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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Hindus also express grief on shahadat of Imam Husain.

Lucknow: हिंदू अजादारों के घर भी गूंज रहीं या हुसैन... की सदाएं, हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की बने मिसाल

Wed, 17 Jul 2024 10:48 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव मोहम्मद इरफान, अमर उजाला, लखनऊ
मोहम्मद इरफान, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Wed, 17 Jul 2024 10:48 AM IST
सार

लखनऊ में कई हिंदू अजादार भी इमाम हुसैन की शहादत का गम मनाते हैं। वे मजलिसों में शामिल होते हैं और मातम कर इमाम को पुरसा देते हैं।

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Hindus also express grief on shahadat of Imam Husain.
चंद्र किशोर राठौर उर्फ चुन्ना भाई। - फोटो : amar ujala

विस्तार

किसी का कोई मर जाए हमारे घर में मातम है, गरज बारह महीने तीस दिन को मुहर्रम है। रिंद लखनवी का ये शेर हमारे लखनऊ पर बिल्कुल सटीक बैठता है। राजधानी में मुसलमानों के अलावा कई हिंदू अजादार भी इमाम हुसैन की शहादत का गम मनाते हैं। वे मजलिसों में शामिल होते हैं और मातम कर इमाम को पुरसा देते हैं। हिन्दू-मुस्लिम एकता और भाईचारे की मिसाल बने ऐसे ही हिंदू अजादारों से बात की मोहम्मद इरफान ने।

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मातम कर मनाते हैं इमाम की शहादत का गम
चंद्र किशोर राठौर उर्फ चुन्ना भाई ने मंसूर नगर में अपने तीन कमरों के मकान के एक हिस्से में करीब 35 साल पहले इमामबाड़ा सजाया था। मां तारा देवी नाराज हुईं लेकिन बाद में मान गईं। विवाह हुआ तो पत्नी संगीता राठौर ने कभी विरोध नहीं किया। बताया कि वे इमाम हुसैन और उनके भतीजे हजरत कासिम की जियारत भी कर चुके हैं। चुन्ना भाई मुहर्रम में मजलिस में जाते हैं और मातम कर इमाम की शहादत का गम मनाते हैं। उन्होंने बताया कि घर का इमामबाड़ा पूरे साल सजा रहता है। मुहर्रम में पड़ोस के आठ हिंदू परिवार इमामबाड़े में अपने मन्नती ताजिये रखते हैं। मुहर्रम की नौ तारीख यानि शब-ए-आशूर में रात भर हिन्दू महिलाएं नौहाख्वानी करती हैं।

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25 साल से कायम है घर में इमामबाड़ा

Hindus also express grief on shahadat of Imam Husain.
रमेश चंद्र। - फोटो : amar ujala

फौज में हवलदार के पद से वर्ष 1984 में रिटायर हुए रमेश चंद्र ने नरही स्थित अपने निवास पर करीब 25 साल पहले इमामबाड़ा कायम किया। वे बताते हैं कि नवाब साहब जिन्हें वो बाबा भाई बुलाते थे। उनको ख्वाब आया कि मैं घर पर इमामबाड़ा सजाऊं। मेरे दादा पहले से ताजियादारी करते थे तो हजरत इमाम हुसैन पर आस्था थी। बाबा भाई ने एक ताजिया लाकर दिया और घर में इमामबाड़ा कायम हो गया। पूरे साल इमामबाड़ा सजा रहता है।

मुहर्रम में मजलिस और तबर्रुक भी बांटते हैं। उन्होंने बताया कि हमारे इमामबाड़े में करीब 35 हिंदू परिवार अपने मन्नती ताजिए रखते हैं। शब-ए-आशूर को सभी परिवार पूरी रात नौहाख्वानी करते हैं और मातम कर इमाम हुसैन को पुरसा देते हैं।

हुसैनी ब्राह्मण के रूप में है गायिका सुनीता झिंगन की पहचान

Hindus also express grief on shahadat of Imam Husain.
मशहूर गायिका सुनीता झिंगरन - फोटो : amar ujala
ठुमरी, ख्याल, दादरा और गजल के लिए मशहूर गायिका सुनीता झिंगरन को हुसैनी ब्राह्मण के तौर पर जाना जाता है। वे बताती हैं कि करीब 20 साल से अहलेबैत की सेवा करती आ रही हैं। सोशल मीडिया पर मर्सिया पढ़ते हुए उनके तमाम वीडियो मौजूद हैं। मुहर्रम में मजलिसों में वे अपने मखसूस अंदाज में मर्सिया पढ़ती थीं तो सुनने वालों की आंखों से आंसू निकल आते थे। उन्होंने बताया कि अपने स्टूडियो में अलम सजा रखे थे। इधर एक-दो साल से मर्सिया पढ़ने नहीं निकल पा रही हूं।
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