धर्मांतरण मामले में हाईकोर्ट का अहम फैसला
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हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम फैसले में कहा है कि धर्म परिवर्तन एक मुश्किल मसला है। ऐसे विवादों पर गौर करते वक्त अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए धर्मांतरण बलपूर्वक या धोखाधड़ी से अथवा कुछ प्रलोभन देकर न किया जाए।
न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह और न्यायमूर्ति राजीव शर्मा की खंडपीठ ने धर्मांतरण के मामले में अहम नजीर वाला यह फैसला एक युवती की अपील को मंजूर कर सुनाया।
जैन समुदाय की इस युवती से दूसरे धर्म के एक युवक के साथ कथित ‘निकाह’ (शादी) करने की बात कहकर युवक ने बहराइच के फैमिली कोर्ट में दाम्पत्य संबंधों के निर्वाहन का वादा दायर किया।
12 नवंबर 2014 को वहां की अदालत ने युवती को किसी अन्य व्यक्ति से विवाह करने की मनाही कर इसका स्थगनादेश जारी कर दिया। युवती व एक अन्य ने पारिवारिक अदालत के इसी आदेश को अपील में चुनौती दिया।
इस तरह कोर्ट पहुंचा मामला
कोर्ट ने युवती की अपील मंजूर कर पारिवारिक न्यायालय के उक्त आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि अपीलकर्ताओं (युवती व एक अन्य) को मामले में आपत्तियां दाखिल करने की इजाजत देकर इसके बाद समुचित आदेश पारित करें।
हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि पहली नजर में रिकार्ड ऐसी कोई सामग्री नहीं है जिससे पता चलता हो कि कैसे और किस तरीके से एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन किया गया और निकाहनाम में युवती का मूल नाम क्यों दिखाया गया है।
कोर्ट ने धर्मांतरण को एक ‘ट्रिकी इश्यू’ करार देकर व्यवस्था दी है कि इससे संबंधित विवादों पर विचार करते हुए अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि धर्मांतरण, जबरदस्ती, धोखाधड़ी करके या फिर कोई प्रलोभन-लालच देकर न हुआ हो।
अदालत ने कहा कि अगल धर्मांतरण के तौर-तरीके को लेकर थोड़ी भी ऐसी शंका हो तो आमतौर पर स्थगनादेश दिए जाने से इनकार किया जा सकता है।