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मैरिज रजिस्ट्रेशन पर सरकार को चाहिए वक्त
शोभित श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sun, 19 Jan 2014 10:04 AM IST
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प्रदेश में विवाह पंजीकरण की अनिवार्यता के मसले पर सरकार अब दोहरी नीति पर उतर आई है।
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चुनावी वर्ष होने के कारण एक ओर सरकार ने इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया है, वहीं सुप्रीम कोर्ट में अपनी गर्दन बचाने के लिए और समय मांगने की तैयारी कर ली है।
सुप्रीम कोर्ट में 20 जनवरी को इस मामले की सुनवाई होनी है। दरअसल, लोकसभा चुनाव मुहाने पर हैं, ऐसे में सरकार कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती है।
विवाह पंजीकरण की अनिवार्यता करने पर जो लोग पंजीकरण नहीं कराएंगे, उनके खिलाफ कुछ न कुछ कार्रवाई भी सरकार को करनी होगी।
मुस्लिम समुदाय का विवाह पंजीकरण की अनिवार्यता पर सबसे ज्यादा विरोध है। चुनावी वर्ष में मुस्लिम समुदाय की नाराजगी सरकार बर्दाश्त नहीं कर सकती है।
इसलिए उसने महिला कल्याण विभाग के इस प्रस्ताव को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को वर्ष 2006 में विवाह पंजीकरण की अनिवार्यता के निर्देश दिए थे।
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उसने यह फैसला सीमा बनाम अश्वनी कुमार के केस में सुनाया था। इस पर उच्चतम न्यायालय लगातार राज्यों की मॉनिटरिंग भी कर रहा है।
इसी मामले की सुनवाई अब 20 जनवरी होने वाली है। इसमें यूपी सरकार को भी अपने यहां की प्रगति की सूचना देनी है।
प्रदेश सरकार ने एक बार फिर न्यायालय से इसके लिए और समय मांगने की तैयारी कर ली है। सरकार ने अपने पत्र में कहा है कि उनके यहां इसकी नियमावली बनाने की प्रक्रिया चल रही है।
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इसके बनने में अभी थोड़ा वक्त और लगेगा। इसके बाद यह प्रभावी हो जाएगी। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में प्रदेश सरकार एक शपथ पत्र दे चुकी है।
इसमें उसने कहा है कि प्रदेश सरकार अपने यहां नियम बनाकर विवाह पंजीकरण की अनिवार्यता करेगी। इसलिए भी उसकी दिक्कत बढ़ गई है।
क्या है महिला कल्याण विभाग का प्रस्ताव
मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने विवाह पंजीकरण की अनिवार्यता के लिए नियमावली बनाने का जिम्मा महिला कल्याण विभाग को सौंपा था।
इसी के बाद विभाग ने एक प्रारंभिक प्रस्ताव तैयार किया। इसमें पंजीकरण न कराने वाले लोगों की सरकारी सेवाओं का लाभ न देने की सिफारिश की गई है।
हालांकि यह अभी तय नहीं हो सका है कि विवाह पंजीकरण कौन विभाग करेगा। पिछले दिनों सरकार ने इस प्रस्ताव को फिलहाल ठंडे बस्ते में डालने के निर्देश दे दिए हैं।