एक चिप खोलेगी सभी तरह के कैंसर का राज
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एक जीन चिप से सभी तरह के कैंसर का पता लगाना संभव है। ये सुविधा जल्द ही केजीएमयू के सेंटर फॉर एडवांस रिसर्च के मॉलिक्युलर बायोलॉजी विभाग में शुरू होगी।
तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं। इस जांच के लिए अत्याधुनिक माइक्रोएरे मशीन वहां पहले से ही स्थापित की जा चुकी है। केजीएमयू में शुक्रवार को कैंसर और अनुवांशिक रोगों में जीन तकनीक की उपयोगिता विषय पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में डॉ. नीतू सिंह ने यह जानकारी दी।
केजीएमयू के ब्राउन हॉल में आयोजित कार्यक्रम में मॉलिक्युलर बायोलॉजी विभाग की हेड डॉ. नीतू सिंह ने बताया कि जीन चिप तकनीक पर काम किया जा चुका है।
लगभग डेढ़ साल से विभाग में विभिन्न जांच की तकनीकों का मानकीकरण (स्टैंडर्डाइजेशन) किया जा चुका है। बच्चों के ब्रेन ट्यूमर, क्रॉनिक मॉयलायड ल्यूकीमिया का पता लगाने के लिए तकनीक स्थापित की जा चुकी है।
मुख्य व फेफड़ों के कैंसर पर शोध किया जा रहा है। इसके अलावा साइटोजेनेटिक्स जीनोमिक्स तकनीक से बच्चों में पैदाइशी होने वाले अनुवांशिक रोग मानसिक मंदता, डाउन सिंड्रोम का भी पता लगाना संभव हो गया है।
कैंसर की स्टेज के हिसाब से दवाएं देना संभव
संजय गांधी पीजीआई के बाद केजीएमयू प्रदेश का दूसरा संस्थान हैं जहां मॉलिक्युलर और जेनेटिक्स दोनों तरह की जांच की सुविधा मिलेगी।
ग्रीनवुड जेनेटिक सेंटर यूएसए से आई डॉ. अलका चौबे ने बताया कि बच्चों के पैदा होने से पहले ही भविष्य में होने वाली अनुवांशिक बीमारियों का पता लगाना संभव है। इसमें गर्भ से एमनिओटिक फ्ल्यूड (तरल पदार्थ) लिया जाता है।
इसके बाद उसमें से कोशिकाओं को निकालकर जांच की जाती है। इससे अनुवांशिक बीमारियों का पता चल जाता है। गर्भस्थ शिशु में अनुवांशिक रोग होने की आशंका दिखती है तो महिला को सलाह दी जाती है कि वह गर्भपात करा ले।
केजीएमयू के सेंटर फॉर एडवांस रिसर्च के स्टेम सेल एंड सेल कल्चर विभाग के हेड डॉ. शैलेंद्र सक्सेना ने बताया कि जीनोमिक्स टेक्नोलॉजी के विकास से कैंसर की पहचान जीन स्तर पर ही हो जाती है। इसके बाद टारगेटे थेरेपी देकर मरीज को कैंसर से जीन स्तर पर निजात दिला दी जाती है।
जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी यूएसए से आए प्रो. राकेश कुमार ने बताया कि जांच की नई सुविधाएं आ जाने से मरीजों को बहुत फायदा हुआ है। पहले कैंसर के सभी स्टेज के लिए एक ही दवा दी जाती थी।
अब कैंसर जिस स्टेज का है उस पॉवर की दवा दी जाती है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों की तरह भारत में भी उम्र के अनुसार पूरे शरीर की जांच कराने की जागरूकता लाना जरूरी है।