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सरकार को ही बेच दी सरकारी जमीन, हाईकोर्ट ने दिया जांच का आदेश
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Thu, 11 Jan 2018 01:14 PM IST
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- फोटो : amar ujala
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लखनऊ में सरकार की जमीन सरकार को ही बेच देने के एक मामले में हाईकोर्ट ने विजिलेंस जांच का आदेश दिया है। साथ ही जनता के धन की बर्बादी करने वाले दोषी अधिकारियों की पहचान कर तीन महीने में जांच रिपोर्ट देने का आदेश प्रमुख सचिव राजस्व को दिया है। यह मामला सैयद मोहम्मद हुसैन उर्फ मोहम्मद आरिफ की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया।
उन्हाेंने याचिका में नरही के रामतीर्थ रोड स्थित इस भूमि का मामला याचिका में उठाया था। हाईकोर्ट में रखे गए दस्तावेजों में सामने आया कि 86,483 वर्ग फीट की यह जमीन नजूल संपत्ति है और यहां सार्वजनिक सड़क भी है। इस जमीन को सरकार ने एक प्राइवेट बिल्डर पंकज अग्रवाल से अधिगृहित कर दिया। वहीं बिल्डर को इसके लिए 2.5 करोड़ रुपये का मुआवजा लखनऊ के एसडीएम (भूमि अधिग्रहण) द्वारा 30 अप्रैल 2005 में दिया गया।
जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस अब्दुल मोईन ने कहा कि दस्तावेजों के अनुसार इस भूमि के अधिग्रहण के लिए मई 1999 और जनवरी 2000 में अधिसूचना जारी की गई। खुद एसडीएम ने अवार्ड में लिखा कि यह अधिगृहित की जाने वाली जमीन नजूल की है। नजूल की जमीन का मतलब है सरकार के स्वामित्व की जमीन।
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ऐसा होने पर सरकार खुद अपनी जमीन का अधिग्रहण कैसे कर सकती है? इस बारे में कानून साफ है कि सरकारी या कहें नजूल की जमीन का अधिग्रहण करने की सरकार को जरूरत ही नहीं है। हाईकोर्ट ने विभिन्न मामलों के परिपेक्ष्य में कहा कि सरकारी जमीन का अधिग्रहण सरकार नहीं करती।
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उन्हाेंने याचिका में नरही के रामतीर्थ रोड स्थित इस भूमि का मामला याचिका में उठाया था। हाईकोर्ट में रखे गए दस्तावेजों में सामने आया कि 86,483 वर्ग फीट की यह जमीन नजूल संपत्ति है और यहां सार्वजनिक सड़क भी है। इस जमीन को सरकार ने एक प्राइवेट बिल्डर पंकज अग्रवाल से अधिगृहित कर दिया। वहीं बिल्डर को इसके लिए 2.5 करोड़ रुपये का मुआवजा लखनऊ के एसडीएम (भूमि अधिग्रहण) द्वारा 30 अप्रैल 2005 में दिया गया।
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जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस अब्दुल मोईन ने कहा कि दस्तावेजों के अनुसार इस भूमि के अधिग्रहण के लिए मई 1999 और जनवरी 2000 में अधिसूचना जारी की गई। खुद एसडीएम ने अवार्ड में लिखा कि यह अधिगृहित की जाने वाली जमीन नजूल की है। नजूल की जमीन का मतलब है सरकार के स्वामित्व की जमीन।
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ऐसा होने पर सरकार खुद अपनी जमीन का अधिग्रहण कैसे कर सकती है? इस बारे में कानून साफ है कि सरकारी या कहें नजूल की जमीन का अधिग्रहण करने की सरकार को जरूरत ही नहीं है। हाईकोर्ट ने विभिन्न मामलों के परिपेक्ष्य में कहा कि सरकारी जमीन का अधिग्रहण सरकार नहीं करती।
तीन महीने में दें कोर्ट को रिपोर्ट
डेमो
प्राइवेट बिल्डर अग्रवाल को मुआवजा देने के लिए प्रदेश सरकार, सरकार के अधिकारी और एलडीए के अधिकारियों ने मिलकर गैरकानूनी ढंग से काम किया। इसकी वजह से बड़ी मात्रा में जनता के धन का गबन मुआवजे के नाम पर किया गया। दूसरी ओर आयकर विभाग की ओर से अपना पक्ष रखते हुए कहा गया कि उन्हाेंने इस जमीन को एलडीए के वीसी की अनुमति से ही प्राइवेट बिल्डर को ट्रांसफर किया था।
हालांकि नजूल मैनुअल के अनुसार इस तरह के ट्रांसफर की अनुमति केवल राज्य सरकार या कलेक्टर ही दे सकते हैं। एलडीए सिर्फ जमीन का प्रबंधन कर सकता है, मालिकाना हक किसी और को नहीं दे सकता। हाईकोर्ट ने इस तर्क को अस्पष्ट मानते हुए कहा कि फिलहाल यह साफ नहीं हो सका है कि जब मुआवजा दिया गया, तब यह जमीन ट्रांसफर की जा चुकी थी।
हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका को स्वत:संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका में बदल दिया। साथ ही प्रदेश के प्रमुख सचिव राजस्व को निर्देश दिए कि वे विजिलेंस विभाग से जांच करवाएं। मामले में विभिन्न प्राधिकरणों और अधिकारियों की भूमिका निर्धारित करें, जिन्हाेंने जनता के धन को सरकारी जमीन के मुआवजे के रूप में प्राइवेट पार्टियों में बांट दिया। इसकी रिपोर्ट तीन महीने में कोर्ट को दी जाए। वहीं विभिन्न पक्षों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा गया है।
हालांकि नजूल मैनुअल के अनुसार इस तरह के ट्रांसफर की अनुमति केवल राज्य सरकार या कलेक्टर ही दे सकते हैं। एलडीए सिर्फ जमीन का प्रबंधन कर सकता है, मालिकाना हक किसी और को नहीं दे सकता। हाईकोर्ट ने इस तर्क को अस्पष्ट मानते हुए कहा कि फिलहाल यह साफ नहीं हो सका है कि जब मुआवजा दिया गया, तब यह जमीन ट्रांसफर की जा चुकी थी।
हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका को स्वत:संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका में बदल दिया। साथ ही प्रदेश के प्रमुख सचिव राजस्व को निर्देश दिए कि वे विजिलेंस विभाग से जांच करवाएं। मामले में विभिन्न प्राधिकरणों और अधिकारियों की भूमिका निर्धारित करें, जिन्हाेंने जनता के धन को सरकारी जमीन के मुआवजे के रूप में प्राइवेट पार्टियों में बांट दिया। इसकी रिपोर्ट तीन महीने में कोर्ट को दी जाए। वहीं विभिन्न पक्षों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा गया है।