बड़े-बड़े वादे किए पर खर्च नहीं हो पाए अखिलेश के अनुपूरक बजट के 23 हजार करोड़
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पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सत्ता से विदाई की तमाम वजहें रहीं, लेकिन एक ताजा खुलासा ज्यादा चौंकाने वाला है। विकास के नाम पर अखिलेश जो बड़े-बड़े बजट लाए, अनुपूरक बजट की व्यवस्था की, उसका बड़ा हिस्सा जमीन पर पहुंच ही नहीं सका। सत्ता के आखिरी साल में 23 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा रकम बिना खर्च पड़ी रह गई।
पिछली अखिलेश सरकार वित्त वर्ष 2016-17 में मूल बजट के अलावा दो अनुपूरक बजट भी लाई थी। पहला अनुपूरक बजट अगस्त 2016 में जबकि दूसरा विधानसभा चुनाव की घोषणा के पहले दिसंबर 2016 में लाया गया था।
इन अनुपूरक बजट के जरिए 27,038.98 करोड़ रुपये जुटाए गए थे। सूत्रों के अनुसार, अब पड़ताल में यह बात सामने आई है कि 2016-17 के अनुपूरक बजट का 23,143.69 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं किए जा सके। यह दोनों अनुपूरक बजट से जुटाई गई रकम का 85.59 फीसदी है।
शासन के अधिकारी बताते हैं कि यह तस्वीर बताती है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री जिन तमाम कामों के लिए ये अनुपूरक बजट लेकर आए, वे अधूरे ही रह गए। साथ ही सरकार ने जिन नई योजनाओं का एलान किया, उनमें से भी कई पर एक पाई भी खर्च नहीं हो सका। इसका विस्तृत खुलासा सीएजी की आगामी रिपोर्ट में हो जाएगा।
विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की करारी शिकस्त के पीछे इसे भी एक बड़ी वजह माना जा सकता है। तत्कालीन सीएम योजनाओं का एलान करते रहे, बजट का प्रावधान करते रहे, लेकिन अफसर उन्हें आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे व लखनऊ मेट्रो में ही भरमाए रहे। प्रदेश के तमाम क्षेत्रों में योजनाएं जमीन पर उतर ही नहीं पाईं।
इसलिए लाते हैं अनुपूरक बजट
अनुपूरक बजट का प्रावधान उन खर्चों की पूर्ति के लिए किया जाता है, जहां मूल बजट से मिली रकम अपर्याप्त हो या अपर्याप्त रहने की संभावना हो। इसके अलावा अनुपूरक बजट के जरिए सरकार नई योजनाएं भी शुरू कर सकती है।
सीएजी की टिप्पणी का भी असर नहीं
प्रदेश के बजट पर सीएजी की लगातार तल्ख टिप्पणियां भी वित्त विभाग को बजट के सही आकलन के लिए तैयार नहीं कर पाईं। वित्त वर्ष 2015-16 में सीएजी ने खुलासा किया था कि 52 कामों के लिए 8120.51 करोड़ का अनुपूरक अनुदान लिया गया जो अनावश्यक सिद्ध हुआ।
इन कामों के लिए जो मूल बजट लिया गया था, वही खर्च नहीं हुआ था। सीएजी ने टिप्पणी की थी कि अनुपूरक बजट में किया गया प्रावधान वास्तविक आवश्यकताओं के आकलन पर आधारित नहीं था। 2016-17 में फिर ऐसी ही स्थिति सामने आ रही है।