HC का अभूतपूर्व फैसला, बढ़ा मरीजों का हौसला
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चाहे सरकारी डॉक्टर हों या प्राइवेट, उन्हें मरीजों को उनके इलाज का ब्यौरा देना ही होगा। वह भी मरीज के डिस्चार्ज होने के 72 घंटे के अंदर।
ऐसा नहीं करने पर उन्हें जुर्माना अदा करना होगा। क्लीनिक या अस्पताल को सील भी किया जा सकता है। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को यह अहम फैसला दिया।
अदालत ने साफ कर दिया कि मरीज को क्या इलाज दिया गया, यह जानना उसका हक है। अंधेरे में रखकर कोई इलाज नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह व न्यायमूर्ति अरविंद कुमार त्रिपाठी की खंडपीठ ने यह अहम फैसला समीर कुमार व विमला देवी की याचिकाएं एक साथ मंजूर करते हुए सुनाया।
अदालत का आदेश सब पर लागू
दोनों मामलों में मरीजों के इलाज का ब्यौरा देने में आनाकानी की गई जिसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में गुहार लगाई थी। दरअसल मुआवजे का दावा व कानूनी कार्रवाई के लिहाज से मेडिकल रिकॉर्ड अहम होता है। रिकॉर्ड नहीं मिलने पर दावेदार को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
अदालत ने साफ किया कि उसका आदेश पीजीआई, केंद्रीय व राज्य के चिकित्सा विश्वविद्यालयों, मेडिकल कॉलेज, नर्सिंग होम, क्लीनिकों समेत निजी व सरकारी मदद से चलने वाले सभी अस्पतालों पर लागू होंगे।
अदालत ने कहा कि डिस्चार्ज के वक्त हर हाल में मरीज या उनके तीमारदार को मेडिकल रिकॉर्ड की एक कॉपी मुहैया कराई जाए।
अदालत ने कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड सभी संस्थान सुरक्षित रखेंगे। न सिर्फ एलोपैथिक अस्पतालों में रिकॉर्ड को मेंटेन रखा जाएगा, बल्कि आयुर्वेद, होम्योपैथी, यूनानी व अन्य विधा से इलाज करने वाले संस्थान भी मरीज का रिकॉर्ड रखेंगे।
पर्चे पर भी लिखना होगा मेडिकल रिकॉर्ड के हकदार
कोर्ट ने सख्त ताकीद की कि इलाज के पर्चे पर साफ तौर पर लिखा जाए कि आप डिस्चार्ज या इलाज खत्म होने पर मेडिकल रिकार्ड की कॉपी के हकदार हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई भी मेडिकल स्टैब्लिशमेंट बिना रजिस्ट्रेशन के काम नहीं कर सकेंगे। यानी कि निजी क्लीनिक से लेकर बड़े सरकारी व प्राइवेट अस्पताल चलाने के लिए इनका पंजीकरण जरूरी होगा।
ऑनलाइन भी करा सकेंगे रजिस्ट्रेशन
कोर्ट ने यह भी कहा कि अस्पतालों का पंजीकरण शुल्क तर्कसंगत हो साथ ही ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की भी सुविधा मुहैया कराई जाए। कोर्ट ने कहा इस बाबत राज्य सरकार नियम-कानून बनाने पर गौर करे।
न दें रिकॉर्ड तो यह करे सरकार
कोर्ट ने कहा कि अगर कोई 72 घंटे में मेडिकल रिकॉर्ड नहीं दे तो सरकार ऐसे क्लीनिकल संस्थान को सील कर सकती है और उसका रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकेगा। साथ ही जुर्माना भी ठोका जा सकेगा।
कोर्ट ने कहा कि सूबे के मुख्य सचिव इस फैसले के तहत समुचित निर्देश या सर्कुलर जारी करवाएंगे। साथ ही सभी मौजूदा शासनादेश व सर्कुलर फैसले के मुताबिक संशोधित किए जाएंगे। केंद्रीय चिकित्सा विश्वविद्यालयों के रजिस्ट्रार भी अपने आदेशों व सर्कुलर को निर्णय के अनुसार संशोधित करेंगे।
सभी को दें जानकारी
अदालत ने राज्य सरकार समेत चिकित्सा विश्वविद्यालयों को इस फैसले के निर्देश अमल में लाकर इनकी जानकारी सभी संबंधित लोगों को महीने भर में दिए जाने को कहा है। कोर्ट ने सूबे के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि अक्तूबर के दूसरे हफ्ते तक इस फैसले की पालन रिपोर्ट पेश करें।
निर्देशों का कराएं प्रकाशन
राज्य सरकार को निर्देश दिया कि इन निर्देशों का सारांश हिंदी व अंग्रेजी के कम से कम 4 बड़े अखबारों में प्रकाशित कराए जिससे लोग अपने हक को लेकर जागरूक हो सकें।
इसके लिए सूबे के प्रमुख सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य 30 सितंबर तक इनका प्रकाशन कराएंगे। कोर्ट ने इस फैसले की कॉपी सूबे के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य समेत सूबे के केंद्रीय चिकित्सा विश्वविद्यालयों को पालन के लिए भेजने के निर्देश लखनऊ बेंच के सीनियर रजिस्ट्रार को दिए हैं।
चिकित्सा विश्वविद्यालयों को भी कोर्ट ने अक्तूबर के दूसरे हफ्ते तक पालन रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट पालन रिपोर्ट के लिए इस मामले को अक्तूबर केतीसरे हफ्ते में लगाने को कहा है।