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आयुर्वेद विभाग की संयुक्त वरिष्ठता सूची से प्रमोशन पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक
Thu, 08 Oct 2020 10:22 PM IST
पंकज श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Thu, 08 Oct 2020 10:22 PM IST
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हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक अहम आदेश में प्रदेश के आयुर्वेद विभाग में निदेशालय के मिनिसटीरियल काडर और अधीनस्थ पदों के संवर्ग को मिलाकर बनाई गई संयुक्त वरिष्ठता सूची के आधार पर कर्मियों के प्रमोशन करने पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दिया है। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक जरूरत पड़ने पर दोनों काडर अलग मानते हुए कार्यवाहक प्रोन्नतियां की जा सकती हैं, जो अदालत के अग्रिम आदेशों के अधीन होंगीं।
न्यायमूर्ति राजन राय ने यह महत्वपूर्ण आदेश अशीष प्रकाश श्रीवास्तव एवं अन्य कर्मियों की याचिका पर दिया। इसमें दोनों काडर को विलय कर बनाई गई संयुक्त वरिष्ठता सूची को कानून की मंशा के खिलाफ बताते हुए रद किए जाने और इसके आधार पर प्रमोशन आदि न करने की गुजारिश की गई थी। यचियों के अधिवक्ता राकेश चंद्र तिवारी की दलील थी कि वर्ष 1991 के विभागीय नियमों के उक्त दोनों अलग -अलग काडर बने हैं और इनकी अलग-अलग वरिष्ठता सूचियाँ भी मौजूद थीं। इनको मिलाकर संयुक्त वरिष्ठता सूची बनाए जाने से कर्मियों के हित प्रभावित होंगे और उनकी वरिष्ठता गड़बड़ा जाएगी।
अधिवक्ता का कहना था कि 1991 के नियमों में संशोधन किए बगैर कार्यकारी व्यवस्था आदेश के जरिए दोनों काडर का विलय कर संयुक्त वरिष्ठता सूची नहीं बनाई जा सकती है। उधर,राज्य सरकार की तरफ से जवाब दाखिल नहीं किया गया। सरकारी वकील ने संक्षिप्त जवाबी हलफ़नामा दाखिल करने के लिए हफ्ते भर का समय दिए जाने का आग्रह किया।
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अदालत ने सुनवाई के बाद कहा कि अगर 1991 के नियमों में काडर विलय सम्बन्धी संशोधन नहीं किया हो और नियमों में काडर विलय का प्रावधान न हो तो प्रमोशन के लिए संयुक्त वरिष्ठता सूची को अगली सुनवाई तक प्रभावी न किया जाए। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक जरूरत पड़ने पर दोनों काडर अलग मानते हुए कार्यवाहक प्रोन्नतियां की जा सकती हैं, जो अदालत के अग्रिम आदेशों के अधीन होंगीं। इस आदेश के साथ कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 21 अक्तूबर को नियत किया है।
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न्यायमूर्ति राजन राय ने यह महत्वपूर्ण आदेश अशीष प्रकाश श्रीवास्तव एवं अन्य कर्मियों की याचिका पर दिया। इसमें दोनों काडर को विलय कर बनाई गई संयुक्त वरिष्ठता सूची को कानून की मंशा के खिलाफ बताते हुए रद किए जाने और इसके आधार पर प्रमोशन आदि न करने की गुजारिश की गई थी। यचियों के अधिवक्ता राकेश चंद्र तिवारी की दलील थी कि वर्ष 1991 के विभागीय नियमों के उक्त दोनों अलग -अलग काडर बने हैं और इनकी अलग-अलग वरिष्ठता सूचियाँ भी मौजूद थीं। इनको मिलाकर संयुक्त वरिष्ठता सूची बनाए जाने से कर्मियों के हित प्रभावित होंगे और उनकी वरिष्ठता गड़बड़ा जाएगी।
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अधिवक्ता का कहना था कि 1991 के नियमों में संशोधन किए बगैर कार्यकारी व्यवस्था आदेश के जरिए दोनों काडर का विलय कर संयुक्त वरिष्ठता सूची नहीं बनाई जा सकती है। उधर,राज्य सरकार की तरफ से जवाब दाखिल नहीं किया गया। सरकारी वकील ने संक्षिप्त जवाबी हलफ़नामा दाखिल करने के लिए हफ्ते भर का समय दिए जाने का आग्रह किया।
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अदालत ने सुनवाई के बाद कहा कि अगर 1991 के नियमों में काडर विलय सम्बन्धी संशोधन नहीं किया हो और नियमों में काडर विलय का प्रावधान न हो तो प्रमोशन के लिए संयुक्त वरिष्ठता सूची को अगली सुनवाई तक प्रभावी न किया जाए। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक जरूरत पड़ने पर दोनों काडर अलग मानते हुए कार्यवाहक प्रोन्नतियां की जा सकती हैं, जो अदालत के अग्रिम आदेशों के अधीन होंगीं। इस आदेश के साथ कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 21 अक्तूबर को नियत किया है।