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Lucknow News: निजी अस्पतालों की क्रिटिकल केयर में इलाज कराना क्रिटिकल
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लखनऊ। राजधानी में निजी अस्पतालों की क्रिटिकल केयर यूनिट (सीसीयू) भगवान भरोसे चल रही हैं। गंभीर मरीजों के इलाज के लिए जहां एमबीबीएस और विशेषज्ञ डॉक्टर होने चाहिए, वहां आयुर्वेद, यूनानी आदि दूसरी विधाओं के डॉक्टर तैनात हैं। हैरानी की बात यह है कि इस पर जांच के आदेश हुए थे, लेकिन अफसरों ने कुछ अस्पतालों का औपचारिक निरीक्षण कर रिपोर्ट फाइलों में दबा दी।
शहर में करीब एक हजार से अधिक निजी अस्पताल हैं। इनमें से करीब छह सौ अस्पतालों में क्रिटिकल केयर यूनिट संचालित हैं। कागजों पर तो सभी में एमबीबीएस डॉक्टर दर्ज हैं, लेकिन हकीकत में बड़ी संख्या में यूनिट दूसरी विधा के डॉक्टरों के हवाले हैं।
उप्र विधानमंडल की महिला एवं बाल विकास समिति ने इस गंभीर लापरवाही पर डीजी हेल्थ को जांच कराने के निर्देश दिए थे। डीजी ने सीएमओ डॉ. एनबी सिंह को जिम्मेदारी सौंपी और उन्होंने पांच सदस्यीय कमेटी बनाई। हर सदस्य को अलग-अलग इलाकों की जांच का प्रभारी बनाया गया।
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लेकिन दो माह में कमेटी ने सिर्फ पांच-छह बड़े अस्पतालों का निरीक्षण किया और रिपोर्ट भेजकर मामला निपटा दिया। सीएमओ का दावा है कि जिन अस्पतालों की जांच हुई, वहां कुशल विशेषज्ञ मिले।
जांच में मिली सच्चाई
हाल ही में अफसरों ने पारस हॉस्पिटल और जनता हॉस्पिटल की जांच की थी। पारस हॉस्पिटल में सीसीयू चलाने वाली डॉक्टर बीयूएमएस डिग्री धारक निकलीं, जबकि जनता हॉस्पिटल में भी कुशल एमबीबीएस नहीं, बल्कि यूनानी डॉक्टर मिले थे।
दो महीने में केवल छह अस्पतालों की जांच
सीसीयू की जांच के लिए बनाई गई कमेटी में डॉ. एपी सिंह, डॉ. निशांत निर्वाण, डॉ. रवि पांडेय, डॉ. केडी मिश्रा और डॉ. संदीप सिंह शामिल हैं, लेकिन पांच सदस्यीय इस कमेटी ने दो माह में सिर्फ पांच-छह अस्पतालों का ही निरीक्षण किया। ऐसे में निजी अस्पतालों में इलाज कराना मरीजों के लिए क्रिटिकल साबित हो रहा है। सवाल है कि जब राजधानी में 600 से ज्यादा सीसीयू हैं, तो सिर्फ छह अस्पतालों की जांच से हकीकत कैसे सामने आएगी।
Iकमेटी बनाकर छह अस्पतालों में जांच की गई। सभी जगह एमबीबीएस डॉक्टर मिले। इसी आधार बनाकर डीजी हेल्थ को रिपोर्ट भेज दी गई है। I
I- डॉ. एनबी सिंह, सीएमओI
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शहर में करीब एक हजार से अधिक निजी अस्पताल हैं। इनमें से करीब छह सौ अस्पतालों में क्रिटिकल केयर यूनिट संचालित हैं। कागजों पर तो सभी में एमबीबीएस डॉक्टर दर्ज हैं, लेकिन हकीकत में बड़ी संख्या में यूनिट दूसरी विधा के डॉक्टरों के हवाले हैं।
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उप्र विधानमंडल की महिला एवं बाल विकास समिति ने इस गंभीर लापरवाही पर डीजी हेल्थ को जांच कराने के निर्देश दिए थे। डीजी ने सीएमओ डॉ. एनबी सिंह को जिम्मेदारी सौंपी और उन्होंने पांच सदस्यीय कमेटी बनाई। हर सदस्य को अलग-अलग इलाकों की जांच का प्रभारी बनाया गया।
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लेकिन दो माह में कमेटी ने सिर्फ पांच-छह बड़े अस्पतालों का निरीक्षण किया और रिपोर्ट भेजकर मामला निपटा दिया। सीएमओ का दावा है कि जिन अस्पतालों की जांच हुई, वहां कुशल विशेषज्ञ मिले।
जांच में मिली सच्चाई
हाल ही में अफसरों ने पारस हॉस्पिटल और जनता हॉस्पिटल की जांच की थी। पारस हॉस्पिटल में सीसीयू चलाने वाली डॉक्टर बीयूएमएस डिग्री धारक निकलीं, जबकि जनता हॉस्पिटल में भी कुशल एमबीबीएस नहीं, बल्कि यूनानी डॉक्टर मिले थे।
दो महीने में केवल छह अस्पतालों की जांच
सीसीयू की जांच के लिए बनाई गई कमेटी में डॉ. एपी सिंह, डॉ. निशांत निर्वाण, डॉ. रवि पांडेय, डॉ. केडी मिश्रा और डॉ. संदीप सिंह शामिल हैं, लेकिन पांच सदस्यीय इस कमेटी ने दो माह में सिर्फ पांच-छह अस्पतालों का ही निरीक्षण किया। ऐसे में निजी अस्पतालों में इलाज कराना मरीजों के लिए क्रिटिकल साबित हो रहा है। सवाल है कि जब राजधानी में 600 से ज्यादा सीसीयू हैं, तो सिर्फ छह अस्पतालों की जांच से हकीकत कैसे सामने आएगी।
Iकमेटी बनाकर छह अस्पतालों में जांच की गई। सभी जगह एमबीबीएस डॉक्टर मिले। इसी आधार बनाकर डीजी हेल्थ को रिपोर्ट भेज दी गई है। I
I- डॉ. एनबी सिंह, सीएमओI