फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   history of theatre in lucknow

तहजीब के अलावा रंगमंच में भी लखनऊ का कोई सानी नहीं

Sat, 21 Sep 2013 01:43 PM IST
टीम डिजिटल/लखनऊ
टीम डिजिटल/लखनऊ Updated Sat, 21 Sep 2013 01:43 PM IST
विज्ञापन
history of theatre in lucknow

लखनऊ ने तहजीब की दुनिया में जहां एक तहलका पैदा किया था वहीं इस शहर के कंधे पर ललित कलाओं के परवरिश की जिम्मेदारी भी थी।

विज्ञापन


इस तरह नाट्य परंपरा को नई जिंदगी देने का अंजाम दिया। नाटक के इस लंबे सफर पर तमाम भाषाओं के पड़ाव भी आए। अवध के बादशाह नीसरुद्दीन हैदर का शासान काल नाट्य कला के पुनर्जन्म का युग कहा जा सकता है।

ये नृत्य नाटक पूरी तरह से नाटक के करीब नहीं थे जो महल में बादशाह की खुशी की खातिर 'जलसा' नाम से प्रस्तुत किए जाते थे। इसके लिए तमाम जलसेवालियां महल में मुलाजिम थी जो नाच गाने, हाव-भाव और अभिनय कला में पारंगत थीं।
विज्ञापन


अवध सल्तनत में जाने आलम का जमाना इस कला के विकास और लालन पालन का दौर था जब 'शाही स्टेज' को प्रस्तुत किया गया।

19वीं सदी के मध्य में ही मिर्जा अमानत की 'इंदर सभा' ने इस नवाबी नगरी में खूब नाम कमाया। पतन शील संस्कृति, नवाबी का विलासपूर्ण वातावरण और काल्पनिक कुलाचों के कारण 'इंदर सभा' को आदर्श नाट्य प्रसंग नहीं माना गया।
विज्ञापन
विज्ञापन


यही कारण रहा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 'इंदर सभा' का मुंहतोड़ जवाब 'बंदर सभा' लिखकर दिया। आगे चलकर प्रेमेचंद ने भी 'शबेतार' और 'कर्बला' जैसे ऊर्द नाटक लिखे जो खासे प्रसिद्ध हुए। ब्रिटिश शासल काल में लखनऊ में खास लोक नाट्य भतृहरि, दिलदार नगीना और स्वांग सपेरा रहे हैं।

लखनऊ में नाटकों की एक ऐतिहासिक परंपरा रही है जिसे पुराने लखनऊ की दिलाराम बारादरी से लेकर ब्रिटिश पीरियड में बुलंद बाग की करीब होने वाले थिएटरों तक जोड़ा जा सकता है।

लखनऊ में उमराव की पार्टी और रामनाथ मंडली की नौटंकी का बड़ा नाम रहा है। 19वीं सदी में सेठ पेस्टन जी करीमजी और ओरिजनल थिएट्रिकल कंपनी का बोलबाला था। बाद में चलकर इस कंपनी ने विक्टोरिया थियोट्रिकल कंपनी और ऐलफ्रेड थिएट्रिकल कंपनी की स्थापना की।

स्मरणीय नाटकों में चंद्रावली को कैसे भूला जा सकता है। सैयद मेंहदी असन के इस नाटक लखनऊ ही नहीं पूरे देश में नाम कमाया था। आगा हश्र कशमीरी भी एक मशहूर नाटकार रहे हैं और उन्होंने आफताबे मुहब्बत लिखा।

आगा के नाटक बोलचाल की भाषा में होने लोगों में बहुत कम वक्त में ही मशहूर हो गए थे। प्रथम विश्च युद्ध के बाद नाटकों और उनके थीम में बड़ा अंतर आया। अब खयाली किस्सों को छोड़कर सामाजिक, राजनैतिक और राष्ट्रवादी नाटकों की प्रस्त़ति पर ध्यान दिया जाने लगा।


हुसैनी मियां और जरीफ लखनवी के बाद आगा हश्र कश्मीरी के ऊर्दू नाटक भी इसी धारा में शामिल हो गए और इसके साथ ही धीरे-धीरे पारसी शैली के थिएटरों को सिनेमा की ओर मोड़ देने का पहला कदम मेडेन थिएट्रिकल कंपनी ने उठाया जब सन् 1922 में इस कंपनी ने अपनी फिल्म का निर्माण शुरू किया।

बेशक जमाना बदल रहा है और हम रवायतों से विमुख होते जा रहे हैं लेकिन आज भी लखनऊ के माहौल में पुरानी परिपाटी के थिएटरों की कद्र बाकी है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed