आजम खां व राज्यपाल मामले में हाईकोर्ट ने की अहम टिप्पणी
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‘एक नेता जब अपने ज्ञानपूर्ण और प्रभावशाली भाषण से सभ्यता के स्तर को आगे ले जाने की बात करता है तो लोग गर्व करते हैं कि उन्होंने एक अच्छा नेता चुना है। पर, जब वैचारिक संघर्ष शुरू होता है, तो यही भाषा चिंता की वजह बन जाती है। तब भाषा का असंयमित व असावधानी से किया गया उपयोग शब्दों के युद्ध में बदल जाता है। यह अंतत: दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच राजनीति से प्रेरित संघर्ष को जन्म देता है। लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद से गतिरोध पैदा होते हैं। ऐसा होने पर इन संस्थाओं की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे इन मतभेदों को जल्द सुलझाएं। व्यक्तिगत विचारधारा या जिद को छोड़ते हुए व्यवस्था में विश्वास पैदा करने का प्रयास करें।’
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने यह अहम टिप्पणी शुक्रवार को की। अदालत विधानसभा में कैबिनेट मंत्री आजम खां द्वारा राज्यपाल राम नाईक के खिलाफ की गई अमर्यादित टिप्पणी पर एक याचिका की सुनवाई कर रही थी।
यह याचिका आजम को उनकी टिप्पणियों के लिए पद से हटाने के लिए दायर की गई थी। कोर्ट ने संवैधानिक प्रावधानों के चलते ऐसा करने से इन्कार कर दिया, लेकिन उम्मीद जताई कि राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री और आजम इस मामले को जल्द से जल्द सुलझाएंगे।
यह था पूरा मामला
याचिकाकर्ता अशोक पांडे ने याचिका में कहा कि प्रस्तावित नगर निगम बिल 2015 समेत कुछ बिलों को रोकने का आरोप लगाकर आजम ने राज्यपाल पर राजनीतिक प्रभाव में काम करने का आरोप लगाया और उनके लिए कई असंसदीय बातें कही।
राज्यपाल व विधानसभा अध्यक्ष के बीच हुए संवाद से जाहिर होता है कि राज्यपाल ने आजम की कही बातों को आपत्तिजनक माना था। विधानसभा अध्यक्ष ने आजम की एक तिहाई टिप्पणियों को सदन की कार्यवाही से हटाने का आदेश दिया था।
वहीं राज्यपाल ने विस अध्यक्ष को पत्र लिखकर आजम की भाषा को सदन की मर्यादा के खिलाफ बताते हुए बतौर मंत्री उनकी क्षमता पर सवालिया निशान लगाया था। यह पत्र सीएम अखिलेश यादव को भी भेजा गया था।
याची ने इस आधार पर हाईकोर्ट से कहा कि कानूनन मंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा सीएम की सलाह पर की जाएगी और वह राज्यपाल के प्रसाद पर्यन्त पद पर बने रहते हैं। आजम ने राज्यपाल के समक्ष अपनी साख गंवा दी है, ऐसे में उन्हें अपने पद पर रहने का कोई अधिकार नहीं है।
जिस पर जस्टिस अमरेश्वर प्रताप साही और जस्टिस अताउर्रहमान मसूदी ने संविधान के अनुच्छेद 163 और 164 का हवाला देते हुए कहा कि राज्यपाल का विधानसभा अध्यक्ष से किया गया संवाद यह साबित नहीं करता कि आजम राज्यपाल के समक्ष अपनी साख गंवा चुके हैं।
इस आधार पर सीएम उन्हें पद से हटा नहीं सकते। साथ ही कहा कि विधानसभा में होने वाली कार्यवाही न्यायिक पुनरीक्षण के कार्यक्षेत्र में नहीं आती है। ऐसे में याचिका में जो राहत मांगी गई है, वह नही दी जा सकती।
‘क्या सीएम अपने मंत्री को बनाए रखना चाहते हैं?’
जस्टिस मसूदी ने कहा कि विधानसभा की कार्यवाही के दौरान किसी जनप्रतिनिधि द्वारा कही गई आपत्तिजनक बात हालांकि किसी कानूनी कार्रवाई से इम्यून है, लेकिन आजम का मामला अलग है। यह एक ऐसी स्थिति पैदा करता है जिसमें राज्यपाल को अपने ऊपर की गई टिप्पणियों पर लिखित में नाराजगी जतानी पड़ी।
बड़ा सवाल है कि ऐसी स्थिति में क्या उनके द्वारा अप्रसन्नता व्यक्त करने वाले नोट पर विधानसभा अध्यक्ष और साथ साथ मुख्यमंत्री को कार्रवाई करने की अनिवार्यता है? क्या इसके आधार पर सीएम अपने मंत्री को बनाए रखने का निर्णय बदल सकते हैं? हमारा संविधान राज्य के किसी भी अंग को निरंकुश शक्तियां नहीं देता है।
तीनों ही अंगो, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका से अपेक्षा की जाती है कि वे सौहार्दपूर्ण तरीके से इस तरह काम करेंगे कि शक्तियों के बंटवारे की मूल भावना को बढ़ावा मिले। साथ ही एक-दूसरे की स्वतंत्रता को भी सुनिश्चित करें। विधानसभा सदस्य की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 194(1) के अनुसार नि:संदेह संवैधानिक प्रावधानों का विषय है।
अनुच्छेद 194(2) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वोटिंग के विधानसभा सदस्य के विशेषाधिकारों को कोर्ट में सवालों के दायरे से बाहर रखता है। यह संरक्षण इतना अधिक है कि इसके दायरे में सदन में रखी रिपोर्ट, दस्तावेज, वोट और प्रोसिडिंग्स भी आती हैं।