जानिए, ज्ञानपीठ विजेता केदारनाथ सिंह की खास बातें
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हिंदी के जाने-माने रचनाकार केदारनाथ सिंह को साहित्य के प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ सम्मान 2013 के लिए चुना गया है। वे हिंदी के 10वें रचानकार हैं, जिन्हें यह पुरस्कार दिया गया है।
जीवन के 80 बसंत पार कर चुके श्री केदारनाथ सिंह के 'अभी बिल्कुल अभी', 'यहां से देखो', 'अकाल में सारस', 'बाघ' जैसे कविता संग्रह बहुत प्रसिद्ध रहे हैं।
केदारनाथ को ऐसे कवि की श्रेणी में गिना जाता है जो कठिन विष्ाय को भी आसान और सुलझी भाषा में कहना जानता हो।
कौन हैं केदारनाथ सिंह
श्री केदारनाथ सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के गांव चकिया में 7 जुलाई 1934 को हुआ।
उन्होंने वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज से बी.ए करने के बाद बीएचयू से एम.ए और पी.एचडी की डिग्री हासिल की।
शुरुआती दिनों में वह गोरखपुर में हिंदी टीचर के तौर पर काम करते रहे और उसके बाद वह दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में बतौर प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष काम करने लगे।
उन्होंने जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में भी अपनी सेवा दी और वहीं से रिटायर भी हुए।
इतने मिले पुरस्कार
श्री केदारनाथ सिंह को 'अकाल में सारस' कविता संग्रह के लिए वर्ष 1989 में साहित्य अकादमी अवॉर्ड से नवाजा चुका है।
उनकी इस कविता संग्रह का अग्रेंजी संस्करण 'क्रेंस इन ड्रॉथ' भी बाजार में आया, जिसे पाठकों ने बेहद पसंद किया। श्री सिंह को व्यास सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।
इसके अलावा उन्हें मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार, दिनकर पुरस्कार, जीवनभारती पुरस्कार भी मिल चुका है।
'बनारस' कविता की कुछ पंक्तियां....
तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ़
इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घनटे
शाम धीरे-धीरे होती है...
'बाघ' कविता संग्रह की कुछ पंक्तियां
कथाओं से भरे इस देश में
मैं भी एक कथा हूँ
एक कथा है बाघ भी
इसलिए कई बार
जब उसे छिपने को नहीं मिलती
कोई ठीक-ठाक जगह
तो वह धीरे से उठता है
और जाकर बैठ जाता है
किसी कथा की ओट में
फिर चाहे जितना ढूँढ़ो
चाहे छान डालो जंगल की पत्ती-पत्ती
वह कहीं मिलता ही नहीं है
'अकाल में सारस' कविता संग्रह की कुछ पंक्तियां
भर लो
दूध की धार की
धीमी-धीमी चोटें
दिये की लौ की पहली कँपकँपी
आत्मा में भर लो
भर लो
एक झुकी हुई बूढ़ी
निग़ाह के सामने
मानस की पहली चौपाई का खुलना
और अन्तिम दोहे का
सुलगना भर लो
भर लो
ताकती हुई आँखों का
अथाह सन्नाटा
सिवानों पर स्यारों के
फेंकरने की आवाज़ें
बिच्छुओं के
उठे हुए डंकों की
सारी बेचैनी
आत्मा में भर लो
और कवि जी सुनो
इससे पहले कि भूख का हाँका पड़े
और अँधेरा तुम्हें चींथ डाले
भर लो
इस पूरे ब्रह्माण्ड को
एक छोटी-सी साँस की
डिबिया में भर लो