सपा सरकार में मंत्री शारदा प्रताप के घर व दुकानों को तोड़ने का आदेश
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सपा सरकार में मंत्री रहे शारदा प्रताप शुक्ला के आशियाना स्थित घर-दुकानें तोड़ने का आदेश हाईकोर्ट ने एलडीए को दिया है। अदालत ने किला मोहम्मदी नगर की खसरा संख्या 249 पर पूर्व मंत्री की दावेदारी हाईकोर्ट ने खारिज कर दी है।
इस जमीन पर पूर्व मंत्री ने अपना आवास और कुछ दुकानों का निर्माण किया हुआ है। इसके अलावा कोर्ट ने अपने ही आदेश पर खाली कराई गई खसरा संख्या 250, 251 की जमीन से भी बाकी निर्माण को भी तोड़ने का निर्देश दिया है। 12 दिसंबर 2016 को एलडीए ने इस जमीन से पूर्व मंत्री का कब्जा हटाने की औपचारिकता की थी। इसके खिलाफ भी याची ने हाईकोर्ट में अपील की।
चीफ जस्टिस दिलीप बी भोंसले और जस्टिस विवेक चौधरी की खंडपीठ ने यह आदेश याची बृजभान सिंह यादव की याचिका की सुनवाई के बाद शुक्रवार को दिया है। हाईकोर्ट ने आदेश में कहा है कि एलडीए तुरंत खसरा 249, 250 और 251 की जमीन पर कब्जा ले। इस जमीन पर काबिज लोगों से यह जमीन खाली कराई जाए।
तीन फरवरी 2916 को हाईकोर्ट के आदेश के बाद खसरा 250, 251 से पूरा निर्माण हटाने की बात प्राधिकरण ने कही, लेकिन, तथ्यों से जानकारी में आया है कि वहां से सभी निर्माण नहीं हटाए गए।
आदेश में कहा गया है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी लंबे समय तक इन बाकी निर्माण को नहीं हटाया गया। चार सप्ताह में प्राधिकरण को निर्माण तोड़कर जमीन खाली कराने के लिए आदेश दिया गया है।
सिर्फ अनुबंध, सेल डीड कराई नहीं जा सकी
हाईकोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि 1979 में केवल अनुबंध के बाद तीनों जमीनों पर शारदा प्रताप ने कब्जा लिया। मूल भू-स्वामी जंगली प्रसाद के एससी वर्ग से होने की वजह से यूपी जेडएएलआर एक्ट के चलते सेल डीड नहीं कराई जा सकी।
हाईकोर्ट ने इस अनुबंध के पंजीकृत नहीं होने की वजह से वैध नहीं माना। इस जमीन का अवार्ड भी एलडीए द्वारा जमीन अधिग्रहण के समय 1987 में कर दिया गया। 29 नवंबर 2015 को एलडीए के संयुक्त सचिव की जांच रिपोर्ट में भी तीनों भूखंडों पर पूर्व मंत्री का अवैध कब्जा पाया गया। इसकी सूचना हाईकोर्ट को भी दी गई।
भू-स्वामी ने तोड़ा नियम और जमीन हो गई सरकार की
हाईकोर्ट के आदेश में कहा गया है कि यूपी जेएलएलआर एक्ट के सेक्शन 157ए में दिए नियम को शारदा प्रताप शुक्ला को कब्जा देते समय भू-स्वामी और उसके पुत्रों ने तोड़ा। ऐसे में जमीन ट्रांसफर की कार्रवाई शून्य हो गई और यह जमीन राज्य सरकार में निहित हो गई थी। इसके बाद 1985 में इस जमीन को अधिग्रहित करने और किसी को मुआवजा दिए जाने की जरूरत ही नहीं थी।
30 साल तक मंत्री को बचाता रहा एलडीए
यह अलग है कि पूर्व मंत्री ने इन प्रस्तावों को नहीं माना। हाईकोर्ट केआदेश पर 2016 में टीम कब्जा हटाने गई, लेकिन खानापूर्ति करके लौट आई। उल्टे बाउंड्री बना जमीन को सुरक्षित कर दिया गया। अब भी इस जमीन पर भूखंड नियोजित होने के बाद भी विकास कार्य नहीं कराए गए हैं।
इतनी आसान नहीं एलडीए के लिए कार्रवाई
पूर्व मंत्री से जमीन खाली कराए जाने के लिए एलडीए ने कभी सख्ती नहीं दिखाई। पहले कार्रवाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकताएं ही की गईं। खुद निर्माण तोड़ने के उलट पूर्व मंत्री के लोगों को ही जेसीबी और मशीनें सौंप दी गई थीं। अब पूर्व मंत्री के आवास को भी तोड़ना होगा। इसके अलावा पूर्व मंत्री ने जमीन के एक हिस्से को आयुर्वेदिक अस्पताल के लिए किराए पर दे रखा है। इसे भी हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में हटवाना होगा।
लाख जतन किए ताकि बचा रहे कब्जा
पूर्व मंत्री ने अपने कब्जे को बनाए रखने के लिए एलडीए को कई ऑफर दिए। एक बार पूरी जमीन पर पार्क बनाकर मंदिर बनाए रखने के लिए पत्र लिखा। इसकेबाद वहां आयुर्वेदिक अस्पताल भी बनवाने के लिए प्रस्ताव आया।