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65 साल में नहीं रिटायर होंगे आयोग के अध्यक्ष

Sat, 05 Jul 2014 01:37 AM IST
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 05 Jul 2014 01:37 AM IST
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higher education commission chief retirement

उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा आयोग के अध्यक्ष अब 68 साल की उम्र में रिटायर होंगे। शुक्रवार को विधानसभा में विपक्ष के विरोध के बावजूद आयोग के अध्यक्ष की सेवानिवृत्ति की आयु तीन वर्ष बढ़ाने संबंधी विधेयक ध्वनिमत से पारित कर दिया।

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इस मामले में विपक्ष ने सरकार पर एक व्यक्ति विशेष को उपकृत करने का आरोप लगाया।

शून्य प्रहर में भाजपा के डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने उप्र. उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग (द्वितीय संशोधन) विधेयक 2014 को सदन की प्रवर समिति को सौंपने की मांग की।
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उन्होंने सरकार से पूछा कि ऐसी कौन सी परिस्थिति पैदा हो गई है कि आयोग के अध्यक्ष की सेवानिवृत्ति आयु सीमा 65 से 68 साल करनी पड़ रही है।

डॉक्टरों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ा दी जाए

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डा. राधा मोहन दास अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए उम्र की सीमा बढ़ाई जा रही है।

अग्रवाल का कहना था कि जब अन्य आयोगों के अध्यक्षों के रिटायरमेंट की उम्र 65 साल है तो केवल इस एक आयोग के अध्यक्ष की उम्र 68 साल क्यों की जा रही है?

सूबे में डॉक्टरों की काफी कमी है, इसके बावजूद उनके रिटायरमेंट की उम्र सीमा नहीं बढ़ाई जा रही है। इतना ही नहीं मेडिकल कॉलेजों के प्रोफेसरों के रिटायर होने की उम्र नहीं बढ़ाई जा रही है।

पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री अंबिका चौधरी ने डॉ. अग्रवाल के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भाजपा के सदस्य ने आयोगों के अध्यक्षों के रिटायरमेंट की उम्र में एकरूपता की बात की है।

राज्यपाल से ली जाएगी अनुमति

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उच्च शिक्षा आयोग के अध्यक्ष के रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने पर विरोध नहीं जताया है। भाजपा के जबर्दस्त विरोध के बावजूद सरकार ने बहुमत के आघार पर सदन ने इस विधेयक को पारित करा लिया।

राज्यपाल का अनुमोदन मिलते ही यह विधेयक कानून का रूप ले लेगा।

कांग्रेस का बहिर्गमन, बसपा-रालोद ने रहे मौन

उप्र. उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग (द्वितीय संशोधन) विधेयक 2014 पर चर्चा शुरू होने से पहले कांग्रेस के सदस्य इलाहाबाद कुंभ मेला, स्मारकों के निर्माण, जेपी को अनियमित ढंग से जमीन आवंटित किए जाने को लेकर सीएजी रिपोर्ट में उठाई गई आपत्तियों की जांच की मांग को लेकर सदन से बहिर्गमन कर गए थे। बसपा और रालोद सदस्य सदन में रहने के बावजूद इस मसले पर चुप रहे।

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