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Lucknow News: दस माह में पार्षद 25 फीसदी ही खर्च कर पाए विकास के लिए मिला कोटा

Mon, 19 Jan 2026 02:26 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 19 Jan 2026 02:26 AM IST
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In ten months, councillors could only spend 25% of their development quota.
गोमतीनगर के वास्तुखंड-3 की खस्ताहाल गली।  - फोटो : संवाद
लखनऊ। गोमतीनगर के वास्तुखंड-तीन में मकान नंबर 818 वाली गली गड्ढों में बदली हुई है। यहां सावधानी से गाड़ी न चलाने पर कोई भी गिरकर चोटिल हो सकता है। यह हाल करीब एक वर्ष से है, लेकिन इसके बनने का नंबर नहीं आया। यह हाल है तब है कि पार्षद कोटा वाले वार्ड विकास निधि में करीब 170 करोड़ रुपये पड़े हैं, जो 10 माह बाद भी खर्च नहीं हो सका है। यह रकम कुल कोटे का करीब 75 प्रतिशत है।
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ऐसा ही हाल बहुत से वार्डों का है। एक ओर वार्ड विकास निधि में करीब 75 प्रतिशत धनराशि पड़ी है। दूसरी ओर वार्डों में बहुत से ऐसे काम हैं जो इस निधि से कराए जा सकते थे, लेकिन कराए नहीं गए। नगर निगम में 110 वार्ड हैं। हर वार्ड का एक निर्वाचित पार्षद है। चालू वित्तीय वर्ष में प्रति वार्ड 2.10 करोड़ रुपये का कोटा विकास कार्य कराने के लिए स्वीकृत किया गया। प्रस्ताव देकर पार्षद अपने वार्ड में 2.10 करोड़ तक के विकास संबंधित कार्य करा सकते हैं। कौन-कौन से काम कराने हैं, यह पार्षद ही तय करते हैं। 31 मार्च को यह धनराशि खर्च करने की अवधि समाप्त हो जाएगी। बजट खर्च करने के लिए अब करीब ढाई माह ही बचे हैं।
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पार्षद जानबूझकर समय से खर्च नहीं करते कोटा

नगर निगम अभियंत्रण विभाग के जानकार बताते हैं कि पार्षदों का जोर इस पर रहता है कि उनके वार्ड में जो भी काम हो, वह किसी अन्य निधि जैसे अवस्थापना, 15वें वित्त, विधायक, सांसद, महापौर या नगर निगम की सामान्य निधि से हो जाए। उनका प्रयास होता है कि उनका कोटा कम से कम खर्च हो जिसे वित्तीय वर्ष के अंत समय में वह अपनी मनमर्जी से खर्च कर सकें। अंत समय में अपने प्रस्ताव पास कराने और टेंडर कराने के लिए वह निगम प्रशासन पर दबाव भी बनाते हैं।
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...इसलिए भी विलंब से होते हैं काम

नगर निगम में ई टेंडर सिस्टम 10-12 साल से चल रहा है, लेकिन पार्षद कोटे के काम अभी भी मैनुअल टेंडर से हो रहे हैं। नगर निगम प्रशासन कई बार पार्षद कोटे के कामों के लिए ई टेंडर लागू करने का प्रयास कर चुका है, मगर सफलता नहीं मिली। सूत्र बताते हैं कि इसकी बड़ी वजह है कि मैनुअल टेंडर में मनमर्जी चलती है। कमीशन के लिए पार्षद व अधिकारी अपने चहेते ठेकेदारों को काम दिलाते हैं। ई टेंडर लागू होने पर यह संभव नहीं होगा। कई पार्षद तो परिजनों या अपने रिश्तेदारों के नाम पर ठेकेदारी का काम भी करते हैं। इस कारण काम भी देरी से होते हैं, जिससे फर्जीवाड़ा करने का पर्याप्त मौका मिल सके।



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वार्ड विकास निधि के काफी काम हो गए हैं। कुछ ही काम बचे हैं जिनके टेंडर जारी हो चुके हैं। जिस हिसाब से प्रस्ताव आते हैं, उसी हिसाब से काम कराए जाते हैं। बजट का खर्च इसलिए कम दिखता है, क्योंकि लेखा विभाग में भुगतान लंबित होगा। जो भी काम हैं वह मार्च तक पूरे हो जाएंगे।

-महेश वर्मा,
मुख्य अभियंता, नगर निगम
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