{"_id":"61ab724054dac90c702c5939","slug":"five-times-mla-narendra-singh-interview","type":"story","status":"publish","title_hn":"यूपी चुनाव 2022: 90 वर्षीय पूर्व विधायक बोले, 'विडंबना ही है कि हम आज भी मुद्दों पर नहीं जाति-धर्म पर वोट दे रहे'","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यूपी चुनाव 2022: 90 वर्षीय पूर्व विधायक बोले, 'विडंबना ही है कि हम आज भी मुद्दों पर नहीं जाति-धर्म पर वोट दे रहे'
Sat, 04 Dec 2021 07:20 PM IST
ishwar ashish
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Sat, 04 Dec 2021 07:20 PM IST
सार
छपरौली से पांच बार विधायक रह चुके एडवोकेट नरेंद्र सिंह का कहना है कि पहले लोग न पार्टी बदलते थे और न ही विचार, अब तो सुबह से शाम भर में कौन किस दल में चला जाए, पता नहीं। उन्होंने वर्तमान राजनीति पर अपने विचार व्यक्त किए।
विज्ञापन
एडवोकेट नरेंद्र सिंह
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह एवं उनके परिवार का अभेद्य दुर्ग रहा है छपरौली। यहां से पांच बार विधायक रह चुके एडवोकेट नरेंद्र सिंह अब 90 साल के हो चले हैं। सियासत की दुनिया का उन्हें एक लंबा तजुर्बा है। सियासत में आ रहे बदलावों को लेकर सवाल उठते ही वह कहते हैं-जमाना बहुत बदल गया। नीतियां बदल गईं। सिद्धांत बदल गए। नहीं बदले तो सिर्फ हम और आप। विडंबना है कि आज भी लोग जाति-धर्म के नाम पर वोट करते हैं। पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...
विज्ञापन
सवाल- आप अधिवक्ता थे, फिर राजनीति में कैसे आ गए?
जवाब- मेरा मूल गांव किरठल है। एक बार पास के गांव तुगाना में चौधरी चरण सिंह आए थे तो उनका बेहद प्रभाव पड़ा। वकालत पूरी करने के बाद मेरठ कचहरी में प्रैक्टिस शुरू कर दी। वर्ष 1971 में ऐसा दौर आया जब सरकार का विरोध करने पर किसानों पर ताबड़तोड़ मुकदमे होने लगे। 1977 तक यह सिलसिला चला। मैंने कई वकीलों को जोड़कर एक ग्रुप बनाया जो मेरठ ही नहीं, बल्कि आसपास के सभी जिलों में इन किसानों से बिना फीस लिए ही मुकदमे लड़ते। इससे चौधरी चरण सिंह प्रभावित हो गए और वर्ष 1977 में उन्होंने मुझे बुलाकर छपरौली से चुनाव लड़ा दिया।
विज्ञापन
सवाल- यूपी में चुनाव आ रहा है। सभी के दावों पर क्या कहना चाहेंगे?
जवाब- देखिए, चुनाव तो हर पांच साल में या कई बार उससे पहले भी होता ही है। पर, अहम यह है कि मुद्दों पर बात ही नहीं हो रही है। हम अंग्रेजों के लंबे समय तक इसीलिए ही गुलाम रहे, क्योंकि हम जाति-धर्म में बंटे रहे। दुर्भाग्य है कि आज भी हम वोट जाति-धर्म के नाम पर ही दे रहे हैं और पार्टियां भी इसी पर ज्यादा फोकस कर रही हैं।
विज्ञापन
सवाल- आपका तो लंबा तजुर्बा है। आज क्या राजनीतिक बदलाव देखते हैं?
जवाब- बहुत बदलाव हुआ है। पहले लोग न पार्टी बदलते थे और न विचार। अब तो सुबह से शाम होते-होते कौन किस दल में चला जाए, पता नहीं। इसी तरह से सिद्धांतों के कोई खास मायने अब नहीं हैं। लेकिन सिद्धांतों की ओर लौटना ही होगा। बदलाव तो जरूर आएगा।
सवाल- रालोद भी तो अलग-अलग दलों से गठबंधन करता ही रहा है?
जवाब- बात किसी एक दल की है ही नहीं। बात पूरे परिदृश्य की है। सभी दल अपना-अपना लाभ देख रहे हैं। यह जरूर कहूंगा कि रालोद अब भी चौधरी चरण सिंह की नीतियों पर चलने की कोशिश कर रहा है। बाकी दलों में भी ऐसे लोग हैं जो सिद्धांतों की राजनीति करना चाहते हैं। पर, वे गिने चुने ही रह गए हैं। उस पर भी बेचारे अलग-थलग पड़े हैं।
सवाल- किसान आंदोलन कर रहे हैं। सरकार के रुख पर क्या कहेंगे और चुनाव में इसका कितना असर पड़ेगा?
जवाब- किसानों को अपनी बात कहने का अधिकार है। सरकार ने सुनी, यह और बढ़िया बात है। पर, किस स्तर तक सुनी और कितनी सुनी, कितने समय में सुनी, इसका मंथन कर किसानों को भी उचित निर्णय लेना चाहिए।
सवाल- भाजपा की केंद्र और राज्य दोनों में सरकारें हैं। क्या इससे प्रदेश का ज्यादा विकास हुआ?
जवाब- पार्टी जब सत्ता में आकर सरकार बनाती है तो वह सबकी हो जाती है। उसका काम है कि सभी को साथ लेकर चले। विडंबना यह है कि गरीब, किसान और मध्य वर्ग देश और प्रदेश में वास्तव में परेशान हैं। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।
सवाल- आज टिकट के लिए उम्मीदवार बड़ी मशक्कत करते हैं। आपके जमाने में कैसे टिकट मिलता था?
जवाब- उस दौर में काम करने वाले उम्मीदवारों को ही टिकट मिलता था। पार्टी के नेता खुद बुलाकर टिकट देते थे। मैं 1977 में पहली बार छपरौली से लड़ा और जीता। वर्ष 1980,1988, 1989 और 1993 में चुनाव जीता। अधिकतर बार टिकट के लिए कहना ही नहीं पड़ा। वर्ष 1985 के चुनाव में चौधरी चरण सिंह की सुपुत्री सरोज वर्मा को टिकट दिया गया और वह छपरौली से जीत गईं। दुर्भाग्य रहा कि उनका निधन हो गया। यहां 1988 में उपचुनाव हुआ तो फिर से मुझे ही इस परिवार ने टिकट दिया और मैं जीत गया। अब तो टिकट पाने के भी लाख जुगाड़ हैं। हालांकि, इस समय भी कुछ नेता सही कार्यकर्ताओं को टिकट देते हैं।