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अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग पर कोर्ट का डंडा
राजेन्द्र सिंह/लखनऊ
Updated Fri, 01 Nov 2013 12:25 AM IST
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अफसरों का कार्यकाल सुनिश्चित करने के हाईकोर्ट के फैसले से प्रदेश की नौकरशाही पर सियासी दबाव घटेगा और उनकी कार्यप्रणाली में सुधार आएगा।
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सेवानिवृत्त अफसर मानते हैं कि इससे अधिकारियों की जवाबदेगी बढ़ेगी और गुड गवर्नेंस (सुशासन) की शुरुआत होगी।
सबसे ज्यादा फायदा आम जनता को मिलेगा। अधिकारी भी सरकारी और राजनीतिक उत्पीड़न का शिकार नहीं हो सकेंगे।
देश के कई राज्यों में केंद्रीय सेवाओं के सिविल, पुलिस और वन अधिकारियों का कार्यकाल निश्चित है। यूपी में ऐसी व्यवस्था नहीं है।
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यहां सरकार की पसंदगी-नापसंदगी को देखकर अफसरों की तैनाती होती है। किसी अफसर को चंद दिनों में हटा दिया जाता है तो किसी को कुछ महीनों में। ट्रांसफर-पोस्टिंग में सियासी दबाव भी खूब काम करता है।
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मुजफ्फरनगर दंगों से पहले वहां के डीएम सुरेन्द्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी को तिहरे हत्याकांड के तत्काल बाद सियासी दबाव में हटाने का मामला पिछले दिनों चर्चा में रहा।
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इससे पहले नोएडा की एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन पर लखनऊ से दिल्ली तक खूब उंगलियां उठी।
लखीमपुर खीरी की डीएम को लेखपालों पर नियंत्रण न करने के आरोप में हटा दिया जाता है तो कानपुर की कमिश्नर को कन्या विद्या धन में अनियमितता पर। कुछ अफसरों को चार्ज लेने से पहले ही बदल दिया जाता है।
सपा-बसपा नहीं चाहते कार्यकाल तय हो
सेवानिवृत्त आईएएस एसएन शुक्ला कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश स्वागत योग्य है। इससे अफसरों की उठापटक रुकेगी और ब्यूरोक्रेसी में सियासी दखल कम होगा।
अभी तो कई अफसरों को सीखने का मौका ही नहीं मिल पाता। किसी पद पर ट्रांसफर हुआ नहीं कि तबादला आदेश आ जाता है।
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वह बताते हैं कि केंद्र सरकार ने अगस्त 2006 में आल इंडिया सर्विस एक्ट में संशोधन करके प्रत्येक सर्विस के अधिकारियों के पदों पर तैनाती का कार्यकाल निश्चित कर दिया था।
इसमें व्यवस्था दी गई थी कि यदि किसी अफसर को समय से पहले हटाना पड़े तो हाईपावर कमेटी उसके कारणों पर विचार करके सिफारिश देगी।
उसी के आधार पर उसे हटाने या नहीं हटाने का फैसला होगा। एक्ट में संशोधन के बाद कार्मिक मंत्रालय को राज्यों से विचार-विमर्श करके हर प्रदेश में इसे लागू करने के लिए अधिसूचना जारी करनी थी।
वर्ष 2007-08 में 13 राज्यों में इसे लागू कर दिया गया। सात साल बीतने के बाद भी यूपी समेत कई अन्य राज्यों में इसे लागू करने के लिए अधिसूचना जारी नहीं हुई।
सपा और बसपा सरकारें नहीं चाहतीं कि यूपी में इसका क्रियान्वयन हो। कार्यकाल तय हो जाने पर अधिकारियों के मनमाने तबादले संभव नहीं है।
यदि सरकार नियमों का उल्लंघन करके तबादले करतीं तो उसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती थी। अब जनहित के नाम पर कोई भी तबादला कर दिया जाता है।
हाईकोर्ट में लंबित है याचिका
एसएन शुक्ला ने बताया कि लोकप्रहरी ने अफसरों का कार्यकाल निर्धारित करने संबंधी केंद्र सरकार के नियमों का क्रियान्यवन कराने के लिए 2009 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी ताकि अफसरों के मनमाने तबादलों पर रोक लग सके।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इसे हाईकोर्ट भेज दिया। वर्ष 2011 से यह याचिका हाईकोर्ट में लंबित है।
सुप्रीम कोर्ट ने न्यूनतम कार्यकाल सुनिश्चित करने का जो फैसला दिया है वह स्वागत योग्य है लेकिन इसके लिए पहले से नियम बना हुआ है।
उम्मीद है कि केंद्र और राज्य सरकारें इसे लागू करेंगी। अधिसूचना जारी होने तक उनकी कानूनी लड़ाई जारी रहेगी।
असली फायदा तो पब्लिक का होगा
सेवानिवृत्त आईएएस आरके मित्तल कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सराहनीय है। इस पर लंबे समय से कसरत चल रही थी।
पुलिस रिफार्म्स में भी इसके लिए निर्देश दिए गए हैं। अफसरों का कार्यकाल तय करने के कार्यप्रणाली में सुधार आएगा। अफसरों की जवाबदेही बढ़ेगी।
अब तो छोटे कार्यकाल के कारण वे जिम्मेदारियों से बच जाते हैं। फैसले का असली फायदा तो जनता को मिलेगा।
वह कहते हैं कि सरकार सिविल सर्वेंट्स को इतनी हाई सेलरी देती है, उन पर इतना खर्च करती है लेकिन उनकी क्षमताओं का उपयोग नहीं किया जाता।
आप सचिवालय चले जाइये, एक तिहाई अफसरों के पास कोई काम नहीं है। इनमें कई अनुभवी और वरिष्ठ अफसर हैं। पॉलिटिकल इंट्रेस्ट के आधार पर पोस्टिंग होने लगी है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमल होने पर सियासी दबाव कम होगा। इससे चरित्रवान और निष्ठावन अफसरों को और बल मिलेगा।
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