हर साल उजड़ती है जिंदगी, पर नेता नहीं लेते सुध
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धौरहरा लोकसभा क्षेत्र के ज्यादातर गांवों में बाढ़ एक बड़ी समस्या है। लोग हर साल इसे झेलते हैं लेकिन कोई नेता इनकी सुध नहीं लेता।
क्षेत्र के सोंसरी गांव के ग्राम प्रधान रमेश चंद्र मिश्र कहते हैं कि बरसात के दिनों में हमारी सांसें ऊपर-नीचे हुआ करती हैं। कब शारदा उफान में आ जाए और हमारा घरबार उसकी लहरों में समा जाए।
पिछले चुनाव के समय जितिन कुमार ने तटबंध बनवाने का भरोसा दिया था। रमपुरवा से मोसियाना तक तो तटबंध बने पर हमारे गांव के पास कुछ नहीं हुआ। सांसद के प्रति आसपास के गांवों में गुस्सा है।
शासन पर दबाव बनाने के लिए जून में इस मसले को लेकर 38 दिनों की भूख हड़ताल हुई थी, जितिन उसमें आए, फिर भी समस्या का समाधान नहीं हुआ। अब हमारे पास ईश्वर से प्रार्थना करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
जितिन जीते, तो बंधी आस, पर जल्दी ही टूटी
धौरहरा लोकसभा क्षेत्र का करीब 30 फीसदी हिस्सा शारदा व घाघरा नदी में आने वाली बाढ़ के कारण कटान से प्रभावित रहता है।
समस्या को लेकर जब-तब धरना-प्रदर्शन, आंदोलन होते रहे हैं पर समाधान अब तक नहीं हुआ।
ईसानगर, हसनपुर कटौली व डेहुआ, शारदानगर व भरतपुर के पास बने तटबंधों पर कटान के कारण अपने गांवों से उजड़ी आबादी जिंदगी गुजारती देखी जा सकती है।
जितिन इस क्षेत्र से सांसद और बाद में केंद्र सरकार में मंत्री बने तो इलाके के लोगों की उम्मीदों ने उछाल मारा।
जितिन ने ध्यान भी दिया पर जो प्रयास हुए, आधे-अधूरे साबित हुए। किसानों-महिलाओं के सवालों पर सक्रिय संगठन की अध्यक्ष ऋचा सिंह कहती हैं, सांसद और फिर मंत्री बनने के बाद जितिन प्रसाद क्षेत्र में दिखते रहे, और सांसदों की तरह क्षेत्र से कट नहीं गए।
पर सवाल यह है कि गैस सप्लाई ही क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या थी? क्षेत्र का बड़ा हिस्सा कटान व जलभराव की समस्या से प्रभावित है। इस समस्या के संदर्भ में कुछ काम तो हुआ, पर वह पर्याप्त नहीं है।
चुनावी समर के सूरमा
आनंद भदौरिया (सपा)
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की कोर टीम के सदस्य। छात्र राजनीति से निकले, युवाओं पर अच्छी पकड़।
तरकश के तीर : साल भर से ज्यादा से क्षेत्र में सक्रिय। सपा सरकार बनने के बाद क्षेत्र में छोटे-मोटे अनेक विकास कार्य करवाए।
जितिन प्रसाद (कांग्रेस)
बड़ी राजनीतिक विरासत से वास्ता, केंद्र सरकार में दो बार मंत्री, राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं।
तरकश के तीर : गांव-गांव में कुकिंग गैस की होम डिलीवरी, क्षेत्र में सड़कों की हालत सुधारी, दामन पर दाग नहीं
रेखा वर्मा (भाजपा)
पसगवां ब्लॉक प्रमुख रह चुकी हैं। टिकट के दावेदार पति अरुण वर्मा की मौत के बाद पार्टी ने रेखा को मौका दिया।
तरकश के तीर : मोदी फैक्टर का असर, सहानुभति, वरुण गांधी का वरदहस्त, भाजपा के ब्राहमण नेता बिरादरी के बीच वकालत कर रहे हैं।
दाउद अहमद (बसपा)
बसपा के पुराने नेता। शाहाबाद से सांसद व विधायक रह चुके हैं। मुसलमानों में अच्छी पैठ।
तरकश के तीर : दलित व मुस्लिम वोटों का सहारा, 8-10 महीने से क्षेत्र में सक्रिय, विस चुनाव में सपा की हवा होने के बावजूद क्षेत्र की तीन सीटों पर बसपा का कब्जा।
मोदी का भी असर
क्षेत्र में भाजपा का भविष्य जो भी हो पर इलाके में मोदी के नाम की चर्चा अन्य इलाकों की तरह गांव-गांव है।
प्रत्याशी रेखा वर्मा के पति अरुण वर्मा को पहले बसपा ने अपना प्रत्याशी बनाया था, बाद में बदलकर दाउद अमहद को दे दिया।
नाराज अरुण ने भाजपा का दामन थाम लिया, पर कुछ महीने पहले हार्टअटैक से मौत हो गई। इलाके में चर्चा है कि रेखा को वरुण गांधी ने टिकट दिलवाया है और अब चुनाव में भी सहयोग कर रहे हैं।
खास बात है कि मोदी फैक्टर के कारण ब्राह्मणों के गांव में भी रेखा को ताकत देने की बात सुनी जा रही है।
मुस्लिम वोटों के लिए दलों में होड़
क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 20 फीसदी के आसपास है। सपा, बसपा व कांग्रेस प्रत्याशी मुस्लिम वोटों को अपनी ओर खींचने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं।
बसपा के दाउद अहमद को मुस्लिम व दलित बहुल इलाकों में ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। चुनाव को लेकर सबसे ज्यादा मेहनत सपा के नौजवान प्रत्याशी आनंद भदौरिया ने की है।
एक साल पहले से सक्रिय हो गए थे। पहले घर-घर पदयात्रा फिर रथयात्रा से क्षेत्र को मथा।
मितौली को तहसील का दर्जा दिलाने व अन्य छोटे-मोटे विकास कार्यों का हवाला देने के साथ ही कांग्रेस व बसपा प्रत्याशी को बाहरी बताकर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
जितिन भी कांग्रेस को ही असल सेक्युलर दल बताकर पिछले चुनाव की तरह मुसलमानों की सहानुभूति हासिल करने के चक्कर में हैं।
बिजली का वादा भी नहीं हुआ पूरा
धौरहरा कस्बे के पास फत्तेपुर गांव के पास एक बैनर लगा है जिसमें लिखा है कि ‘बिजली पानी सड़क नहीं तो वोट नहीं, झूठे नेताओं को अब सपोर्ट नहीं।’
गांव के प्रधान शहाबुद्दीन कहते हैं कि हमारी समस्या का समाधान न हुआ तो गांव के लोग चुनाव का बहिष्कार करेंगे।
बताते हैं कि गांव में बिजली के खंभे तक नहीं हैं। पिछले चुनाव में जितिन प्रसाद ने कहा था कि हमारी बत्ती जलवा दो हम आपकी बिजली जलवा देंगे। उनकी बत्ती तो जल गई पर हम अब भी अंधेरे में हैं।
...पर मुद्दा काम है ही नहीं
इलाके के बड़े किसान व तराई किसान संगठन के नेता धौरहरा कस्बा निवासी आशुतोष तिवारी कहते हैं कि बतौर सांसद जितिन की भूमिका कुल मिलाकर संतोषजनक रही।
तिवारी कहते हैं कि जितिन ने क्या कराया या नहीं कराया यह चुनाव में मुद्दा ही नहीं। जितिन को न काम कराने का लाभ मिलता दिख रहा है और न ही काम कराने को लेकर विशेष नाराजगी भी झेलनी पड़ रही है।
चुनाव तो कुछ अन्य ही कारणों से प्रभावित होता दिख रहा है। घोषणा के बावजूद क्षेत्र में स्टील प्लांट न होना व कुछ गांवों में कटान के सवाल को छोड़ दें तो इलाके में कोई मुद्दा नहीं।
ब्राह्मणों व मुसलमानों में जितिन के प्रति जो एकजुटता पिछली बार दिखती थी, इस बार वैसी नहीं। फिर भी अपनी सौम्यता व सहजता के साथ जी जान से जुटे हैं।
हालांकि सभी विरोधी दल उन्हीं से अपना मुकाबला मान रहे हैं और अपने भाषणों में उन्हीं को निशाना बना रहे हैं।