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Lucknow News: रेल की जनरल बोगी बनी ट्रॉमा सेंटर की कैजुअल्टी
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कैजुअल्टी में भर्ती मरीज।
लखनऊ।किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के ट्रॉमा सेंटर में भीड़ की वजह से 42 बेड की कैजुअल्टी में करीब 70 मरीज रखने पड़ रहे हैं। संख्या ज्यादा होने से उनके स्ट्रेचर एक दूसरे से सटाकर रखने पड़ रहे हैं। इससे यह कैजुअल्टी कम और रेल की जनरल बोगी ज्यादा नजर आ रही है।
केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में इस समय 491 बेड हैं। इलाज की सुविधा और डॉक्टरों की कुशलता की वजह से प्रदेश भर से सड़क दुर्घटना और इमरजेंसी के अन्य मरीजों को यहां लाया जाता है। यहां आने वाले मरीजों को सबसे पहले कैजुअल्टी में रखा जाता है। कैजुअल्टी का मुख्य काम मरीजों को प्राथमिक उपचार देकर संबंधित विभाग के वार्ड में शिफ्ट करना है। इस समय हालत यह है कि मरीजों को कई-कई दिनों तक कैजुअल्टी में रखना पड़ रहा है। कई मरीजों को तो कैजुअल्टी से ही अन्य अस्पताल रेफर कर दिया जाता है।
24 घंटे के भीतर शिफ्ट होने चाहिए मरीज
नियमानुसार कैजुअल्टी के मरीजों को 24 घंटे के भीतर शिफ्ट किया जाना चाहिए। इसके पीछे दो मुख्य वजह हैं। पहली- मरीजों को प्राथमिक उपचार के लिए बेड खाली होना। दूसरी- मरीज को प्राथमिक के बजाय विशिष्ट उपचार उपलब्ध कराना। कैजुअल्टी में सिर्फ इमरजेंसी के विशेषज्ञ होते हैं, जबकि अन्य विधाओं के विशेषज्ञ इमरजेंसी के बजाय संबंधित विभाग में बैठते हैं। इसके बजाय मरीज और घायलों को कई दिनों तक कैजुअल्टी में रखा जा रहा है।
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कैजुअल्टी की टीम पर अतिरिक्त दबाव
ट्रॉमा सेंटर की कैजुअल्टी में दोगुने मरीज होने से चिकित्साकर्मियों की हालत भी खराब हो रही है। पूर्व की व्यवस्था के अनुसार, कैजुअल्टी के मरीजों को 24 घंटे के भीतर शिफ्ट किया जाता था। अगर किसी को बेड नहीं भी मिल पाया तो संबंधित वार्ड में स्ट्रेचर पर रखकर उनका इलाज किया जाता था। डॉक्टरों का कहना है कि कैजुअल्टी में बिना इलाज के रखने से अच्छा है कि मरीज को वार्ड में स्ट्रेचर पर इलाज दिया जाए।
Iट्रॉमा सेंटर की कैजुअल्टी से मरीज क्यों नहीं शिफ्ट हो पा रहे हैं, इसकी जानकारी ली जाएगी। संभव है कि विभाग में बेड उपलब्ध न होने पर ऐसा हो। प्रयास किया जाएगा कि मरीजों को जल्द से जल्द शिफ्ट किया जाए।
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I- प्रो. केके सिंह, प्रवक्ता, केजीएमयूI
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केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में इस समय 491 बेड हैं। इलाज की सुविधा और डॉक्टरों की कुशलता की वजह से प्रदेश भर से सड़क दुर्घटना और इमरजेंसी के अन्य मरीजों को यहां लाया जाता है। यहां आने वाले मरीजों को सबसे पहले कैजुअल्टी में रखा जाता है। कैजुअल्टी का मुख्य काम मरीजों को प्राथमिक उपचार देकर संबंधित विभाग के वार्ड में शिफ्ट करना है। इस समय हालत यह है कि मरीजों को कई-कई दिनों तक कैजुअल्टी में रखना पड़ रहा है। कई मरीजों को तो कैजुअल्टी से ही अन्य अस्पताल रेफर कर दिया जाता है।
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24 घंटे के भीतर शिफ्ट होने चाहिए मरीज
नियमानुसार कैजुअल्टी के मरीजों को 24 घंटे के भीतर शिफ्ट किया जाना चाहिए। इसके पीछे दो मुख्य वजह हैं। पहली- मरीजों को प्राथमिक उपचार के लिए बेड खाली होना। दूसरी- मरीज को प्राथमिक के बजाय विशिष्ट उपचार उपलब्ध कराना। कैजुअल्टी में सिर्फ इमरजेंसी के विशेषज्ञ होते हैं, जबकि अन्य विधाओं के विशेषज्ञ इमरजेंसी के बजाय संबंधित विभाग में बैठते हैं। इसके बजाय मरीज और घायलों को कई दिनों तक कैजुअल्टी में रखा जा रहा है।
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कैजुअल्टी की टीम पर अतिरिक्त दबाव
ट्रॉमा सेंटर की कैजुअल्टी में दोगुने मरीज होने से चिकित्साकर्मियों की हालत भी खराब हो रही है। पूर्व की व्यवस्था के अनुसार, कैजुअल्टी के मरीजों को 24 घंटे के भीतर शिफ्ट किया जाता था। अगर किसी को बेड नहीं भी मिल पाया तो संबंधित वार्ड में स्ट्रेचर पर रखकर उनका इलाज किया जाता था। डॉक्टरों का कहना है कि कैजुअल्टी में बिना इलाज के रखने से अच्छा है कि मरीज को वार्ड में स्ट्रेचर पर इलाज दिया जाए।
Iट्रॉमा सेंटर की कैजुअल्टी से मरीज क्यों नहीं शिफ्ट हो पा रहे हैं, इसकी जानकारी ली जाएगी। संभव है कि विभाग में बेड उपलब्ध न होने पर ऐसा हो। प्रयास किया जाएगा कि मरीजों को जल्द से जल्द शिफ्ट किया जाए।
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I- प्रो. केके सिंह, प्रवक्ता, केजीएमयूI