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आईसीयू में राजधानी के सरकारी अस्पताल
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Mon, 17 Feb 2014 09:54 AM IST
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संदीप सिंह चौहान की मां का पल्मोनरी मेडिसिन विभाग में बेड नंबर 22 पर इलाज चल रहा था।
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इसी बीच उन्हें डायरिया हो गया। डॉक्टर को बताया तो उन्होंने रात को लोमोटिल की एक गोली दे दी। इसके बाद न तो मरीज को दस्त और न ही पेशाब हुई।
पेट में दर्द अलग से होने लगा। डॉक्टर नर्स को जानकारी दी गई लेकिन दो दिन तक कोई डॉक्टर नहीं आया। हालत गंभीर होने पर उन्हें आईसीयू में भर्ती के लिए किसी और अस्पताल ले जाने की सलाह दी गई।
रैगिंग के डर से एमसी सक्सेना ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट की छत से कूदी सुम्बुल को अचानक सांस लेने में दिक्कत हुई थी।
इस पर डॉक्टरों ने ट्रैकियास्टमी कर उसके गले में सीटी लगाई। लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। इसके बाद ट्रॉमा वेंटीलेटर यूनिट में सुम्बुल को भर्ती करने के लिए ‘रिफ्रेंस’ भेज दिया गया।
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बेड खाली न होने के कारण उसे तुरंत शिफ्ट नहीं किया जा सका। कई घंटे बाद वेंटीलेटर मिला लेकिन देर होने से उसकी मौत हो गई।
यह हाल है एशिया के सबसे बड़े अस्पताल किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी का जो सुपर स्पेशियलिटी इलाज का दावा करता है। हाल यह है कि यहां गंभीर मरीजों कि समुचित इलाज के इंतजाम ही नहीं हैं।
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इंडियन हेल्थ स्टैंडर्ड के मानक के अनुसार हर विभाग के कुल बेड के 10 फीसदी बेड आईसीयू में होने चाहिए। लेकिन 3200 सौ बेड के केजीएमयू में पांच फीसदी बेड भी आईसीयू में उपलब्ध नहीं हैं।
ट्रॉमा सेंटर में 22 बेड की वेंटीलेटर यूनिट का दावा किया जाता है। मगर वहां भी केवल सिर्फ 15 बेडों पर ही इलाज किया जाता है।
राजधानी में गंभीर मरीजों को इलाज की जरूरत तो उसे आसानी से केजीएमयू या ट्रॉमा सेंटर में इलाज नहीं मिलेगा।
हाई डिपेंडेंसी यूनिट (एचडीयू) और इंटेसिव केयर यूनिट (आईसीयू) के सीमित बेड होने के कारण आए दिन कई मरीजों को बिना इलाज के वापस लौटना पड़ता है।
राजधानी के पड़ोस के जिलों से लेकर पूर्वांचल के मरीजों के भार से दबे केजीएमयू में करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद जरूरत के अनुसार आईसीयू और वेंटीलेटर की व्यवस्था नहीं है।
प्रदेश का इकलौता ट्रॉमा सेंटर केजीएमयू में है। लगभग रोजाना ही दुर्घटनाओं में घायल गंभीर मरीज वहां आते हैं।
वेंटीलेटर यूनिट के बेड खाली न होने के कारण उन्हें निजी अस्पताल की ओर रुख करना पड़ता है।
केजीएमयू के सीएमएस प्रो. एसएन शंखवार कहते हैं कि शताब्दी में 30 बेड की आईसीयू यूनिट शुरू की जानी है।
इससे मरीजों को कुछ राहत मिलेगी। सेकंड फेज में बेड बढ़ने के साथ ही आईसीयू के बेड बढ़ाए जाएंगे। विभागों में भी एचडीयू और आईसीयू के बेड बढ़ाए जा रहे हैं।
किसी भी महिला अस्पताल में आईसीयू नही
राजधानी के किसी सरकारी महिला अस्पताल में आईसीयू वार्ड की सुविधा नहीं है। गर्भावस्था के दौरान संक्रमण, अचानक गुर्दे फेल होना और प्रसव के दौरान अचानक रक्तस्राव के कारण महिला को क्रिटिकल केयर की आवश्यकता होती है।
इसमें गुर्दे फेल होने पर तुरंत डायलिसिस की व्यवस्था, फेफड़ों में पानी भर गया हो तुरंत वेंटीलेटर, रक्तस्राव हो रहा तो तुरंत रक्त की व्यवस्था कर उसे चढ़ाना, लिवर फेल हो तो गहन चिकित्सा कक्ष में भर्ती किया जाना जरूरी होता है।
यदि सभी जिला महिला अस्पतालों कम से कम सीसीयू का छह-छह बेड का सेटअप भी डाल दिया जाए तो गर्भवती महिलाओं और बच्चों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है।
अधिकारियों की अपनी मजबूरी
लोहिया अस्पताल के सीएमएस डॉ. आरसी अग्रवाल ने बताया कि अस्पताल में बेड के अनुपात में आईसीयू की सुविधा नहीं है।
इस वजह से कई बार मरीजों को दूसरे अस्पताल रेफर करना पड़ता है। आईसीयू में बेड बढ़ाने के साथ स्टाफ भी बढ़ाना होगा तभी भर्ती मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकेगा।
बलरामपुर अस्पताल के निदेशक डॉ. टीपी सिंह के अनुसार अस्पताल के आईसीसीयू यूनिट में 14 बेड की संख्या है।
बेड की कमी से परेशानी तो होती है लेकिन सबसे पहले अस्पताल में भर्ती मरीजोंको आईसीयू की सुविधा देने की प्राथमिकता है।
सिविल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. आशुतोष दुबे ने बताया कि अस्पताल के आईसीयू वार्ड में आठ बेड की व्यवस्था है जिसमें छह मरीजों को भर्ती किया जाता है। दो बेड वीआईपी मरीजों के लिए रिजर्व रखे जाते हैं।
आईसीयू में बेड कम होने से बाहर के मरीजों की भर्ती मुश्किल ही होती है हालांकि अस्पताल में भर्ती हृदय रोगियों और दूसरे गंभीर मरीजों को बेहतर इलाज देने की पूरी कोशिश की जाती है।