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...जब काले गुलाबों से लखनऊ नगर प्रमुख ने किया इंदिरा गांधी का स्वागत, जानें- पूरा किस्सा

Thu, 09 Nov 2017 10:57 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Thu, 09 Nov 2017 10:57 AM IST
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Indira gandhi was welcomed by black roses in Lucknow.
इंदिरा गांधी का स्वागत करते नगर प्रमुख - फोटो : amar ujala

आज की पीढ़ी भले ही यकीन न करे लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब राजनीतिक विरोध के बावजूद रिश्तों में कोई तल्खी नहीं दिखाई देती थी। मत भिन्नता होने के बावजूद मन भिन्नता नहीं हुआ करती थी। ऐसे ही कुछ प्रसंग राजधानी के नगर प्रमुख के पद से भी जुड़े हुए हैं। इन्हीं में एक है, जब यहां के नगर प्रमुख ने मत भिन्नता के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का विरोध भी किया लेकिन नगर प्रमुख और नगर के प्रथम नागरिक होने के नाते उनके स्वागत व अगवानी की परंपरा भी निभाई।

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राजधानी के पूर्व नगर प्रमुख डॉ. दाऊजी बताते हैं कि उन्होंने 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की विरोध के साथ अगवानी और स्वागत करने के लिए काली टोपी व काले गुलाब का उपयोग किया। वे बताते हैं, दरअसल कांग्रेस का विभाजन हो चुका था। एक गुट के राष्ट्रीय अध्यक्ष निजिलिंगप्पा थे। एक गुट इंदिरा के नेतृत्व में था। मैं भी कांग्रेस से अलग होकर प्रदेश में चंद्रभानु गुप्त के नेतृत्व में बनी निजिलिंगप्पा वाली कांग्रेस (संगठन) में काम करने लगा था।
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इसी दौरान इंदिरा गांधी का लखनऊ आने का कार्यक्रम तय हुआ। नगर प्रमुख के नाते मुझे स्वागत और अगवानी करनी ही थी। पर, कांग्रेस संगठन ने इंदिरा गांधी को काले झंडे दिखाने का फैसला किया। कार्यकर्ताओं को निर्देश हुआ । मैं असमंजस में...। नगर प्रमुख होने के नाते प्रधानमंत्री की अगवानी के कर्तव्य निर्वाह की मर्यादा और दूसरी तरफ पार्टी के फैसले का दबाव।
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काफी सोच के बाद काले गुलाब की युक्ति सूझी
दाऊ जी बताते हैं कि इंदिराजी के हमारे पारिवारिक संबंध भी थे। काफी सोचने के बाद दिमाग में आया कि अगर काले गुलाब मिल जाएं तो काम बन जाए। इससे स्वागत भी हो जाएगा और विरोध भी। नगर निगम के मालियों से पूरे शहर के पार्कों में खोजबीन कराई। पर, बात नहीं बनी। एक फूल बेचने वाले ने बताया कि राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) में काले गुलाब मिल सकते हैं।

...पर मन में एक डर भी था कोई पूछ न ले

Indira gandhi was welcomed by black roses in Lucknow.

जब हवाई अड्डे पर पहुंचा तो वहां तत्कालीन राज्यपाल बी. गोपाला रेड्डी, तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी, कांग्रेस की तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष राजेंद्र कुमारी वाजपेयी भी हवाई अड्डे पर थीं। पर, नगर प्रमुख के नाते प्रोटोकॉल में मुझे सबसे पहले स्वागत करना था। पर, मन में एक डर था कि कोई पूछ न ले।

इंदिरा जी हंसतीं-क्या लखनऊ में काले गुलाब खिलना बंद हो गए
इंदिरा जी आईं तो मैंने उन्हें काले गुलाब की बुके देकर अगवानी की। वे मुस्कराईं। बुके ले लिया और फिर मेरी टोपी की ओर इशारा करते हुए बोलीं, ‘क्या आरएसएस में चले गए जो उनकी वाली टोपी लगा ली।’ अगले दिन अखबारों में फोटो सहित इस हेडिंग से खबर छपी, ‘नगर प्रमुख डॉ. दाऊजी गुप्त ने प्रथम नागरिक का धर्म भी निभाया और कार्यकर्ता का कर्म भी।’  बाद में जब भी वे मिलतीं तो हंसते हुए सिर्फ यही कहतीं, ‘क्या आरएसएस वालों ने टोपी वापस ले ली... लखनऊ में काले गुलाब खिलना बंद हो गए क्या...।

बरखुरदार जवाब नहीं दिमाग का
जैसा कि हमने बताया कि कैलाशनाथ कौल मुझे भी पुत्रवत मानते थे। उन्होंने अगले दिन बुलाया और बोले, बरखुरदार तुम्हारे दिमाग का भी जवाब नहीं। भांजी के लिए हमसे ही काले गुलाब ले लिए। चलो कोई बात नहीं। इंदिरा भी मेरी बेटी है और तुम भी मेरे बेटे हो। पर, यह न समझना कि इंदिरा कुछ समझी नहीं। उन्होंने हमसे खुद कहा, ‘दाऊ जी से कह देना कि उनका विरोध स्वीकार ’ बाद में वह जब भी हमसे मिलतीं तो पूछती, ‘काले गुलाब बहुत अच्छे थे। अब कहां हैं?’

काले गुलाब का बुके बनवाया, काली टोपी लगा पहुंचा एयरपोर्ट
बकौल दाऊ जी, एनबीआरआई के निदेशक कैलाशनाथ कौल, इंदिरा गांधी के मामा थे। मुझे भी पुत्रवत मानते थे। मन में भय पैदा हुआ कि कौल साहब ने अगर काले गुलाब लेने का कारण पूछ लिया तो क्या होगा? बहरहाल,  एनबीआरआई पहुंचा और कौल साहब को प्रणाम कर उनके सामने काले गुुलाब की फरमाइश की। वही हुआ जिसका डर था। उन्होंने इसकी वजह पूछ ली। मैंने गोलमोल जवाब देकर उन्हें संतुष्ट कर दिया। काले गुलाब मिल गए तो एक बुके बनवाया। काली टोपी लगाई और काले गुलाब के फूलों का बुके लेकर हवाई अड्डे पर पहुंचा।

एक वाकया और...

Indira gandhi was welcomed by black roses in Lucknow.

जब विरोध के बावजूद रूसी प्रतिनिधिमंडल का करना था स्वागत
डॉ. दाऊ जी बताते हैं, भारत और सोवियत संघ के बीच मैत्री संधि के चलते तत्कालीन केंद्र सरकार ने पूरे देश में रूसी प्रतिनिधिमंडल के अभिनंदन का कार्यक्रम तय किया। पर, देश के कई दल इस संधि का विरोध कर रहे थे। रूसी प्रतिनिधिमंडल लखनऊ आ रहा था। जिसका नेतृत्व रूसी राजदूत पेगोव कर रहे थे।

परंपरा के अनुसार, प्रतिनिधिमंडल का नगर महापालिका में अभिनंदन जरूरी था। कई दलों के सभासदों ने विरोध का एलान कर दिया। मैं असमंजस में कि इससे बहुत खराब संदेश जाएगा। मैंने सभासदों से कहा कि आप लोग सदन में न आइएगा। बाहर बैठकर सुन लीजिएगा। पर, अपने दलों के नेताओं को आने दीजिए। सहमति बन गई। उधर मैंने ऊपर बात करके रूसी प्रतिनिधिमंडल से नगर महापालिका के सभासदों और दलों के नेताओं को रूस यात्रा का निमंत्रण देने का प्रस्ताव रखा। केंद्र तैयार हो गया।

...और बन गई बात
दाऊ जी कहते हैं कि लखनऊ में उन्होंने नेताओं को हवाई अड्डे पर ही ले जाकर रूसी प्रतिनिधिमंडल की अगवानी की योजना बनाई। निर्धारित तारीख को सभी को सुबह-सुबह ही नगर महापालिका पर बुला लिया। जब सब लोग आ गए तो उन्हें गाड़ियों में बैठाकर हवाई अड्डे लेकर पहुंच गया। रूसी प्रतिनिधिमंडल का सभी ने स्वागत किया। फिर बातचीत शुरू हुई।

राजदूत सहित प्रतिनिधिमंडल के बाकी सदस्यों ने जैसे ही हिंदी में बोलना शुरू किया तो सारा तनाव दूर हो गया। सदन में भी प्रतिनिधिमंडल का स्वागत हुआ। प्रतिनिधि मंडल ने भी सभी को रूस आने का न्यौता दिया।’ अभिनंदन और स्वागत के बाद जब प्रतिनिधि मंडल बाहर निकला तो माहौल बदल चुका था। वे सभासद भी हिंदी के सम्मान के लिए प्रतिनिधिमंडल का स्वागत कर रहे थे, जो समारोह मेें नहीं आए थे।

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