कैग रिपोर्ट : गोमती रिवर फ्रंट के ठेके बांटने में मानकों की अनदेखी, सरकार को करोड़ों की चपत
- विधानमंडल के दोनों सदनों में रखी गई कैग की रिपोर्ट
- रिपोर्ट में कदम-कदम पर बरती गईं अनियमितताएं उजागर
- न्यायिक जांच रिपोर्ट में भी इन नियमितताओं का हुआ था खुलासा
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न्यायिक जांच रिपोर्ट के बाद अब भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में भी गोमती रिवर फ्रंट परियोजना में किए गए घपले को उजागर किया गया है। कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि करोड़ों रुपये के ठेके मानकों का पालन किए बिना दिए गए। मनमाने ढंग से भुगतान करके राजस्व को बड़ी चपत लगाई गई। निविदा आमंत्रण के कूटरचित दस्तावेज भी लगाए गए। विधानमंडल के दोनों सदनों में गुरुवार को रखी गई कैग रिपोर्ट में ये खुलासे हुए हैं।
मार्च 2015 में लखनऊ में गोमती नदी पर विश्वस्तरीय रिवर फ्रंट विकसित करने के लिए 656.58 करोड़ रुपये की परियोजना स्वीकृत की गई थी। जून 2016 में इस लागत को संशोधित करके 1513.52 करोड़ कर दिया गया। मार्च 2017 तक काम पूरा होना था, लेकिन सितंबर 2017 तक 1447.84 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद काम अधूरा था। इस परियोजना से संबंधित कुल 662.58 करोड़ रुपये लागत की 23 निविदा आमंत्रण सूचनाओं को प्रकाशित ही नहीं करवाया गया। इससे संबंधित साक्ष्यों की कूटरचना विशिष्ट फर्मों को फायदा पहुंचाने के लिए की गई।
गैमन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को 516.73 करोड़ रुपये के डायफ्राम वॉल के निर्माण के कार्य देने के लिए मानदंड शिथिल किए गए। इसकी पूर्व सूचना किसी भी अखबार में प्रकाशित नहीं की गई। इससे सिंचाई विभाग प्रतिस्पर्द्धी दरों को पाने में असफल रहा। अपात्र होने के बावजूद गैमन इंडिया को ठेका दिया गया।
बिना निविदा आमंत्रण प्रकाशित किए दिया ठेका
इटंरसेप्टिंग ट्रंक ड्रेन के निर्माण का काम केके स्पन पाइप प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया, जिसकी कुल लागत 285.70 करोड़ रुपये थी। निविदा मूल्यांकन समिति ने निविदाओं का कोई तकनीकी मूल्यांकन नहीं किया और न ही इस बाबत रिपोर्ट तैयार की गई। यह फर्म वार्षिक कारोबार करने संबंधी तकनीकी योग्यता मानदंडों को भी पूरा नहीं करती थी। गलत ढंग से मेसर्स पटेल इंजीनियर्स का आवेदन खारिज कर दिया गया।
रबर डैम के निर्माण संबंधी 60.27 करोड़ की लागत का काम गैमन इंडिया को समाचार पत्रों में निविदा आमंत्रण प्रकाशित किए बिना दे दिया गया। गैमन इंडिया को नियम विरुद्ध ढंग से रबर मेम्ब्रेन आयात करने का ठेका दिया गया। इतना ही नहीं, उसे इस काम के लिए मनमाने ढंग से 18.84 करोड़ रुपये की जगह 29.24 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। इससे सरकारी खजाने को 10.40 करोड़ रुपये की चपत लगी। यहां बता दें कि योगी सरकार ने हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में गठित कमेटी से इस परियोजना की न्यायिक जांच कराई थी। उसमें भी कमोबेश यही अनियमितताएं बताई गई थीं।