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आंखों में वॉल्ब लगाने से ठीक होगा गंभीर ग्लूकोमा

Mon, 11 Mar 2019 01:16 AM IST
सौरभ दिक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: सौरभ दिक्षित Updated Mon, 11 Mar 2019 01:16 AM IST
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Glaucoma will be corrected by applying eye valve
doctor
मधुमेह और उच्च रक्तचाप वाले लोगों के साथ ही गंभीर ग्लूकोमा से पीड़ित मरीजों का इलाज अब आसान हो गया है। इसके लिए एसजीपीजीआई के चिकित्सक ने नई तकनीक विकसित की है। इसमें गंभीर ग्लूकोमा से पीड़ितों की आंखों में एक वॉल्ब लगाया जा रहा है।
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अब तक छह मरीजों में यह प्रयोग पूरी तरह से सफल रहा है। इसमें करीब 20 हजार रुपया खर्च होता है। ग्लूकोमा के मरीजों में ट्रेबक्युलेक्टमी सर्जरी की जाती है। कई बार यह असफल हो जाती है। खासतौर से मधुमेह और उच्च रक्तचाप वाले मरीजों में ज्यादा दिक्कत होती है। इन्हें निओवास्कुलर ग्लूकोमा हो जाता है।
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इसी तरह कुछ मरीजों को ग्लूकोमा की गंभीर स्थिति यानी यूविआइटिक ग्लूकोमा, पोस्ट ट्राइमेटिक ग्लूकोमा, स्टेरॉयड ग्लूकोमा हो जाता है। इनमें साधारण सर्जरी कारगर नहीं होती है। अब ग्लूकोमा के करीब 20 फीसदी मरीजों में गंभीर ग्लूकोमा पाए जा रहे हैं। ऐसे मरीजों के लिए नई तकनीक विकसित की गई है।
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इस तकनीक में ग्लूकोमा वॉल्ब लगाया जाता है। एसजीपीजीआई के ग्लूकोमा प्रभारी असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वैभव जैन ने बताया कि यह तकनीक पूरी तरह से सफल साबित हुई है। इसमें आर्टिफिशियल ट्यूब व प्लेट होती है। ट्यूब को आंख के अंदर एंटीरियर चेंबर में फिट किया जाता है।

प्लेट को आंख के बाहरी हिस्से पर ऊपरी सतह पर स्क्लेरा के ऊपर लगाया जाता है। ट्यूब से आंख का पानी धीरे-धीरे रिसकर प्लेट तक पहुंचता है और वहां सूख जाता है। ऐसे में मरीज को किसी तरह की दिक्कत नहीं होती है। ट्यूब लगाने के बाद करीब सालभर तक मरीज पर नजर रखी जाती है।

कुछ ड्रॉप डालने पड़ते हैं। मरीज को ब्लड प्रेशर, शुगर, थायरॉइड पर नियंत्रित रखना पड़ता है। इसके लिए जरूरत के हिसाब से दवाएं और बचाव के उपाय बताए जाते हैं। स्टेरॉयड दवाओं से बचने की भी सलाह दी जाती है।

जानिए, क्या है ग्लूकोमा
इसे सबलबाई या काला मोतिया भी कहते हैं। इसमें आंखों की रोशनी जाने का खतरा रहता है। सही समय पर इलाज शुरू नहीं किया गया तो दोबारा रोशनी नहीं आती है। इस बीमारी में आंख में दबाव बढ़ने से ऑप्टिक नर्व क्षतिग्रस्त हो जाती है। ऑप्टिक नर्व आंख को दिमाग से जोड़ती है, जिससे हम देख पाते हैं।

लक्षण
आंखों में हल्का दर्द या भारीपन रहना। तेज सिरदर्द के साथ चक्कर आना। आंख में लालीपन आना। बल्ब के चारों तरफ रंगीन घेरे दिखाई देना। दूर दृष्टि या नजदीक दृष्टि में धुंधला दिखना।


ये है इलाज की प्रक्रिया
ग्लूकोमा होने पर आंख में दबाव को कम किया जाता है, जिससे नर्व को क्षतिग्रस्त होने से रोका जा सके। शुरुआती दौर में इसके लिए आईड्राप दी जाती है। दवा से ठीक नहीं होने पर सर्जरी की जाती है। इसे ट्रेबेक्युलेक्टमी सर्जरी करते हैं। इसके असफल होने पर वॉल्ब के जरिये इलाज किया जाता है। आमतौर पर मधुमेह व उच्च रक्तचाप वालों को निओवास्कुलर ग्लूकोमा होता है। इनमें यह सर्जरी सफल नहीं हो पाती है। इसी तरह यूविआईटिक ग्लूकोमा, पोस्ट ट्रामेटिक ग्लूकोमा और स्टेरॉयड ग्लूकोमा वाले मरीजों के लिए भी वॉल्ब तकनीक कारगर साबित होगी।
 
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