‘डोरबेल बजी, तृप्ता देखो, लगता है गौरी आ गई’
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अचानक डोरबेल बजती है। घर के एक कोने में बैठे गौरी के पापा उसकी मां से कहते हैं, तृप्ता देखो तो... लगता है गौरी आ गई?
आवाज सुनकर तृप्ता उठ जाती हैं... कुछ कदम चलती हैं... सहसा आंखें छलक पड़ती हैं... गौरी के पिता शिशिर की ओर देखती है... उनकी आंखें भी डबडबा जाती हैं... निगाहें जानती हैं कि गौरी अब नहीं है... लेकिन उसको ढूंढना नहीं भूलती।
दोनों निढाल होकर बैठ जाते हैं। दोनों की निगाहें टकराती हैं... मानों कह रही हों, अब गौरी कभी नहीं कहेगी, मम्मी-पापा मैं आ गई।
यूं तो वे गौरी के लिए शांति पाठ करवा चुके हैं। पर, उसकी पूर्णाहुति अभी बाकी है। यह तभी होगी जब बिटिया को पूरा न्याय मिलेगा।
ताकि किसी के साथ न हो ऐसा
शिशिर श्रीवास्तव कहते हैं कि खामोश बैठने का तो सवाल ही नहीं उठता। हम तब तक लड़ेंगे, जब तक उसकी निर्मम हत्या की गुत्थी सुलझ नहीं जाती।
जिस पीड़ा से गौरी के माता-पिता गुजर रहे हैं, किसी और को यह असहनीय दर्द न सहना पड़े। फिर कोई हिमांशु या उसके जैसे दरिंदे ऐसी दुस्साहस दोबारा न कर सकें।
इसके लिए हर माता-पिता को, हर बच्चे को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। क्या और कैसें... इस बारे में अमर उजाला ने बात की गौरी के पिता और माता से...ताकि ऐसी पीड़ा किसी दूसरे को न सहनी पड़े।
फेसबुक फ्रेंड लिस्ट से जुड़ें
सोशल नेटवर्किंग साइट्स के कारण बच्चे अपने परिवार से दूर होते जा रहे हैं। हम पैरेंट्स की ड्यूटी बनती है कि अगर बच्चा फेसबुक जैसी साइट्स पर एक्टिव है, तो इसकी मॉनिटरिंग करते रहें।
कोशिश करें कि बेटे या बेटी के फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में शामिल हो जाएं। टेक्नोलॉजी यूजर्स नहीं हैं तो कम से कम कमेंट्स में तो शामिल हो ही सकते हैं।
शिशिर कहते हैं कि मैं मानता हूं कि मोबाइल फोन वक्त की जरूरत बन चुके हैं। जितना बड़ों के लिए, उतना ही बच्चों के लिए।
अपने परिवार और दोस्तों, शिक्षकों के संपर्क में रहने के लिए इसकी जरूरत हैं। फिर भी हमें ध्यान देना होगा कि हर हाल में रात आठ बजे के बाद मोबाइल बंद कर दिए जाएं। बच्चों की पढ़ाई और घर से जुड़े रहने के लिए यह जरूरी है।
आंख मूंदकर भरोसा न करें
शिशिर कहते हैं कि सोशल मीडिया के कारण दोस्तों की बाढ़ आ गई है। इसे रोकना होगा। बच्चों को बताना होगा कि वे अनजान से दोस्ती से बचें।
आंख बंद कर भरोसा न कर लें। बच्चों को भी चाहिए कि वे माता-पिता, भाई-बहन या किसी करीबी दोस्त को नए फ्रेंड्स के बारे में जरूर बताएं।
शिशिर कहते हैं, गौरी घर से बिना बताए कभी गई नहीं। पता नहीं, उस दिन क्यों वह बिना बताए चली गई।
कहां गई, हमें मालूम ही नहीं पड़ा। बता कर गई होती तो शायद उसे हम बचा सकते। पैरेंट्स को बच्चों में यह आदत डालनी होगी कि वह जब भी कहीं जाएं, बता कर जाएं।
गौरी के मां-बाप की अपील
अपने मम्मी-पापा के संपर्क में लगातार बने रहें।
तृप्ता कहती हैं कि अक्सर बेटे-बेटी समझते हैं कि मम्मी-पापा रोकते-टोकते हैं।
बंदिशें लगाते हैं। उन्हें लगता है कि वे बड़े हो गए हैं। सच तो यह है कि माता-पिता की झिड़कियां यूं ही नहीं होतीं। उन्होंने दुनिया देखी होती है।
वे चाहते हैं कि उनका बच्चा हर मुश्किलों से बचा रहे। गौरी के बिना जीना बहुत कठिन है। मैं बच्चों से कहूंगी कि वे अपने पैरेंट्स की बात मानें।
मां बोली
1. बच्चे मां-बाप की डांट में छिपा दुलार भी समझें।
2. बच्चों को विश्वास में लेकर उनकी एक्टिविटी पर नजर रखें।
3. बच्चे कहीं भी जाएं, पैरेंट्स को इसकी जानकारी देते रहें।
पिता ने कहा
1. ‘साइबर वर्ल्ड’ ने खत्म कर दिया है परिवार का मोह।
2. गौरी की घटना से शायद अब बच्चे मम्मी-पापा की अहमियत समझेंगे।
3. बेटी को इंसाफ दिलाने की लड़ाई जारी रहेगी। पुलिस पूरा सच सामने लाए।