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जांच में खामी के आधार पर छोड़ा तो हर दुराचारी छूट जाएगा: हाईकोर्ट

Sun, 12 Jun 2016 03:27 PM IST
अभिषेक यादव/अमर उजाला, लखनऊ
अभिषेक यादव/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 12 Jun 2016 03:27 PM IST
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Highcourt rejects petition of a rape accused.

हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने किशोरी से दुराचार के एक मामले में कहा है कि जांच में खामी रहने के आधार पर अगर अपराधी को छोड़ दिया जाएगा तो हर दुराचारी छूट जाएगा।

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हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी राजधानी की फास्ट ट्रैक कोर्ट में दोषी करार दिए गए और सात साल की सजा भुगत रहे अभियुक्त की याचिका खारिज करते हुए की। अदालत ने कहा कि पुलिस जांच में कोई न कोई खामी हो सकती है, मगर इसका लाभ अपराधी को नहीं दिया जा सकता।
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अक्षम जांच एजेंसियां कई बार गलतियां करती हैं, उन्हें गैर जरूरी महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। खासतौर से महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में। ऐसा किया जाए तो हर अपराधी पर चल रहा केस अंतत: उसे रिहा करते हुए खत्म होगा।
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जस्टिस डॉ. विजय लक्ष्मी ने कहा कि अभियुक्त ने पीड़िता के बयानों को अपुष्ट बताकर निर्णय को चुनौती दी है। इससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। निर्णय के लिए साक्ष्यों में दम होना चाहिए, उनकी संख्या अधिक होने की जरूरत नहीं है।

अगर पीड़िता का बयान विश्वसनीय लगता है और ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है जिसमें उसकी बात गलत साबित हो तो केवल उसके बयान के आधार पर भी निर्णय दिए जा सकते हैं। मौजूदा केस में भी पीड़िता के बयान को विश्वसनीय माना गया है।

याचिका में सबूतों पर उठाए सवाल

Highcourt rejects petition of a rape accused.

सजायाफ्ता जगमोहन ने अपनी याचिका में कहा कहा था उसे दुश्मनी की वजह से दुराचार के मामले में गलत फंसाया गया है। घटना वाले दिन 22 अक्तूबर 2009 को इस मामले में जो एफआईआर दर्ज कराई गई थी, उसमें आईपीसी की धारा 354 के तहत शील भंग का मामला दर्ज कराया गया था।

लेकिन, तीन दिन बाद आईपीसी की धारा 376 भी जोड़कर दुराचार का आरोप भी जड़ दिया गया। पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर भी मामला ज्यादा से ज्यादा शील भंग का ही बनता है।

क्या कहा कोर्ट ने -
जस्टिस डॉ. विजय लक्ष्मी ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि अभियुक्त के खिलाफ पीड़िता और गवाहों के बयान स्पष्ट और आरोपों की पुष्टि करने वाले हैं। पीड़िता के भाई से अभियुक्त की दुश्मनी खेतों में पानी बांटने को लेकर थी। ऐसी दुश्मनी के लिए कोई भाई अपनी किशोरी व अविवाहित बहन के साथ बलात्कार का झूठा केस दर्ज नहीं करवा सकता।

मेडिकल कराने आई बयान देने नहीं...ऐसा संभव नहीं

Highcourt rejects petition of a rape accused.

कोर्ट ने कहा कि पीड़िता का मेडिकल घटना के तीन दिन बाद कराया गया, लेकिन केस डायरी में बयान का कोई पर्चा नहीं था। जांच अधिकारी पुलिस इंस्पेक्टर विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि बयान देने नहीं आई...। यह बात मानने की कोई वजह नहीं है। जांच अधिकारी की बात का विश्वास नहीं किया जा सकता है।

जांच में हुई लापरवाही
अदालन ने कहा कि पीड़िता के कपड़े एक पैकेट में सील किए गए थे, लेकिन इसे कभी ट्रायल कोर्ट के सामने नहीं रखा गया। यह लापरवाही तो है लेकिन इसके आधार पर अपराधी को लाभ नहीं दिया जा सकता।

जांच में अगर कोई कमी रह गई है तो पीड़िता और उसके भाई व पड़ोसी के बयानों से वह दूर हो जाती है।

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