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मरीज के पेट में तौलिया छूटा तो अस्पताल दोषी
अतुल भारद्वाज/अमर उजाला, लखनऊ
Updated Tue, 24 Dec 2013 11:55 PM IST
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राज्य उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष जस्टिस वीरेंद्र सिंह ने कहा कि अगर डॉक्टर की गलती से ऑपरेशन के दौरान मरीज के पेट में तौलिया छूट जाता है तो इसकी जिम्मेदारी नर्सिंग होम की भी है।
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नर्सिंग होम ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर के ऊपर लापरवाही की पूरी जिम्मेदारी नहीं डाल सकता। भले ही ऑपरेशन के लिए डॉक्टर को बाहर से बुलाया गया हो।
जस्टिस वीरेंद्र सिंह मंगलवार को यहां जियामऊ स्थित लखनऊ कैंसर हॉस्पिटल में विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस पर उपभोक्ता संरक्षण परिषद की गोष्ठी में बोल रहे थे।
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चिकित्सा क्षेत्र में उपभोक्ता के अधिकारों की अनदेखी पर उन्होंने कहा कि इलाज के दौरान लापरवाही की जिम्मेदारी किसकी है?
इसकी असलियत जानने के लिए कोई भी कोर्ट साक्ष्य का सहारा लेता है। इससे ही असली दोषी तय होता है, लेकिन इसमें नर्सिंग होम की भी जिम्मेदारी बनती है।
भले ही मरीज ने बाहर से ऑपरेशन या इलाज के लिए डॉक्टर बुलाया हो। ऐसे में नर्सिंग होम को अपने बचाव के लिए डॉक्टर और मरीज से कांट्रेक्ट साइन करा लेना चाहिए।
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जस्टिस वीरेंद्र सिंह का कहना था कि उपभोक्ताओं के अधिकारों के लिए कंपनियां सजग नहीं हैं। यही कारण है कि राज्य उपभोक्ता आयोग में 27 हजार मामले लंबित हैं। यह स्थिति तब है जब हम पांच बेंच चला रहे हैं।
उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए हमने कुछ रास्ते निकाले हैं। इसके तहत अगर कोई ठोस वजह नहीं है तो सेवा प्रदाता को पीरियड लिमिटेशन में छूट नहीं दी जाती।
इससे काफी मामले कम हो जाते हैं। दूसरे, कंपनी द्वारा स्वीकार की गई क्लेम राशि अदा करा दी जाती है। बाकी पर वाद जारी रखा जाता है। जरूरी होने पर वादी से भी वसूली कराए जाने का अधिकार उपभोक्ता आयोग के पास है।
गोष्ठी में परिषद के महानिदेशक विजय आचार्य, सचिव एन. खन्ना, विधि सलाहकार आरके पोरवाल, संयोजक एसके मित्तल, सेंट्रल बैंक के सीनियर रीजनल मैनेजर आनंद मोहन मौजूद रहे।
सबसे बड़ी मुसीबत बने झोलाछाप
उपभोक्ता संरक्षण परिषद के चेयरमैन जस्टिस केसी भार्गव ने बताया कि उपभोक्ता फोरम के पास आने वाले मामलों में ज्यादातर झोलाछापों के खिलाफ होते हैं।
वहीं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के अध्यक्ष डॉ. एए खान का कहना था कि सरकार की ओर से कार्रवाई नहीं होने से झोलाछापों पर नकेल नहीं कस पा रही है।
एक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मेरे यहां पर्चा बनाने वाले लड़के को अस्पताल के गलत अनुभव प्रमाण पत्र पर पटना से आरएमपी का सर्टिफिकेट मिल गया।
अब वह एक नर्सिंग होम और डिग्री कॉलेज चलाता है। हाल ही पता चला कि वह नेता भी बन गया। ऐसे ही लोग तरक्की कर रहे हैं।
मैंने मंत्री से इसके बारे में कहा तो उन्होंने मुझसे ही रजिस्ट्रेशन कराने के लिए बोल दिया। मैं जानना चाहता हूं कि एमडी करने के बाद अब कौनसा रजिस्ट्रेशन कराऊं?
बीमा कंपनियों ने उपभोक्ताओं के हितों को ताक पर रखा
जस्टिस वीरेंद्र सिंह ने उपभोक्ता मामले में नए ट्रेंड के बारे में बताते हुए कहा कि बीमा कंपनियां उपभोक्ताओं के हितों को ताक पर रखे हुए हैं।
क्लेम राशि अदा करने से बचने के लिए पॉलिसी खरीद के समय तथ्य छिपाए जाने की बात कही जाती है। मेरा उनसे कहना है कि क्या ऐसा हर बार हो जाता है।
10-20 साल सुप्रीम कोर्ट तक केस चलता है। हालांकि अंत में डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर कोर्ट के आदेश को ही बहाल कर दिया जाता है।
ब्याज सहित पैसा भी अदा करना करना पड़ता है, लेकिन कंज्यूमर को क्या इससे फायदा हुआ? बीमा कंपनियों को सुझाव देते हुए उन्होंने कहा कि खुद उन्हें स्थानीय स्तर पर ही मामले सुलझाने चाहिए।