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मिशनरियों का मिशन मुस्लिम: कुंडली खंगाल सीधे संस्कार पर करते चोट, ऐसी बिछाई जड़ें... सुनकर लोग हक्काबक्का
Sun, 02 Mar 2025 11:18 AM IST
भूपेन्द्र सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
Published by: भूपेन्द्र सिंह
Updated Sun, 02 Mar 2025 11:18 AM IST
सार
आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से उपेक्षित परिवारों का धर्मांतरण के लिए चुनाव किया जाता है। महिलाओं के बीच पैठ बनाकर शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरी की बात करते-करते पूजा पद्धति में बदलाव की शुरुआत करा दी जाती है।
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मिशनरियों का मिशन मुस्लिम- धर्मांतरण
- फोटो : Freepik
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विस्तार
राजधानी लखनऊ में मिशनरियों के मिशन मुस्लिम में बात सिर्फ धर्मांतरण तक ही सीमित नहीं है। परिवार की कुंडली खंगाल सीधे संस्कार पर चोट की जा रही है। इसके लिए आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से उपेक्षित मुस्लिम परिवारों का विवरण जुटाया गया है।
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अवध क्षेत्र के सीतापुर, अंबेडकरनगर व अयोध्या में केरल व झारखंड की तरह विपन्न मुस्लिम परिवारों के धर्मांतरण के लिए मिशनरियां महिलाओं के बीच पैठ बना रही हैं। बात शिक्षा, स्वास्थ्य और नौकरी से होते हुए पूजा पद्धति में बदलाव तक पहुंच रही है।
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मिशनरी का सदस्य सामान्य रूप से पहुंचता है
सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट बताती है कि मिशनरियों का मिशन मुस्लिम एक दिन का प्रयास नहीं है। इसके लिए उन्होंने बकायदा रणनीति तैयार की है। चरणवार काम कर रहे हैं। पहला चरण संबंधित परिवार के आर्थिक व सामाजिक स्तर का अध्ययन होता है। इसके बाद देखा जाता है कि परिवार में कोई गंभीर बीमार तो नहीं है। पूरे विवरण और अध्ययन के बाद मिशनरी का एक सदस्य परिवार के पास सामान्य रूप से पहुंचता है।ईशु की महिमा का बखान होता है...
अब शुरू होता है दूसरा चरण। वह मानवीय स्तर पर संबंधित परिवार से जुड़ने की कोशिश करता है। इसमें छह महीने से एक वर्ष तक का समय लग जाता है। तीसरे चरण की शुरुआत होम प्रेयर (प्रार्थना) से होती है। पांचवें चरण में परिवार की आर्थिक रूप से मदद की जाती है। इलाज में सहयोग किया जाता है। इलाज को चमत्कार बताते हुए ईशु की महिमा का बखान होता है।...और संस्कृति से आस्था अलग
आईबी के पूर्व अधिकारी संतोष सिंह बताते हैं कि धर्मांतरण का सबसे अहम छठा चरण है। इसी में संस्कृति और आस्था को अलग किया जाता है। यह क्रम पूजा पद्धति में बदलाव के रूप में सामने आता है। संबंधित व्यक्ति न नाम बदलता है और न ही पहनावा। वह मन से तो धर्म बदल चुका होता है, लेकिन रहन सहन पूर्व की तरह होने से पहचानना मुश्किल होता है कि धर्मांतरण हुआ है या नहीं।
ज्वाय मैथ्यू ने कहा कि धर्मांतरण की बात गलत है, लेकिन लोग खुद किसी धर्म से प्रभावित होकर उसे अपनाना चाहते हैं तो इसमें गलत क्या है। इसका विरोध नहीं होना चाहिए। धर्म आखिर धारण करने का विषय है, बशर्ते उसमें दबाव और प्रलोभन न हो।
लखनऊ विवि के समाजशास्त्री डॉ. पवन मिश्रा ने बताया कि पूर्वांत्तर भारत की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। वहां 80 प्रतिशत लोग ईसाई धर्म स्वीकार चुके हैं। श्रीमंत शंकर देव अगर असम में नव वैष्णव आंदोलन (एक शरणीया नाम-धर्म) नहीं शुरू करते तो वहां हिंदू बचते ही नहीं। अब अगर मिशनरियां मुस्लिम परिवारों का भी धर्मांतरण करा रही हैं तो यह सोचने वाली बात है। उनकी योजना बड़ी सुनियोजित होती है।