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केजीएमयू ने खोजी पोस्ट कोविड मरीजों की बिगड़ी हालत की वजह, बढ़ी इम्यूनिटी ने बिगाड़ी तबीयत
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लखनऊ। कोरोना की पहली लहर में ऐसे काफी मामले आए, जिनमें रिपोर्ट निगेटिव होने पर भी मरीज की हालत गंभीर हो गई। कई में तो मौत तक हो गई। इसकी वजह खोजने का दावा केजीएमयू के चिकित्सकों ने किया है। शोध के मुताबिक, ऐसे मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यधिक बढ़ गई और यह सामान्य कोशिकाओं को ही नुकसान पहुंचाने लगी। इसका सीधा असर अंगों पर पड़ा और मरीजों की जान तक पर बन आई। चिकित्सा की भाषा में इसे हेमोफैगोसाइटिक हिस्टियोसाइटोसिस (एचएलएच) कहते हैं, जिसमें इम्यून सिस्टम हाइपर एक्टिव हो जाता है। बोनमैरो जांच के बाद इसका पता लगाया गया। दूसरी लहर के पहले ही इसकी जांच होने से काफी मरीजों की जान बचाई जा सकी।
केजीएमयू के पैथोलॉजी विभाग की डॉ. गीता यादव और अन्य चिकित्सकों की टीम की निगरानी में यह शोध हुआ। इसके अनुसार कोविड मरीजों की रिपोर्ट निगेटिव आने के बावजूद उनकी हालत बिगड़ रही थी। सेरेटिन और एलडीएच, हीमोग्लोबिन और प्लेटलेट्स की जांच के आधार पर मरीजों में एचएलएच होने की आशंका बढ़ी। इसकी पुष्टि के लिए बोनमैरो जांच की गई। इसमें पाया कि निगेटिव रिपोर्ट के बावजूद खराब हालत वाले सभी मरीजों में एचएलएच की समस्या थी।
दूसरी लहर में मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा थी, जिससे सभी का टेस्ट संभव नहीं हो सका। इसके बावजूद एचएलएच की आशंका वाले मामलों में स्टेरॉयड और अन्य तकनीक का इस्तेमाल किया। इससे काफी मरीजों की जान बचाई जा सकी। इस पेपर को इंटरनेशनल जर्नल ऑफ लैबोरेट्री हेमेटोलॉजी में प्रकाशित किया गया। केजीएमयू के रिसर्च शोकेस में इसे पैरा-क्लीनिकल पेपर की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ करार दिया गया।
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जानिए क्या है एचएलएच
एचएलएच ऐसी स्थिति होती है, जिसमें रोगी की प्रतिरोधक क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि यह सामान्य कोशिकाओं को भी क्षतिग्रस्त करने लगती है। इससे विभिन्न अंग भी प्रभावित होने लगते हैं। यह दो प्रकार के होते हैं। पहला बच्चों में जन्मजात या आनुवांशिक वजह से होता है। दूसरा प्रकार वायरल या अन्य समस्याओं से वयस्कों में हो जाता है। केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. सुधीर सिंह ने कहा कि कुलपति की मंशा इलाज और पढ़ाई के साथ ही उच्चकोटि के शोध के लिए भी रहती है। केजीएमयू के शिक्षक इसके लिए दिन-रात काम करते हैं। इस तरह के शोध के लिए शिक्षक बधाई के पात्र हैं।
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डेल्टा वैरिएंट से पांच गुना ज्यादा संक्रामक है ओमिक्रॉन
लखनऊ। कोरोना का नया वैरिएंट ओमिक्रॉन डेल्टा के मुकाबले कम घातक है, लेकिन इसकी संक्रामक क्षमता उससे पांच गुना अधिक है। अब तक की रिपोर्ट के अनुसार, ओमिक्रॉन की चपेट में आने के बाद आईसीयू में जाने व ऑक्सीजन की जरूरत तो नहीं पड़ेगी, लेकिन यह कैसे नुकसान पहुंचाएगा, इसके बारे में स्थिति अभी साफ नहीं है। ऐसे में जरूरी है कि इसे हल्के में न लें और बचाव के उपाय अपनाते रहें। यह कहना है राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन उत्तर प्रदेश के कोविड टीकाकरण के ब्रांड एंबेसडर डॉ. सूर्यकांत का। उनके अनुसार, ओमिक्रॉन से बचने के लिए पांच जरूरी मंत्रों समय से कोविड टीके की दोनों डोज, मास्क, दो गज की दूरी, हाथों की अच्छे से साफ करना तथा हाथ मिलाने से बचना, को जीवन में उतार लें।
22 में से किसी में नहीं मिला ओमिक्रॉन
लखनऊ। राजधानी में बीते दिनों कोरोना संक्रमित पाए गए 22 लोगों की जीनोम सिक्वेसिंग में पता चला है कि उनमें अब भी डेल्टा वैरिएंट है। इससे स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ गई है। हालांकि, राहत वाली बात यह है कि किसी में भी कोरोना का नया वैरिएंट ओमिक्रॉन नहीं मिला है। डिप्टी सीएमओ डॉ. मिलिंद वर्धन का कहना है कि सभी मरीज घरों में हैं और स्वस्थ हैं। किसी को भी अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत नहीं पड़ी है।
अब विमान से उतरते ही होगी जांच
लखनऊ। एयरपोर्ट पर अब विमान से उतरते ही यात्रियों की कोरोना जांच होगी। अभी तक टर्मिनल से निकलने से पहले जांच की जा रही थी। ओमिक्रॉन को देखते हुए डीजीसीए ने ये निर्देश दिए हैं। अब इंटरनेशनल टर्मिनल पर यात्री विमान से उतरने के बाद बस में बैठेंगे। यह उन्हें टर्मिनल के बाहर टैक्सी-वे की ओर बने टेंट के पास ले जाएगी, जहां आरटीपीसीआर जांच होगी। अभी तक यात्री इमिग्रेशन, कस्टम व अन्य सामान्य जांचों के बाद कोरोना टेस्ट के लिए ले जाए जाते थे। इससे काउंटरों के कर्मचारियों व अधिकारियों के संक्रमित होने की आशंका रहती थी।
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केजीएमयू के पैथोलॉजी विभाग की डॉ. गीता यादव और अन्य चिकित्सकों की टीम की निगरानी में यह शोध हुआ। इसके अनुसार कोविड मरीजों की रिपोर्ट निगेटिव आने के बावजूद उनकी हालत बिगड़ रही थी। सेरेटिन और एलडीएच, हीमोग्लोबिन और प्लेटलेट्स की जांच के आधार पर मरीजों में एचएलएच होने की आशंका बढ़ी। इसकी पुष्टि के लिए बोनमैरो जांच की गई। इसमें पाया कि निगेटिव रिपोर्ट के बावजूद खराब हालत वाले सभी मरीजों में एचएलएच की समस्या थी।
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दूसरी लहर में मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा थी, जिससे सभी का टेस्ट संभव नहीं हो सका। इसके बावजूद एचएलएच की आशंका वाले मामलों में स्टेरॉयड और अन्य तकनीक का इस्तेमाल किया। इससे काफी मरीजों की जान बचाई जा सकी। इस पेपर को इंटरनेशनल जर्नल ऑफ लैबोरेट्री हेमेटोलॉजी में प्रकाशित किया गया। केजीएमयू के रिसर्च शोकेस में इसे पैरा-क्लीनिकल पेपर की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ करार दिया गया।
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जानिए क्या है एचएलएच
एचएलएच ऐसी स्थिति होती है, जिसमें रोगी की प्रतिरोधक क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि यह सामान्य कोशिकाओं को भी क्षतिग्रस्त करने लगती है। इससे विभिन्न अंग भी प्रभावित होने लगते हैं। यह दो प्रकार के होते हैं। पहला बच्चों में जन्मजात या आनुवांशिक वजह से होता है। दूसरा प्रकार वायरल या अन्य समस्याओं से वयस्कों में हो जाता है। केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. सुधीर सिंह ने कहा कि कुलपति की मंशा इलाज और पढ़ाई के साथ ही उच्चकोटि के शोध के लिए भी रहती है। केजीएमयू के शिक्षक इसके लिए दिन-रात काम करते हैं। इस तरह के शोध के लिए शिक्षक बधाई के पात्र हैं।
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डेल्टा वैरिएंट से पांच गुना ज्यादा संक्रामक है ओमिक्रॉन
लखनऊ। कोरोना का नया वैरिएंट ओमिक्रॉन डेल्टा के मुकाबले कम घातक है, लेकिन इसकी संक्रामक क्षमता उससे पांच गुना अधिक है। अब तक की रिपोर्ट के अनुसार, ओमिक्रॉन की चपेट में आने के बाद आईसीयू में जाने व ऑक्सीजन की जरूरत तो नहीं पड़ेगी, लेकिन यह कैसे नुकसान पहुंचाएगा, इसके बारे में स्थिति अभी साफ नहीं है। ऐसे में जरूरी है कि इसे हल्के में न लें और बचाव के उपाय अपनाते रहें। यह कहना है राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन उत्तर प्रदेश के कोविड टीकाकरण के ब्रांड एंबेसडर डॉ. सूर्यकांत का। उनके अनुसार, ओमिक्रॉन से बचने के लिए पांच जरूरी मंत्रों समय से कोविड टीके की दोनों डोज, मास्क, दो गज की दूरी, हाथों की अच्छे से साफ करना तथा हाथ मिलाने से बचना, को जीवन में उतार लें।
22 में से किसी में नहीं मिला ओमिक्रॉन
लखनऊ। राजधानी में बीते दिनों कोरोना संक्रमित पाए गए 22 लोगों की जीनोम सिक्वेसिंग में पता चला है कि उनमें अब भी डेल्टा वैरिएंट है। इससे स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ गई है। हालांकि, राहत वाली बात यह है कि किसी में भी कोरोना का नया वैरिएंट ओमिक्रॉन नहीं मिला है। डिप्टी सीएमओ डॉ. मिलिंद वर्धन का कहना है कि सभी मरीज घरों में हैं और स्वस्थ हैं। किसी को भी अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत नहीं पड़ी है।
अब विमान से उतरते ही होगी जांच
लखनऊ। एयरपोर्ट पर अब विमान से उतरते ही यात्रियों की कोरोना जांच होगी। अभी तक टर्मिनल से निकलने से पहले जांच की जा रही थी। ओमिक्रॉन को देखते हुए डीजीसीए ने ये निर्देश दिए हैं। अब इंटरनेशनल टर्मिनल पर यात्री विमान से उतरने के बाद बस में बैठेंगे। यह उन्हें टर्मिनल के बाहर टैक्सी-वे की ओर बने टेंट के पास ले जाएगी, जहां आरटीपीसीआर जांच होगी। अभी तक यात्री इमिग्रेशन, कस्टम व अन्य सामान्य जांचों के बाद कोरोना टेस्ट के लिए ले जाए जाते थे। इससे काउंटरों के कर्मचारियों व अधिकारियों के संक्रमित होने की आशंका रहती थी।