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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Ground report: Many houses in Sitapur got submerged in Saryu due to water from Nepal, the government left them

ग्राउंड रिपोर्ट: नेपाल के पानी से सीतापुर में कई घर सरयू में समाए, शासन ने 20 किलो राशन देकर उनके हाल पर छोड़ा

Mon, 01 Sep 2025 09:35 AM IST
रोहित मिश्र अभिषेक राज, अमर उजाला, लखनऊ
अभिषेक राज, अमर उजाला, लखनऊ Published by: रोहित मिश्र Updated Mon, 01 Sep 2025 09:35 AM IST
सार

Rivers overflowing in Nepal: लगातार हो रही बारिश और नेपाल से छोड़े गए पानी से सरयू का जलस्तर तेजी के साथ बढ़ा है। इस नदी के किनारे बसे गांव गांव इससे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। 

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Ground report: Many houses in Sitapur got submerged in Saryu due to water from Nepal, the government left them
बाढ़ से कई गांव नदी में समाए। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

 बारिश और नेपाल से छोड़े गए पानी से सीतापुर के महमूदाबाद तहसील क्षेत्र में सरयू का रौद्र रूप दिख रहा है। कटान से शुकुलपुरवा के रामरूप पुरवा, लोधन पुरवा, छोटे पुरवा, महाजन पुरवा, सुंदर पुरवा और झकटु पुरवा के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है। भूषणपुरवा और लोधनपुरवा की पहचान ही मिटने वाली है। नदी मूल स्थान से दो किमी हटकर लगातार कटान कर रही है। करीब 100 कच्चे घर नदी में विलीन हो गए, लेकिन बाढ़ प्रभावित परिवारों को मदद के नाम पर बस एक बार राशन किट मिली, जिसमें राशन के नाम पर 10 किलो आटा व 10 किलो चावल रहा। इसके बाद मदद के नाम पर ग्राम प्रधान श्रीराम ने बस चार दिन लंच पैकेट बंटवाए। अब वह भी बंद है। ऐसे में कटान प्रभावित ग्रामीणों के समक्ष पेट पालने की मुश्किल है।

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कटान प्रभावितों का असल हाल जानने हम सरयू की दो सहायक नदियों को नाव से पार करना पड़ा। बंगाली घाट और बांके घाट होते हुए हम किसी तरह तबाह हुए रामरूप पुरवा पहुंचे। गांव की मीना यादव ने बताया कि राशन किट में लाई, चना, भूना चना, चीनी, बिस्कुट, माचिस, मोमबत्ती, नहाने का साबुन, बाल्टी, तिरपाल, आटा, चावल, आलू (10-10 किलो), अरहर दाल (दो किलो), हल्दी (200 ग्राम), मिर्च (100 ग्राम), सब्जी मसाला (200 ग्राम), सरसों का तेल और नमक मिला था। घर में खाने वाले 10-10 लोग हैं। बड़ी मुश्किल से 15 दिन काम चला। अब खाने के लाले हैं। प्रशासनिक अधिकारी दौरा तो करते हैं, लेकिन सभी ने हमें हमारे हाल पर ही छोड़ दिया है।
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अर्चना की भी दिक्कत यही है। परिवार में छह सदस्य हैं। एक बार राशन किट के बाद फिर कुछ नहीं मिला। मजबूरी में  रामपुर मथुरा जाकर परिवार के सदस्यों को मजदूरी करनी पड़ रही है, तब कहीं चूल्हा जल रहा है। हमें देखकर कटान से तबाह सुखदेई की आंख भर आई। रोते हुए बताया कि साहब सब तबाह हो गया। खेती नदी में समा गई। घर भी कट गया। अब छप्पर डालकर किसी तरह से समय काट रहे हैं। बुरा हाल है। उन्हें किसी तरह से चुप कराया। हमें मुनेश्वरी ने बताया कि पशुओं के टीकारण का भरोसा दिया गया था, लेकिन कोई यहां झांकने नहीं आया। पूरी व्यवस्था भगवान भरोसे ही है। अब तो यही चिंता सताती है कि शाम को घर का चूल्हा कैसे जलेगा। घर में अन्न का एक दाना भी नहीं बचा है।
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एक विडंबना यह भी  

-   तटबंध के भीतर नदी के किनारे बनाया आशियाना 
-    हर साल कटान से होते हैं प्रभावित, स्थाई ठौर की तलाश
-    खेती और पशुपालन ही आय का साधन 
-    परिवार के सदस्य दिल्ली, मुंबई और लुधियाना में करती हैं काम

तय की गई है जिम्मेदारी

बाढ़ व कटान प्रभावित परिवारों तक हर सुविधा पहुंचाने के लिए जिम्मेदारी तय की गई है। जिले स्तर से भी इसकी निगरानी की जा रही है। इसमें कहीं भी लापरवाही हुई तो सख्त कार्रवाई होगी। -नीतीश कुमार सिंह, एडीएम वित्त एवं राजस्व
 
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