{"_id":"98142ff67445098b63ca8bb23d4c2ee3","slug":"hindu-save-muslim-life","type":"story","status":"publish","title_hn":"हिंदू के लिवर से मुस्लिम मरीज को मिला जीवन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हिंदू के लिवर से मुस्लिम मरीज को मिला जीवन
अमित यादव/लखनऊ
Updated Fri, 20 Dec 2013 01:55 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
13 दिसंबर 2013 को 12 घंटे तक चली एक सर्जरी ने दो धर्मों की दूरियों को मिटा दिया।
विज्ञापन
केजीएमयू में ब्रेन डेड घोषित किए गए लालता प्रसाद के लिवर को एसजीपीजीआई में एक मुस्लिम मरीज में प्रत्यारोपित कर दिया गया।
इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी धार्मिक दीवारें अड़चन नहीं बनीं। लालता प्रसाद भले ही अब भले ही जिंदा न हों लेकिन, उनके लिवर के सहारे वह मरीज इस दुनिया में जीवित रहेगा। वहीं एक अन्य महिला किडनी प्रत्यारोपण के बाद तेजी से स्वस्थ हो रही है।
किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) और संजय गांधी पीजीआई (एसजीपीजीआई) के चिकित्सकों की टीम ने 12 से 13 दिसंबर तक मस्तिष्क मृत लालता प्रसाद के अंग लेकर जिन मरीजों की जान बचायी वह चिकित्सा जगत के इतिहास में दर्ज हो गई है।
विज्ञापन
इस पूरे प्रयास में सिर्फ दो संस्थानों के डॉक्टर ही नहीं शामिल थे, सबसे बड़ी भूमिका लालता प्रसाद के परिजनों की थी। जिन्होंने अंगदान के महत्व को समझा। इसके बाद जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की मदद नेे इस पूरे प्रत्यारोपण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विज्ञापन
इस सामंजस्य का नतीजा ये हुआ कि मस्तिष्क मृत लालता प्रसाद की दो किडनी, एक लिवर और दो कार्निया मरीजों को प्रत्यारोपित कर दी गई। इससे न सिर्फ दो लोगों का जीवन बचा और दो अन्य लोग लालता की आंखों से इस संसार को देखने में सक्षम हो गए।
टीम के सदस्यों केजीएमयू के कुलपति प्रो. डी.के. गुप्ता, एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. आर.के. शर्मा, लिवर ट्रांसप्लांट यूनिट और सर्जिकल गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड प्रो. राजन सक्सेना, यूरोलॉजी विभाग के हेड प्रो. राकेश कपूर, केजीएमयू सर्जिकल गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभाग के हेड प्रो. अभिजीत चंद्रा ने इस सफलता को सभी के साथ बांटा।
प्रो. राजन सक्सेना ने बताया कि इस प्रत्यारोपण ने ये सिद्ध कर दिया कि बीमारी किसी का जाति-धर्म देखकर नहीं होती। न ही इलाज जाति-धर्म देखकर होता है। ये सब मानवों के बनाए हुए ही ऐसे बैरियर हैं जो एक-दूसरे के बीच दूरियां पैदा कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि लालता प्रसाद का लिवर जिस मरीज को लगाया गया है वह डॉक्टर है। उसके परिवार के पांच लोगों ने लिवर दान देने की कोशिश की लेकिन एक का भी लिवर मैच नहीं किया।
लालता प्रसाद की जांच से जैसे ही पता चला कि उनका लिवर मरीज को मैच करेगा। प्रत्यारोपण की तैयारियां शुरू कर दी गईं।
लालता का ब्लड ग्रुप ओ होने के कारण प्रत्यारोपण के सफल होने की संभावना और बढ़ गई क्योंकि इस ग्रुप के मरीज का खून या अंग सभी को दिया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि 13 दिसंबर की दोपहर 2.45 से रात 2.45 तक चली सर्जरी के बाद 48 वर्षीय मरीज को लिवर प्रत्यारोपित कर दिया गया।