मोदी ने इस तरह मारा माया-मुलायम का मैदान
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यूपी के नतीजे हैरान करने वाले हैं। सबकी जुबां पर एक
दरअसल, यूपी ने भाजपा को छप्परफाड़ जीत दी है। ऐसी जीत की उम्मीद खुद पार्टी नेताओं तक को नहीं थी। बेहद आशावादी भाजपाई भी 55 तक पहुंचकर ठिठक जाते थे। बेशक यह जीत नरेंद्र मोदी की है।
कांग्रेस ने देश में जो नैतिक और राजनीतिक शून्यता पैदा की, मोदी उसमें एक स्वाभाविक विकल्प बने। देश भर के नतीजे इसे पुख्ता करते हैं।
यूपी में उनके भरोसेमंद अमित शाह को जीत का श्रेय मिल रहा है, तो यह बेवजह भी नहीं है। वे महज ‘मोदी लहर’ के भरोसे नहीं थे। उन्होंने यूपी की जमीनी हकीकत और युवाओं को नजरअंदाज नहीं किया। जातियों और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को करीने से साधा। नौजवानों को पार्टी में आगे किया।
अमित शाह ने अपनाई अपनी रणनीति
मोदी की जीत में सबसे बड़ी बात यह रही कि अमित शाह ने यूपी के भाजपा नेताओं पर सबसे कम भरोसा किया।
उनकी अपनी रणनीति थी, अपना गणित था और समीकरणों को साधने के अपने तरीके थे।
इन सबको मिलाकर यूपी में व्यापक मोदी लहर बनी, जिसकी आंधी में बसपा और कांग्रेस ही नहीं, सत्तारूढ़ सपा भी उड़ती नजर आई। कांग्रेस और सपा जिन सीटों को बचा पाई है, वो उनके ‘राजपरिवारों’ की सीटें हैं।
बसपाई किले की खिसकाई जमीन
भाजपा की जीत के साथ बसपा का साफ हो जाना, चौंकाने वाला रहा। हालांकि मायावती को अपना वोट बैंक खिसकने का भय शुरू से ही था।
इसीलिए उन्होंने लखनऊ की रैली में दलितों को ये समझाने की कोशिश की थी कि वे हिंदू नहीं हैं। उन्होंने कहा था कि भाजपा दलित बस्तियों में जाकर लोगों को गुमराह कर रही है कि दलित-हिंदू भाई-भाई हैं।
वे हर सभा में चिल्लाकर मोदी की जाति बेवजह नहीं पूछतीं थीं। मोदी, डॉ. अंबेडकर को याद करें या प्रियंका वाड्रा के ‘नीच राजनीति’ के बयान को अपनी जाति से जोड़ें, सबसे ज्यादा तकलीफ मायावती को ही होती थी।
इसीलिए मीडिया को कोसने के बावजूद उन्होंने प्रचार के दौरान किसी भी दूसरे नेता से ज्यादा प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं और वोट बैंक को खिसकने से बचाने की कवायद भी। लेकिन, मोदी का आकर्षण दलितों को भी भाजपा के पाले में खींच ले गया।
काडर की अति, सपा की दुर्गति
सपा की सरकार को प्रदेश में महज दो साल हुए हैं। जिन उम्मीदों के साथ सरकार बनी थी, जातीय-सांप्रदायिक अतिरेक से लेकर कानून व्यवस्था के मुद्दों पर उसकी साइकिल बार-बार फिसलती रही।
शपथ ग्रहण समारोह के बाद मंच पर ‘उत्साही’ कार्यकर्ताओं का जो तांडव था, वह सड़कों, सरकारी दफ्तरों-थानों और टोल बूथों पर स्थायी भाव में बदलता-सा दिखा।
अखिलेश यादव की जीत महज यादव-मुस्लिम समीकरणों से उपजी जीत नहीं थी। विधानसभा चुनाव में सपा को सभी वर्गों के वोट मिले थे।
लेकिन, राज-काज में सभी वर्गों की सहभागिता वैसी नहीं रही जैसी होनी चाहिए थी। सरकार के प्रति निराशा का यही अंबार ‘वादे पूरी करने वाली सरकार’ को खारिज करने का आधार बना। यही कारण है कि मैदान में उतरे सारे मंत्री और विधायकों को हार का सामना करना पड़ा।
कांग्रेस ने काटा अपना ही सियासी दरख्त
चुनाव में कांग्रेस की यह ‘गति’ खुद उनकी ‘सरकार’ की लिखी हुई है। उसकेसारे मंत्री और दिग्गज निपट गए।
जितिन प्रसाद, श्रीप्रकाश जायसवाल और प्रदीप जैन जैसे मंत्रियों की इलाके में सुलभता और शो-केस में दिखाने के लिए काम होने के बावजूद पार्टी नेतृत्व का अहंकार उन्हें ले डूबा।
‘राज परिवार’ की रायबरेली सीट इसलिए आसानी से खाते में आ गई कि वहां सभी प्रतिपक्षियों ने महज दिखावे के लिए चुनाव लड़ा था।
हालांकि अमेठी में स्मृति ईरानी ‘युवराज’ को जमीन पर तो ले ही आईं। दोनों सीटों पर जीत में सोनिया-राहुल से ज्यादा भूमिका प्रियंका की है। उनके वार भाजपाई दिग्गजों पर भी भारी पड़े थे।
मेहनत विश्वास की, मालमाल हुई स्मृति
अमेठी में राहुल को ललकारने का असली काम ‘आप’ के कुमार विश्वास ने किया था। उनकी मेहनत काशी में अरविंद केजरीवाल से भी ज्यादा थी।
लेकिन, शुरूआत में ‘आप’ के द्वंद्व उन पर भारी पड़े। बाद में, स्मृति ईरानी ने उनकी बोई सारी फसल काट ली। विश्वास जमानत तक नहीं बचा पाए।
इस चुनाव में ‘आप’ की उपलब्धि महज इतनी है कि काशी में मुसलमानों ने केजरीवाल पर सपा और कांग्रेस से ज्यादा भरोसा जताया।
यह भरोसा भविष्य में भी कायम रहेगा, यह तय होना बाकी है। वहीं, राष्ट्रीय लोकदल को अजित सिंह की मौकापरस्ती की कीमत चुकानी पड़ी है। उनका भी खाता तक नहीं खुल पाया।
कोई न भांप पाया सधे कदमों की आहट
भाजपा और मोदी ने जिस तरह समीकरणों को साधा, उसे न सियासतदां समझ पाए, न राजनीतिक पंडित। उनकी रणनीति सधी हुई स्क्रिप्ट जैसी थी।
पश्चिमी यूपी में दंगों के कारण ध्रुवीकरण उनके मनमाफिक था। वहां अमित शाह के ‘बदले’ ने उसको मजबूत कर दिया।
मुजफ्फरनगर में भाजपा की बंपर जीत के साथ ही पहले दौर की सभी दस सीटों पर विजय इसका सुबूत है। ध्रुवीकरण का असर दूसरे दौर तक भी रहा।
इसके बाद उसमें जातीय छौंक लगने लगा। मोदी को जहां पिछड़ी जाति की दरकार थी, वहां वह पिछड़े हो गए और जहां दलितों की दरकार थी, वहां नीच जाति का मुहावरा ले आए।
दो कदम आगे बढ़ गई जातीय सियासत
जातियों की सियासत तो इससे भी आगे बढ़ी। पूर्वांचल में ओमप्रकाश सिंह जैसे अपने कुर्मी नेता की कीमत पर अपना दल से समझौता उसी तरह जाति विशेष में विश्वास जताने में कामयाब रहा, जैसा संदेश बिहार में रामविलास पासवान से समझौते के जरिये दलितों को दिया था।
उदितराज जैसे दलित नेता अपने दम पर कभी नहीं जीत पाए, लेकिन मोदी लहर पर सवारी की तो दिल्ली की सड़क से संसद पहुंच गए।
भाजपा उम्मीदवारों के विरोधियों पर जीत के बड़े अंतर बताते हैं कि मोदी के नाम की विश्वसनीयता तो काम आई ही, साथ में जाति से लेकर प्रचार और रणनीति के मोर्चे पर वक्त के अनुसार किए गए प्रयोग भी विजय के पहाड़ को और ऊंचाई देते गए।
पर, मोदी को मिलेंगी चुनौतियां
भाजपा की ऐतिहासिक जीत के नायक नरेंद्र मोदी हैं तो चुनौतियां भी उन्हीं के लिए हैं। यह जनादेश भाजपा से ज्यादा मोदी के पक्ष में है इसलिए इससे जुड़े जोखिम से भी उन्हें ही मुखातिब होना पड़ेगा।
उन्हें महज काशी ने ही नहीं, पूरी यूपी ने अपनाया है। इस कर्ज को वे कैसे चुकाते हैं, इस पर पूरे देश की निगाहें रहेंगी।
56 इंच का सीना महज प्रचार और वोट पाने का ही जुमला न रह जाए, यूपी में विकास और भाजपा की दशा व दिशा के लिए भी इतने ही चौड़े सीने की दरकार रहेगी।