पांच लोगों ने रखी अयोध्या आंदोलन की नींव, महंत दिग्विजय नाथ व परमहंस के अलावा ये थे शामिल
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अयोध्या के जिस श्रीराम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर विश्व हिंदू परिषद ने देश भर में सांस्कृतिक चेतना का आंदोलन खड़ा किया तथा अभी हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया उसकी पूरी पटकथा 22-23 दिसंबर 1949 को पांच लोगों ने रची थी। वैसे तो 1528 में जब अयोध्या के इस स्थल को तोड़कर मस्जिद बनाई गई तो 1949 तक हिंदुओं ने इस स्थल की मुक्ति के लिए 76 युद्ध लड़े।
पर, यह सभी संघर्ष सशस्त्र हुए। जिनमें कई लोग मारे गये। पर, जिस आंदोलन की परिणिति परिणाम तक पहुंची उसकी रूपरेखा बनाने वाले पांच प्रमुख किरदार थे। जिनमें चार साधु थे । इन्होंने हिंदुओं की तरफ से सशस्त्र संघर्ष की जगह जन आंदोलन की नींव रखी। इनकी मंशा सांस्कृतिक पुनर्जागरण की थी जिससे भविष्य में कोई संस्कृति पर प्रहार न कर सके।
दरअसल, आस्ट्रिया के पादरी ने 1740-1785 तक 45 वर्ष के भारत भ्रमण वृतांत में लगभग 50 पृष्ठों में अयोध्या का वर्णन किया। डायरी में लिखा कि रामकोट में गुंबदों वाला ढांचा है, जिसमें 14 काले कसौटी के पत्थर के खंभे लगे हैं इसी स्थान पर भगवान श्रीराम ने अपने तीन भाइयों के साथ जन्म लिया। इस स्थान पर बने मंदिर को बाबर ने तुड़वाया।
अभिलेखों से पता चलता है कि इन पांच लोगों को इस स्थान पर कसौटी के पत्थर देखकर और इतिहास सुनकर रोष व क्षोभ तो पहले भी होता था लेकिन पादरी की डायरी पढ़कर इन पांचों के दिल व दिमाग में इस स्थल की मुक्ति के सहारे लोगों में हिंदुत्व की चेतना पैदा करने की बात आई। जिसके लिए रणनीतिक तरीके से जनांदोलन चलाने पर सहमति बनी।
इन लोगों ने की आंदोलन की शुरुआत
वरिष्ठ पत्रकार और वर्ष 1983 के बाद संघ की देखरेख में इस आंदोलन को नए तेवर देने वाले रणनीतिकारों के नजदीक रहे वरिष्ठ पत्रकार सर्वेश सिंह के अनुसार गोरखपुर पीठ के महंत दिग्विजय नाथ, महंत अभिराम दास, बाबा राघव दास, रामचंद्र परमहंस और हनुमान प्रसाद पोद्दार ने 22-23 दिसंबर 1949 की रात संबंधित स्थल पर बाल स्वरूप श्रीराम की मूर्ति की स्थापना की।
इससे पहले पांचों लोगों ने रात में सरयू में स्नान किया और मूर्ति की पूजा कर प्राण प्रतिष्ठा की। हनुमान प्रसाद पोद्दार वही थे जिन्होंने धार्मिक ग्रंथों को सरल और सस्ते दामों में आम लोगों तक पहुंचाकर देश और प्रदेश में हिंदू संस्कृति के पुनर्जागरण को गीता प्रेस गोऱखपुर की स्थापना की। बहरहाल जिस समय यह घटना घटी तो के.के. नैयर फैजाबाद के जिलाधिकारी और सिटी मजिस्ट्रेट थे ठाकुर गुरुदत्त सिंह।
मुस्लिम पक्ष ने विरोध किया तो विवाद बढ़ गया। इसी के बाद नैयर और गुरुदत्त ने इस स्थान को कुर्क कर लिया। पर, शायद इन पांच रणनीतिकारों की योजना का कुछ हिस्सा बाकी था। गोपाल सिंह विशारद और रामचंद्र परमहंस ने फैजाबाद के सिविल जज के यहां मुकदमा कर मांग की कि दूसरे पक्ष को हिंदुओं की पूजा-अर्चना में बाधा डालने से रोका जाए। न्यायालय ने यह आदेश पारित कर दिया।
इस तरह चला 1983 तक जनजागरण
पांचों रणनीतिकारों ने इस आंदोलन के सहारे लोगों का जनजागरण करने के लिए न सिर्फ संबंधित स्थल पर कीर्तन शुरू कराया बल्कि मंदिर तोड़ने के पूरे घटनाक्रम की किताब छपवाई, जो लोगों को बांटी जाती थी। साथ ही इन पांचों लोगों की तरफ से जगह-जगह सभाएं करके लोगों को जगाने की कोशिश की गई।
पर, केरल में बड़े धर्म परिवर्तन के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ध्यान भी इन पांच लोगों की तरफ से शुरू कराए गये काम की तरफ गया। कांग्रेस के भी कुछ नेताओं ने साथ दिया और हिंदुत्व की चेतना पर व्यापक तरीके से काम करने की रणनीति पर काम शुरू हो गया।
आंदोलन के मुख्य शिल्पकार अशोक सिंहल कहते भी थे कि यह आंदोलन सिर्फ मंदिर निर्माण का नहीं बल्कि हिंदुत्व की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का है। जिसे पांच विभूतियों ने शुरू किया था ताकि फिर कभी कोई हमारे संस्कृति की पहचान पर प्रहार न कर सके।