क्यों मोदी के मुरीद हुए काशी के लोग
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दरअसल इतिहास व परंपरा से भी पुराना माना जाने वाला वाराणसी शहर पिछले दो-तीन सालों में खुदी सड़कों, बजबजाते सीवर, लुका-छिपी करती बिजली से इतना त्रस्त है कि उसका जीवन दूभर हो गया है।
हाल-बेहाल लोगों ने पहले शासन-प्रशासन से गुहार की और फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया पर समस्याओं का समाधान नहीं हुआ।
हताश काशीवासियों को अपने सुशासन के नारे के कारण मोदी की उम्मीदवारी में एक उम्मीद की किरण सी दिखी और मैडम रायचौधुरी सरीखे तमाम गैर राजनीतिक लोग नमो-राग का जाप करने लगे हैं।
हर हर मोदी की हर ओर लहर
यूं तो मोदी की पहचान ऐसी बन चुकी है कि उन्हें खुद को हिन्दुत्व का प्रतीक बताने की जरूरत नहीं।
फिर भी अपनी पहली सभा से पहले काशी विश्वनाथ व संकटमोचन मंदिर जाकर दर्शन-पूजन और सभा में बाबा विश्वनाथ का रिश्ता सोमनाथ से जोड़ कर उन्होंने इस शहर के अंडर करंट से एक आस्थाजनित नाता जोड़ ही लिया है।
गंगा काशी के लिए एक नदी भर नहीं है। आस्था का अप्रतिम प्रवाह है। मोदी ने उसी सभा में गंगा प्रदूषण पर जिस तरह चिंता जताई और गुजरात में साबरमती नदी को प्रदूषणमुक्त करने की तस्वीर दिखाई, उससे गंगा प्रेमियों में उनके प्रति अतिरिक्त भाव जागा है।
मोदी ने सिसकते बनारसी साड़ी उद्योग की तुलना सरसब्ज सूरत के साड़ी उद्योग से कर कारोबारियों का ध्यान खींचा।
स्वाभाविक था कि इसके बाद बनारस में उन्हीं के नाम की माला जपी जानी थी। हर-हर महादेव के उद्घोष के साथ अपना हर काम प्रारंभ करने वाले शहर में हर-हर मोदी यूं ही नहीं हो रहा है।
हालांकि हर-हर मोदी के उद्घोष पर अब सियासत भी शुरू हो गई है। राजनीतिक दलों समेत लोगों ने विरोध करना शुरू कर दिया है।
भिड़त होगी दिलचस्प
मोदी के चुनाव लड़ने और विरोध में भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने वाले अरविन्द केजरीवाल व जेल में बंद बाहुबली मुख्तार अंसारी के सामने आने से काशी देश-दुनिया में चर्चा का केंद्र बन गया है।
हालांकि इन तीनों ने चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद काशी की धरती पर पैर नहीं रखा पर घाटों, गलियों में तथा चायखानों में चुनावी रंग चोखा चढ़ गया है।
बाहरी लोगों द्वारा होटलों और गाड़ियों की जिस तरह से एडवांस बुकिंग कराई जा रही है, उससे भी लगता है कि भिड़ंत दिलचस्प होगी।
काशी के विकास की उम्मीद बंधाते हैं मोदी
बीएचयू में सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर प्रो. विशंभरनाथ मिश्र का कहना है कि काशी पिछले 10-15 सालों से कराह रही है। उसकी असली समस्याओं को समझा ही नहीं जा रहा है।
शहर को नियोजित ढंग से विकसित करने की आवश्यकता है। एक हेरिटेज सिटी की तरह। मोदी जी, अगर यहां से जीतकर प्रधानमंत्री बनते हैं तो काशी के लिए कुछ तो करेंगे ही, ऐसी उम्मीद है।
लेकिन खामोशी ओढ़ लेते हैं मुस्लिम मतदाता
काशी के ढाई लाख मुस्लिम मतदाताओं ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं। मदनपुरा व बजरडीहा जैसे मुस्लिम बहुल मोहल्लों में मोदी का जिक्र करने पर लोग सहजता से संवाद नहीं करते।
खामोशी ओढ़ लेते हैं। बीएचयू में कॉमर्स विभाग में प्रोफेसर डॉ. असगर अली अंसारी कहते हैं कि मोदी के नाम पर मुसलमानों में खौफ तो नहीं है, पर कुछ आशंकाएं दिलो दिमाग को जरूर मथ रही हैं।
फिलहाल मुस्लिम मतदाता खामोशी से पूरे परिदृश्य पर नजरें गड़ाए हुए है। सारी तस्वीर साफ होने पर वह देखेगा कि कौन मोदी से तगड़ा मुकाबला करता कौन नजर आ रहा है, फिर बिन बोले उसकी तरफ मुड़ जाएगा।
बकौल अंसारी, मुस्लिम मतदाता इस बार पिछली बार की तरह मुसलमान के नाम पर नहीं झूमेगा क्योंकि वह नहीं चाहता किसी तरह की ध्रुवीकरण की स्थितियां पैदा हों।
... क्या सभी मोदी की झोली में जाएंगे
बनारस में शिव संस्कृति के प्रतीक माने जाने वाले वकील धर्मशील चतुर्वेदी कहते हैं कि अड़भंगी शिव के शहर में प्रतिरोध की ताकतों को खारिज नहीं किया जा सकता।
सवाल भी उछालते हैं ‘लोकसभा क्षेत्र में करीब ढाई लाख मुस्लिम मतदाता है, दलित भी हैं और पिछ़डे़ भी, क्या सभी मोदी की झोली में चले जाएंगे।
वैसे यह स्थिति तो चुनाव के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी।
दो दशक से कमल ही खिला
राजनीतिक तौर पर यहां कांग्रेस से लेकर वामपंथी और समाजवादी आंदोलन भी सरसब्ज रहा।
पर अयोध्या आंदोलन के बाद यहां का मिजाज काफी बदला। 1991 के बाद भाजपा केवल एक बार 2004 में हारी।
2012 के विधानसभा चुनाव में जब भाजपा का ग्राफ काफी नीचे चल रहा था तब भी यहां की तीन सीटों पर भाजपा का परचम लहराया।
संघ व विश्व हिन्दू परिषद की जड़ें भी इस शहर में काफी मजबूत हैं।
कांग्रेस ऊहापोह में
मोदी फैक्टर के कारण कांग्रेस उम्मीदवार को लेकर फिलहाल अनिर्णय की स्थिति में नजर आ रही है।
पहले जिन अजय राय को तय उम्मीदवार माना जा रहा था, उन पर अब चुप्पी है।
अब राय से मजबूत व कद्दावर विकल्पों पर विचार हो रहा है। दिग्विजय सिंह से लेकर कर्ण सिंह तक के नामों की चर्चा है।
गौरतलब है कि सोनिया गांधी ने भी दो टूक कह दिया है कि जिसको चुनाव लड़ने के लिए कहा जाए, वह चुपचाप चुनाव लड़े।