सके।
चुनाव प्रचार को रवाना होने से पहले लंच के दौरान मुलाकात हुई, तो जावेद अमर उजाला से खूब बतियाये।
आपके बीच आपका बनने आया हूं
आप के सामने राजनीति के कई सूरमा खड़े हैं, बड़े नाम हैं कैसे फाइट करेंगे, वो भी तब, जब लोग आपको बाहर से आया हुआ कह रहे हैं?
- नो डाउट वो बड़े नाम हैं, लेकिन मैं यहां उनकी तरह गरजने नहीं आया हूं। लोगों के बीच काम करने आया हूं, उनके साथ काम करना चाहता हूं। बदलाव को दिखाना चाहता हूं। सीधे तौर पर कहूं, तो गरजने नहीं बरसने आया हूं।
रही बात बाहर का, तो मैं तो लोगों के मिलकर सबसे पहले यही कहता हूं कि आपके बीच आपका बनने आया हूं, उनस वोट नहीं मांगता। अच्छे लोग चुनने को कहते हैं। अच्छा रिस्पांस मिल रहा है।
लखनऊ में होकर कबाब नहीं खा पा रहा हूं
सेलिब्रेटी का नुकसान-फायदा, सबसे ज्यादा क्या मिल रहा है।
- नुकसान तो कोई खास नहीं मिल रहा, सिवाय इसके कि प्रचार के दौरान लोगों के साथ फोटो शूट आटोग्राफ में समय गड़बड़ाता है। हां फायदा ये है कि लोगों को बताना नहीं पड़ता कि जावेद जाफरी है कौन?
लखनऊ में दिन कैसे कट रहे हैं?
- लखनऊ में आकर नींद छिन गई है। 24 घंटे में 4-5 घंटे सो पा रहा हूं। बाकी समय मीटिंग, प्रचार में जा रहा है। खाना भी नहीं खा पा रहा हूं।
मेरे जैसे खाने का शौकीन लखनऊ में हफ्ते भर से ज्यादा समय से हो और अब तक कबाब न खाये सोच कर मुझे ही आश्चर्य हो रहा है।
फल, बर्गर के साथ लंच होता है। यही हाल पत्नी हबीबा का है, वो मेरे साथ रहती हैं, वे भी चुनावी माहौल में रच बस गई हैं।
अरविंद केजरीवाल आ सकते हैं लख्ानऊ
वोट मांगते-मांगते वेट भी घटा है क्या?
- कह नहीं सकता, क्योंकि अभी तक तौला नहीं है। लेकिन जैसा रूटीन है, पक्का घटा जरूर हुआ होगा। 10-15 मिनट के लिये भी टीवी देखना भूल गया हूं, क्या घटा वो साथी बताते हैं। बाकी सोशल मीडिया पर भी बहुत कम एक्टिव हो पा रहा हूं।
लखनऊ में गली-मोहल्लों में जाकर प्रचार कर रहे हैं, अरविंद केजरीवाल जैसे हादसे से डर तो नहीं लगता, बचे हुये दिनों में प्रचार की रणनीति क्या है?
- सलीकेदार लोगों का शहर है। नजाकत-नफासत के साथ बाशिंदे यहां रहते हैं। यहां ऐसा हो नहीं सकता। इसलिए बेखटके घूमता हूं, लोगों से मिलता हूं।
बाकी आम आदमी के करीब पहुंचने के लिये रिक्शा चला लिया, बस में घूमा या कुछ और तो इसमें बुरा क्या है। आने वाले दिनों में अरविंद केजरीवाल भी शहर में साथ आ सकते हैं, प्लानिंग चल रही है।
पार्टी का ग्राफ गिरा नहीं, बढ़ा है
शहर में आपके घर को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं, क्या मामला है?
- वो एक छोटा किराये का मकान, जहां कभी रहा, कभी यार-दोस्तों के साथ स्क्रिप्ट लिखी, बाकी इन दिनों दोस्त आमिर रजा के मकान में रह रहा हूं।
‘आप’ का प्रभाव घट रहा है, ऐसे में विरोधियों के सामने चुनौती कैसे पेश कर पायेंगे?
- देखिये दिल्ली में इस्तीफे के बाद कुछ समय के लिये ऐसा कहा जा सकता था, लेकिन अब जब से अरविंद कजेरीवाल पर हमले बढ़े हैं, मुझे नहीं लगता कि पार्टी का ग्राफ गिर रहा है। ये बढ़ रहा है।