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ये लक्षण दिखें तो तुरंत कराएं जांच, नवजात को शारीरिक व मानसिक रोगों से रखेगी दूर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sat, 13 Oct 2018 03:32 PM IST
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डेमो
- फोटो : डेमो
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यदि नवजात बच्चे की छह माह के भीतर एक जांच करा ली जाए तो उसे मानसिक और शारीरिक विकास की बाधा से बचाया जा सकता है। इस जांच के जरिए उनके मेटाबॉलिज्म की स्थिति पता चल जाती है और भविष्य में होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का भी समय रहते समाधान कर लिया जाता है।
इन दिनों करीब 30 फीसदी बच्चों में इनबॉर्न एरर मेटाबॉलिज्म संबंधी दिक्कतें पाई जा रही हैं। यह खुलासा हुआ है केजीएमयू के बायोकेमिस्ट्री विभाग की जांच में। इसमें करीब पांच सौ बच्चों के नमूने लिए गए। इसमें डेढ़ सौ से ज्यादा में यह समस्या पाई गई।
बच्चे के चार-पांच साल की उम्र के बाद तमाम अभिभावक समस्या लेकर आते हैं कि उनके बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास उम्र के अनुरूप नहीं हो रहा है। कई बच्चे सात से आठ साल के हो जाते हैं, लेकिन उनका शारीरिक विकास दो से तीन साल की उम्र जैसा दिखता है।
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वहीं कुछ मानसिक रूप से कमजोर रह जाते हैं। पांच साल के बाद यदि चिकित्सक तमाम प्रयास करें तो भी बच्चों का मेटाबॉलिज्म अपडेट नहीं हो पाता है। यदि हो भी जाए तो उसका औसत काफी कम होता है।
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इन दिनों करीब 30 फीसदी बच्चों में इनबॉर्न एरर मेटाबॉलिज्म संबंधी दिक्कतें पाई जा रही हैं। यह खुलासा हुआ है केजीएमयू के बायोकेमिस्ट्री विभाग की जांच में। इसमें करीब पांच सौ बच्चों के नमूने लिए गए। इसमें डेढ़ सौ से ज्यादा में यह समस्या पाई गई।
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बच्चे के चार-पांच साल की उम्र के बाद तमाम अभिभावक समस्या लेकर आते हैं कि उनके बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास उम्र के अनुरूप नहीं हो रहा है। कई बच्चे सात से आठ साल के हो जाते हैं, लेकिन उनका शारीरिक विकास दो से तीन साल की उम्र जैसा दिखता है।
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वहीं कुछ मानसिक रूप से कमजोर रह जाते हैं। पांच साल के बाद यदि चिकित्सक तमाम प्रयास करें तो भी बच्चों का मेटाबॉलिज्म अपडेट नहीं हो पाता है। यदि हो भी जाए तो उसका औसत काफी कम होता है।
डॉक्टर भी नहीं देते ध्यान
इस समस्या को इनबार्न एरर मेटाबोजिल्म कहते हैं। इस पर बायोकेमिस्ट्री विभाग के डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार सोनकर ने रिसर्च की है। उन्होंने एक माह में करीब पांच सौ बच्चों की जांच की। इस दौरान करीब डेढ़ सौ में यह समस्या पाई गई।
डॉ. सोनकर ने बताया कि इस समस्या को खत्म करने के लिए पैदा होने के छह माह के भीतर कभी भी बच्चे की जांच कराई जा सकती है। इसकेलिए केजीएमयू में हाई परफॉर्मेंस लिक्विड क्रोमेटोग्राफी (एचपीएलसी) और गैस क्रोमेटोग्राफी मास स्पेक्टोमेट्री (जीसीएमएस) जांच की जाती है।
इस जांच से स्थिति का पता चल जाता है। तत्काल इलाज शुरू कर दिया जाए तो शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर होता है। खास बात यह है कि जन्म के बाद पीलिया, थाइरॉयड आदि की जांचें कराई जाती हैं।
उसी के साथ एचपीएलसी और जीसीएमएस जांच भी कराई जा सकती है। लेकिन जानकारी के अभाव में अभिभावक यह जांचें नहीं कराते हैं। ज्यादातर चिकित्सक भी इन जांचों पर गौर नहीं करते हैं।
डॉ. सोनकर ने बताया कि इस समस्या को खत्म करने के लिए पैदा होने के छह माह के भीतर कभी भी बच्चे की जांच कराई जा सकती है। इसकेलिए केजीएमयू में हाई परफॉर्मेंस लिक्विड क्रोमेटोग्राफी (एचपीएलसी) और गैस क्रोमेटोग्राफी मास स्पेक्टोमेट्री (जीसीएमएस) जांच की जाती है।
इस जांच से स्थिति का पता चल जाता है। तत्काल इलाज शुरू कर दिया जाए तो शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर होता है। खास बात यह है कि जन्म के बाद पीलिया, थाइरॉयड आदि की जांचें कराई जाती हैं।
उसी के साथ एचपीएलसी और जीसीएमएस जांच भी कराई जा सकती है। लेकिन जानकारी के अभाव में अभिभावक यह जांचें नहीं कराते हैं। ज्यादातर चिकित्सक भी इन जांचों पर गौर नहीं करते हैं।
समस्या होने की वजह
डॉ ज्ञानेंद्र सोनकर
- फोटो : अमर उजाला
एचपीएलसी और जीसीएमएस जांच के जरिए बच्चों में होने वाली अनुवांशिक बीमारियों के बारे में भी जानकारी मिल जाती है। परिवार की हिस्ट्री और जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्काल इलाज शुरू कर दिया जाए तो बीमारियों को रोका जा सकता है।
डॉ. ज्ञानेंद्र सोनकर ने बताया कि मेटॉबॉलिज्म संबंधी समस्या की वजह अनुवांशिक भी होती है और खानपान एवं पर्यावरण के असर की वजह से भी। इसलिए इसके फैलने की कोई एक वजह नहीं है। सगोत्रीय शादी भी इसकी एक वजह है। एक ही गोत्र में शादी होने की वजह से लोगों में जीन संबंधी दिक्कतें आती है।
ये लक्ष्ण दिखें तो तुरंत जांच कराएं
- परिवार में कोई बीमारी कई पीढ़ियों से चली आ रही हो।
- बच्चा दूध न पीए, अपच हो रहा हो तो भी जांच कराएं।
- किसी महिला के पहले बच्चे की पैदा होते ही अचानक मौत हो गई हो।
- अगले गर्भ के दौरान और प्रसव के बाद बच्चे की जांच जरूर कराएं।
- बच्चे की पेशाब सफेद हो और वह आधे घंटे में काली पड़ जाए।
डॉ. ज्ञानेंद्र सोनकर ने बताया कि मेटॉबॉलिज्म संबंधी समस्या की वजह अनुवांशिक भी होती है और खानपान एवं पर्यावरण के असर की वजह से भी। इसलिए इसके फैलने की कोई एक वजह नहीं है। सगोत्रीय शादी भी इसकी एक वजह है। एक ही गोत्र में शादी होने की वजह से लोगों में जीन संबंधी दिक्कतें आती है।
ये लक्ष्ण दिखें तो तुरंत जांच कराएं
- परिवार में कोई बीमारी कई पीढ़ियों से चली आ रही हो।
- बच्चा दूध न पीए, अपच हो रहा हो तो भी जांच कराएं।
- किसी महिला के पहले बच्चे की पैदा होते ही अचानक मौत हो गई हो।
- अगले गर्भ के दौरान और प्रसव के बाद बच्चे की जांच जरूर कराएं।
- बच्चे की पेशाब सफेद हो और वह आधे घंटे में काली पड़ जाए।