यूपी: हॉकी की गोल्ड मेडलिस्ट टीम के खिलाड़ी रविन्द्र पाल सिंह का कोरोना से निधन
रविंद्र पाल सिंह लखनऊ के एकमात्र हॉकी खिलाड़ी थे जिन्होंने दो ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व किया।
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शहर के दिग्गज खिलाड़ियों के बीच एक सितारा सबका साथ छोड़कर चला गया। साथियों के बीच रब्बू भाई के नाम से चर्चित रविंद्र पाल सिंह के बारे में जितना भी बताया जाए, कम है। मनमौजी, यारों के यार और मदद के लिए हमेशा तैयार रहने वाले हॉकी ओलंपियन ने शनिवार सुबह कोरोना से लड़ते हुए दुनिया को अलविदा कह दिया।
तीन दिन पहले उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से आर्थिक मदद की गुहार की थी, जिस पर हॉकी इंडिया समेत तमाम लोग उनकी मदद को सामने भी आए। 61 वर्षीय रविंद्र पाल सिंह एकमात्र लखनवी खिलाड़ी है, जिन्होंने मास्को (वर्ष 1980) और लॉस एंजलिस (वर्ष 1984) ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। मास्को ओलंपिक का स्वर्ण पदक उनके कद को और भी बड़ा बनाता है।
परिवार से रविंद्र पाल को इस कदर लगाव था कि इन जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते वे अपनी गृहस्थी ही नहीं बना पाए। स्टेट बैंक में अफसर के पद से उन्होंने व्यक्तिगत कारणों से स्वेच्छिक सेवानिवत्ति ले ली। पिता रितुपाल सिंह फुटबॉलर थे, लेकिन रविंद्र ने बड़े भाई हॉकी खिलाड़ी राजेंद्र पाल सिंह के साथ हॉकी खेलनी शुरू की और बड़े सितारे बनकर उभरे।
मेरे कई गोलों में रवींद्र का योगदान : सैयद अली
शहर के हॉकी ओलंपियन और रविंद्र के सीनियर रहे सैयद अली बताते हैं कि मैदान में मैच के दौरान हमारी जुगलबंदी देखते ही बनती थी। सेंटर हॉफ की पोजीशन से खेलने वाले रविंद्र का खेल बेजोड़ था। उनके टीम में होने से ही प्रतिंद्वद्वी टीम के खिलाड़ी परेशान हो जाते थे, क्योंकि गोल बनाने के लिए पास देने की कला में वह माहिर था। मेरे कई गोल उसने शानदार पास की बदौलत हुए। बतौर इंसान उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। स्टेट बैंक में साथ में काम के दौरान रविंद्र ने तमाम साथियों के लिए लोन लिया और उनका कर्जा सालों तक चुकाया।
1981 का यूरोप टूर यादगार : सुजीत कुमार
मैदान में स्किलफुल हॉकी में महारथ रखने वाले पाल साहब बाहर में मस्तमौला इंसान थे। दोस्तों के साथ उनका याराना देखते ही बनता था। मुझे 1981 का यूरोप और पाकिस्तान टूर हमेशा याद रहेगा, क्योंकि उस वक्त भारतीय टीम में मेरे और उनके अलावा मो. शाहिद और सैयद भाई शामिल थे। उस दौरान हम चारों ने मिलकर खूब मजे किए और बेहतरीन हॉकी खेली। आप विश्वास नहीं करोंगे कि परिवार और दोस्तों से बेहद लगाव के कारण उन्होंने कई बार इंडिया कैंप तक छोड़ दिया नहीं तो उनके खाते में कम से कम एक ओलंपिक और भी होता।
मेरे कई गोलों में रवींद्र का योगदान : सैयद अली
शहर के हॉकी ओलंपियन और रविंद्र के सीनियर रहे सैयद अली बताते हैं कि मैदान में मैच के दौरान हमारी जुगलबंदी देखते ही बनती थी। सेंटर हॉफ की पोजीशन से खेलने वाले रविंद्र का खेल बेजोड़ था। उनके टीम में होने से ही प्रतिंद्वद्वी टीम के खिलाड़ी परेशान हो जाते थे, क्योंकि गोल बनाने के लिए पास देने की कला में वह माहिर था। मेरे कई गोल उसने शानदार पास की बदौलत हुए। बतौर इंसान उसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है। स्टेट बैंक में साथ में काम के दौरान रविंद्र ने तमाम साथियों के लिए लोन लिया और उनका कर्जा सालों तक चुकाया।
1981 का यूरोप टूर यादगार : सुजीत कुमार
मैदान में स्किलफुल हॉकी में महारथ रखने वाले पाल साहब बाहर में मस्तमौला इंसान थे। दोस्तों के साथ उनका याराना देखते ही बनता था। मुझे 1981 का यूरोप और पाकिस्तान टूर हमेशा याद रहेगा, क्योंकि उस वक्त भारतीय टीम में मेरे और उनके अलावा मो. शाहिद और सैयद भाई शामिल थे। उस दौरान हम चारों ने मिलकर खूब मजे किए और बेहतरीन हॉकी खेली। आप विश्वास नहीं करोंगे कि परिवार और दोस्तों से बेहद लगाव के कारण उन्होंने कई बार इंडिया कैंप तक छोड़ दिया नहीं तो उनके खाते में कम से कम एक ओलंपिक और भी होता।
खेलने के अलावा घूमने और सिनेमा देखने के शौकीन : महेंद्र बोरा
पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी महेंद्र बोरा कहते हैं कि रब्बू के साथ लंबा साथ रहा। मेरठ के बाद हमने लखनऊ हॉस्टल में सालों हॉकी खेली। उस वक्त कोलकाता में हम साथ में ही मोहन बगान हॉकी क्लब के लिए खेलने जाते थे। मैच और प्रैक्टिस के अलावा रब्बू भाई को घूमने और सिनेमा देखने का बहुत शौक था। जब भी समय मिला, हम साथ में शहर घूमने निकल जाते।
जूनियरों का खूब बढ़ाया उत्साह : आरपी सिंह
खेल निदेशक एवं पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी आरपी सिंह ने बताया कि अभी हाल में हॉकी इंडिया में मुझे हॉकी परफॉमेंस एंड डेवलपमेंट कमेटी का चेयरमैन बनाया गया था। उस वक्त शहर के सभी हॉकी खिलाड़ियों ने एक कार्यक्रम आयोजित किया। अमूमन पाल साहब ऐसे आयोजनों से परहेज करते थे, लेकिन मेरे एक बार अनुरोध करने पर वे तुरंत ही आ गए। कार्यक्रम में अपने संबोधन में उन्होंने अपनी शायरी से समां बांध दिया और समोराह में चार चांद लगा दिए।
कॅरिअर पर एक नजर
सेंटर हाफ (मिडफील्डर)
वर्ष 1979 में जूनियर वर्ल्ड कप
वर्ष 1979 में चैंपियंस ट्रॉफी
वर्ष 1980 मास्को ओलंपिक की स्वर्ण पदक विजेता टीम के सदस्य
वर्ष 1984 लॉस एंजिल्स ओलंपिक में प्रतिभाग
वर्ष 1982 में वर्ल्ड कप