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सामने आया सरकारी स्कूलों का शर्मनाक सच!

Mon, 05 Jan 2015 11:58 PM IST
सचिन त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ
सचिन त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 05 Jan 2015 11:58 PM IST
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Govt school teachers do not complete the syllabus.

सरकारी स्कूलों में आधी-अधूरी पढ़ाई से ही शिक्षक बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं। बच्चों को किताबों और परीक्षा के दबाव से मुक्ति दिलाकर पढ़ाई रोचक बनाने का काम, सतत मूल्यांकन में भी स्कूलों की कोई खास रुचि नहीं है।

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61 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में टीचर्स पूरा सिलेबस नहीं पढ़ाते। 60 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में बच्चों का सतत मूल्यांकन ही नहीं किया जा रहा है।

यह बात सामने आई सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का स्तर जांचने के लिए राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के सर्वे में।

यह अध्ययन देश के 28 राज्य व सात केंद्र शासित प्रदेशों के 1000 स्कूलों में किया गया है। उत्तर प्रदेश में बाराबंकी के 43 स्कूलों पर सर्वे किया गया।

सर्व शिक्षा अभियान सेल के प्रो. योगेश कुमार अध्यक्षता में हुए सर्वेक्षण के बाद यह रिपोर्ट जारी की गई है।

ये है सिलेबस न पूरा होने का कारण

Govt school teachers do not complete the syllabus.

देश भर में सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर जांचने के लिए इस एनसीईआरटी की ओर से सर्वे कराया गया। रिपोर्ट में सामने आया कि 61 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में बच्चों को निर्धारित सिलेबस पूरा नहीं पढ़ाया जाता है।

इसका कारण शिक्षकों की कमी, लापरवाही, टीचर्स का दूसरे कामों में लगाया जाना आदि बताया गया है। बच्चों को रोचक ढंग से पढ़ाने, उन पर से पढ़ाई और परीक्षा का दवाब खत्म करने के लिए आरटीई और सर्व शिक्षा अभियान के तहत शुरू लगातार मूल्यांकन में भी स्कूल शामिल नहीं हो रहे हैं।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि स्कूलों में परीक्षा का बजट नहीं दिया जाता तो शिक्षाधिकारी जवाब में कहते हैं कि स्कूलों में तो सतत मूल्यांकन होते रहते हैं, ऐसे में परीक्षा का खास महत्व नहीं है।

अब रिपोर्ट में सामने आए बिंदुओं से शिक्षाधिकारियों की पोल खुलती नजर आ रही है। एनसीईआरटी की रिपोर्ट के अनुसार पूरे वर्ष केवल 40 प्रतिशत सरकारी स्कूल ही बच्चों का लगातार मूल्यांकन करते हैं।

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62 प्रतिशत स्कूलों में नहीं मिलता पढ़ाई का माहौल

Govt school teachers do not complete the syllabus.

एनसीईआरटी की रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश के 62 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई का अच्छा माहौल नहीं मिल रहा है। इससे बच्चे अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं।

इस मामले में अन्य राज्यों के साथ ही उत्तर प्रदेश भी शामिल है। रिपोर्ट में भाषा और गणित के ज्ञान का स्तर भी परखा गया है। सरकारी स्कूलों में भाषा और गणित दोनों की पढ़ाई में स्टूडेंट्स का प्रदर्शन औसत से नीचे रहा है।

क्लास में बच्चे बने रहते हैं मूकदर्शक
रिपोर्ट के अनुसार कक्षा में पढ़ाई के दौरान बच्चों की सहभागिता काफी कम होती है। केवल 35 प्रतिशत स्कूलों में ही बच्चे पढ़ाई में सहभागी पाए गए।

65 प्रतिशत स्कूलों में पढ़ाई के दौरान केवल शिक्षक एक्टिव रहते हैं। बच्चे कक्षा में केवल मूकदर्शक की भूमिका में रहते हैं। इसका असर बच्चों की सीखने की क्षमता पर पड़ रहा है।

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बाराबंकी के 43 स्कूलों में हुआ सर्वे

Govt school teachers do not complete the syllabus.

उत्तर प्रदेश के समग्र आंकलन के लिए राजधानी के बजाय पड़ोस के बाराबंकी जनपद को चुना गया था। बाराबंकी के 43 सरकारी स्कूलों में यह सर्वे हुआ। देश भर में एक हजार स्कूलों को शामिल किया गया। इन्हीं के आधार पर रिपोर्ट का प्रकाशन किया गया है।

सरकारी नौकर नहीं, खुद को बस शिक्षक समझें
इस पर शिक्षाशास्त्री डॉ. दिनेश कुमार का कहना है कि सरकारी स्कूलों के पढ़ाई के स्तर में पिछले 10-15 साल में ही बदलाव आया है। शिक्षकों को समझना चाहिए कि वे सरकारी नौकर नहीं हैं, बल्कि शिक्षक हैं। जब वे अपने को शिक्षक के रूप में देखेंगे तो निश्चित ही बेहतर करने के लिए प्रेरित होंगे।

इसी तरह सरकार को चाहिए कि वे भी शिक्षक को शिक्षक ही रहने दें। वर्तमान समय में शिक्षकों की कमी होेने के बावजूद उनसे दुनिया भर के काम कराए जाते हैं। इससे भी शिक्षण की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

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