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ऐसे तो नहीं बदलेगी मुसलमानों की तकदीर
लखनऊ/मनोज श्रीवास्तव
Updated Wed, 21 Aug 2013 09:42 PM IST
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मुसलमानों को 20 फीसदी हिस्सेदारी देने के फैसले से सरकार के लोग भले ही अपनी पीठ थपथपा लें पर मुस्लिम समाज का कहना है कि ऐसी घोषणाओं से गरीब मुसलमान का मुस्तकबिल बदलने वाला नहीं।
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दरअसल, मुस्लिम समाज बेसब्र आंखों से उन वादों को लेकर सरकार की तरफ देख रहा है जो सपा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में किए थे। कुछ का तो यह भी कहना है कि घोषणापत्र में किए गए कुछ अहम वादों से ध्यान भटकाने के लिए ही यह कवायद की गई है।
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पिछले विधानसभा चुनाव में सपा ने मुसलमानों के लिए कई घोषणाएं की थी। मुसलमानों ने भी सपा को जमकर वोट दिया। सपा नेतृत्व ने बहुमत हासिल करने में मुसलमानों की अहम भूमिका को स्वीकारा भी।
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सरकार बनने के बाद स्वाभाविक था कि मुसलमानों की सरकार से अपेक्षाएं बढ़ गईं। आरटीआई कार्यकर्ता सलीम बेग कहते हैं कि मुसलमानों को 18 फीसदी आरक्षण देने संबंधी घोषणा का क्रियान्वयन राज्य सरकार के बस में था ही नहीं।
हालांकि, सच्चर कमेटी की तमाम सिफारिशें राज्य सरकार अपने स्तर से प्रभावी कर सकती थी पर न जाने क्यों वादे के विपरीत उसमें दिलचस्पी नहीं ली गई।
अखिलेश सरकार के डेढ़ साल के कार्यकाल में दो दर्जन से अधिक दंगों ने भी सरकार को कटघरे में खड़ा किया। पार्टी की अंदरूनी खींचतान के चलते राज्य अल्पसंख्यक आयोग, उर्दू अकादमी, फखरुद्दीन अली अकादमी और मदरसा बोर्ड जैसी मुसलमानों से ताल्लुक रखने वाली संस्थाओं के गठन न होने से भी सवाल खड़े हुए हैं।
पीस पार्टी के अध्यक्ष डॉ. अयूब कहते हैं कि दरअसल मुस्लिम मामलों में अपनी नाकामियों पर परदा डालने के लिए राज्य सरकार ने सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी का शिगूफा छोड़ा है, लेकिन काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती।
पर, सरकार में शामिल लोग मानते हैं कि यह कदम उनकी नाव एक बार फिर पार लगाएगा। आजकल सरकार में कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण हो गए अहमद हसन कहते हैं कि मुसलमानों के हित में सरकार का साहसिक फैसला है।
मुसलमान विधानसभा चुनाव की तरह ही सपा को छोड़ किसी और की तरफ देखेगा भी नहीं।
ऐसे फैसलों से मुसलमानों को सिर्फ नुकसान
चुनाव करीब हैं। सभी राजनीतिक दल मुसलमानों को अपने पाले में खींचने के लिए दांव चलेंगे। यहां तक नरेंद्र मोदी सरीखे नेता मुसलमानों को रिझाने का मंसूबा पाल रहे हैं।
सबकी कोशिश यही जताने की होगी कि वही मुसलमानों के सबसे बड़े हिमायती हैं। राज्य सरकार द्वारा सरकारी योजनाओं में 20 फीसदी हिस्सेदारी देने संबंधी फैसला, उन्हीं कोशिशों का एक हिस्सा है। इस घोषणा से मुसलमानों की जाती जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आने वाला है।
मेरा तो मानना है कि मुसलमानों के लिए अलग से की जाने वाली घोषणाओं से समाज में ध्रुवीकरण होता है और ध्रुवीकरण से अंतत: मुसलमानों का ही नुकसान ही होता है।
-अख्तर अली फारुकी, अभियंताओं के नेता
सरकार का यह फैसला मुसलमानों को असल सवालों से गुमराह कर जज्बातों के भंवर में फंसाने वाला है। वैसे भी इस योजना को इतना कम पैसा आवंटित हुआ है कि कौम का कोई ज्यादा भला हो ही नहीं सकता था।
-नबी बख्श मंसूरी, उर्दू पत्रकार