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कोरोना की दहशत की चौखट से अब बाहर निकली जिंदगी

Thu, 11 Mar 2021 02:13 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Thu, 11 Mar 2021 02:13 AM IST
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First case of corona found one year before
आज से ठीक एक साल पहले कोरोना का पहला मामला आया था सामने। - फोटो : ??? ?????
कोरोना ने सालभर में तमाम लोगों की जिंदगी में तूफान ला दिया। वायरस की चपेट में आने से कहीं पूरा परिवार घर में ताला बंद कर अस्पताल पहुंच गया तो कई लोगों का रोजगार छूट गया।
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तबाही का ऐसा मंजर कि अब भी याद कर लोग सिहर उठते हैं। अब वायरस का असर कम हुआ है तो लोग दहशत की चौखट लांघकर फिर से उठ खड़े होने की कवायद में जुट गए हैं।
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राजधानी में अब तक करीब 82 हजार लोग कोरोना की चपेट में आ चुके हैं। करीब 1187 लोग जान गंवा चुके हैं। अब वायरस की चेन कमजोर हुई है तो दहशत भी घटी है।
राजधानी में कोरोना की पुष्टि 12 मार्च 2020 को कनाडा से लौटने वाली डॉक्टर की रिपोर्ट से हुई। इस दौरान दो अप्रैल को 12 जमाती पॉजिटिव मिले, लेकिन शहर में दहशत तब फैली जब 15 अप्रैल को 31 लोग पॉजिटिव आ गए।
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इसमें 28 सदर बाजार के निवासी थे। इनमें एक ही परिवार के आठ लोग थे। सभी को अस्पताल में भर्ती कराने से इनके घर में ताला लग गया। दुकान बंद हो गई।
करीब 15 दिन बाद पूरा परिवार निगेटिव होकर घर लौटा तब तक शहर में लॉकडाउन हो चुका था। अब यह परिवार एक बार फिर उठ खड़े होने की तैयारी में है।
इस परिवार के सदस्य पंकज बताते हैं कि उस दौर की याद आते ही सिहरन पैदा हो जाती है। इसी तरह ऐशबाग सब्जी मंडी निवासी इस्लामुद्दीन का परिवार में पति-पत्नी के साथ दोनों बच्चों व तीन अन्य सदस्य भी वायरस की चपेट में आ गए।
अब ठीक होने के बाद फिर से रोजगार की तैयारी में हैं। इसी तरह तमाम ऐसे परिवार हैं जो कोरोना काल में तबाही का मंजर झेलने के बाद फिर से उठ खड़े होने की कवायद में हैं।
राजधानी की पहली मरीज
राजधानी में कोरोना की पहली मरीज गोमती नगर की महिला डाक्टर रहीं। वह आठ मार्च को कनाडा से लौटीं और लक्षण मिलने पर 11 मार्च को केजीएमयू में भर्ती हुईं। केजीएमयू के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. डी हिमांशु के नेतृत्व में 11 चिकित्सकों व चिकित्सा कर्मियों की टीम गठित की गई। जांच में अगले दिन महिला डॉक्टर कोरोना पॉजिटिव मिलीं। उन्हें 22 मार्च को अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया। इसके बाद उनके भाई, सास-श्वसुर के साथ ढाई साल का बेटा भी पॉजिटिव मिला। ये सभी कोरोना को मात देने में सफल रहे।
पहली बार संक्रमित डॉक्टर
कनाडा से लौटी महिला डॉक्टर का इलाज करने के लिए बनी पहली टीम के सदस्य मेडिसिन विभाग के रेजिडेंट डॉ. तौसीफ भी सात अप्रैल को संक्रमित हो गए। इससे चिकित्सा क्षेत्र में हलचल मच गई। दो दिन बाद रेजिडेंट डॉक्टर के तीन रिश्तेदार भी पॉजिटिव मिले। इस तरह वक्त के साथ मरीजों की संख्या बढ़ी। एक के बाद एक चिकित्सक, चिकित्साकर्मी भी वायरस की चपेट में आते रहे। अब तक राजधानी के तीनों चिकित्सा संस्थानों को मिलाकर 10 हजार से ज्यादा चिकित्सक व स्टाफ वायरस की चपेट में आ चुके हैं।
नवजात निकला कोरोना पॉजिटिव
डालीगंज निवासी गर्भवती महिला को गंभीरावस्था में क्वीन मेरी में भर्ती कराया गया। रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आने पर उसे संक्रामक रोग की आईसीयू में भर्ती किया गया। इस बीच प्रसव पीड़ा शुरू होने पर आईसीयू की जिम्मेदारी रेस्पेरेटरी मेडिसिन विभाग के डॉ. अजय वर्मा महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. मोना को बुलाकर सामान्य प्रसव कराया। इस दौरान जांच हुई तो नवजात कोरोना पॉजिटिव निकला।
राजधानी में पहली मौत
राजधानी में पहली मौत नजीराबाद निवासी वृद्ध की हुई। जमातियों के विभिन्न स्थानोें पर पॉजिटिव पाए जाने के बाद इस वृद्ध को 13 अप्रैल को केजीएमयू में भर्ती कराया गया। 15 अप्रैल को इनकी मौत हो गई। अब तक राजधानी में मौत का आंकड़ा 1187 पहुंच गया है।
जान गंवाने वाले पहले चिकित्सक
उरई के डॉ. सुनील अग्रवाल पहले चिकित्सक रहे, जिन्हें कोरोना के चलते जान गंवानी पड़ी। वह 25 अप्रैल को अस्पताल में भर्ती हुए। तमाम प्रयासों के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका।
सबसे ज्यादा दिन तक रही पॉजिटिव
एरा मेडिकल कॉलेज में भर्ती अंतिम कोरोना मरीज को 20 फरवरी को डिस्चार्ज किया गया। वह कॉलेज में सबसे लंबे समय 37 दिन तक भर्ती रही। इस दौरान उनकी 12 बार आरटीपीसीआर जांच हुई। इस मरीज की विदाई के साथ कॉलेज को कोरोना मरीज मुफ्त घोषित किया गया। राजधानी निवासी 65 वर्षीय अंजुम फातिमा को 14 जनवरी 2021 को एरा मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया था। वह बीपी, शुगर और हृदय रोग से भी ग्रसित थीं। करीब 10 दिन तक आईसीयू में रहने के साथ वह कुल 37 दिनों तक एरा में भर्ती रहीं। 20 फरवरी को अंतिम मरीज के रूप में उन्हें डिस्चार्ज किया गया। इसके बाद कॉलेज को कोरोना मरीज मुक्त घोषित कर दिया गया।
सर्वाधिक उम्रदराज मरीज
राजधानी की 91 साल की वृद्धा भी कोरोना को मात देने में सफल रही। वह 30 अप्रैल को पॉजिटिव मिली और 24 मई को रिपोर्ट निगेटिव आने पर डिस्चार्ज कर दी गई। उनका बेटा व बहू दोनों डॉक्टर हैं। वृद्धा को एसजीपीजीआई में भर्ती कराया गया था।
ऐसा संकट... कई चिकित्सकों को गंवानी पड़ी जान
आम आदमी के जीवन पर संकट होता है तो वह डॉक्टर के पास जाता है। लेकिन कोरोना में ऐसा संकट आया कि दूसरों की जिंदगी बचाने वाले कई चिकित्सकों व चिकित्साकर्मियों को भी जान गंवानी पड़ी। इसमें से कुछ कोरोना ड्यूटी करते समय वायरस की चपेट में आए तो कुछ अन्य कारणों से संक्रमित हुए।
15 जुलाई को बाल रोग विशेषज्ञ की मौत
कोरोना से पीड़ित डफरिन हॉस्पिटल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर अजीजुद्दीन की 15 जुलाई को मौत हो गई। वह 20 दिन एसजीपीजीआई में भर्ती रहे। लेकिन फेफड़े में गंभीर संक्रमण के चलते उन्हें बचाया नहीं जा सका।
वायरस से ताउम्र संघर्ष करने वाले डॉ. ढोल कोरोना से हारे
एसजीपीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. टी एन ढोल चार सितंबर को कोरोना की चपेट में आए और 23 सितंबर पीजीआई के कोविड अस्पताल में उनकी मौत हो गई। वह देश के प्रसिद्ध वायरोलॉजिस्ट थे।
केजीएमयू की नर्सिंग ऑफिसर की गई जान
केजीएमयू के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की सीनियर नर्सिंग ऑफिसर आशा धूसिया 19 सितंबर को कोरोना की चपेट में आईं और 21 सितंबर को जिंदगी की जंग हार गईं। केजीएमयू में इलाज के दौरान उन्हें बचाया नहीं जा सका।
बलरामपुर अस्पताल के पूर्व निदेशक ने तोड़ा दम
अस्पताल के पूर्व निदेशक डॉ. एमजे असलम की 12 दिसंबर को कोरोना से लड़ते हुए मौत हो गई। वह 20 दिन पहले वायरस की चपेट में आए थे। उन्हें एरा मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गय था।
रेड क्रॉस सोसाइटी के सचिव ने गंवाई जान
बलरामपुर अस्पताल के पूर्व निदेशक व यूपी रेडक्रॉस सोसाइटी के जनरल सेक्रेटरी डॉ. राम स्वरूप भी कोरोना का शिकार हो गए। उन्हें एक जून को बुखार आने पर जीपीजीआई में भर्ती कराया गया। पांच जून को उनकी मौत हो गई।
दहशत के माहौल में संभाल मोर्चा, मिला इनाम
राजधानी में जिस वक्त कोरोना को लेकर चिकित्सकों तक में दहशत का माहौल था, उस वक्त केजीएमयू मेडिसिन विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. डी हिमांशु ने मोर्चा संभाला। बाद में जब मरीजों की संख्या कम हुई तो उन्हें उनकी मेहनत का इनाम भी मिला। यूनिवर्सिटी में तमाम वरिष्ठ प्रोफेसरों के होने के बाद भी कुलपति लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. बिपिन पुरी ने उन्हें चिकित्सा अधीक्षक जैसे महत्वपूर्ण पद से नवाजा है।
वायरस बढ़ा तो बदली इलाज की व्यवस्था
राजधानी में कोरोना मरीजों की संख्या बढ़ने के बाद लॉकडाउन से सप्ताहभर पहले ओपीडी बंद होनी शुरू हो गईं। एक दौर ऐसा भी आया कि इमरजेंसी में भी इलाज मिलना मुश्किल हो गया। ऐसे में ऑनलाइन चिकित्सा की शुरुआत हुई। टेलीमेडिसिन और फिर ऑनलाइन पंजीयन के जरिये इलाज शुरू किया गया। अब इसी महीने से ओपीडी शुरू हो गई है, लेकि न हृदय रोग सहित विभिन्न विभागों में सर्जरी का इंतजार करने वाले मरीज अब भी परेशान हैं।
डेडिकेटेड कोविड हॉस्पिटल से बढ़े संसाधन
राजधानी में एपेक्स ट्रॉमा सेंटर को बंद कर डेडिकेटेड कोविड हॉस्पिटल बना दिया गया। इसी तरह केजीएमयू के लिंब सेंटर के पांच विभागों को शिफ्ट कर इसे कोविड हॉस्पिटल में बदला गया। लोहिया संस्थान के मातृ शिशु रेफरल केंद्र को भी कोविड हॉस्पिटल बनाया गया। अब इन तीनों अस्पतालों को फिर से मूल स्वरूप में बदलने की कवायद है। हालांकि इस दौरान तीनों चिकित्सा संस्थानों को करीब 150 वेंटिलेटर और इतनी ही ऑक्सीजन फ्लो मशीन सहित अन्य सुविधाएं मिली हैं। ऐसे में यहां भविष्य की तस्वीर खुशनुमा दिख रही है।
वक्त से साथ मजबूत होते गए हाथ
कोरोना की दस्तक के समय चिकित्सक खाली हाथ थे, लेकिन वक्त के साथ एक के बाद एक नई दवाएं आ गई हैं। अब स्थिति यह है कि चिकित्सा विशेषज्ञ कोरोना पीड़ितों के इलाज में माहिर हो गए हैं। शुरुआत में डॉक्टर बुखार और जुकाम की दवाओं से ही काम चला रहे थे। इसके बाद हाइड्रोक्सी क्लोरोक्विन दी गई। इसके बाद एजिथ्रोमाइसिन पर प्रयोग हुआ। इसी बीच बीसीजी के टीके पर भी ट्रायल हुआ। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि इसका परिणाम सकारात्मक आया है। हालांकि यह प्रयोग पूरे देश में हुआ। ऐसे में अभी इसका मूल्यांकन चल रहा है। इसी तरह च्यवनप्राश से भी इम्यूनिटी बढ़ाने के परिणाम सामने आए। फेफड़े में फाइब्रोसिस रोकने की भी कई दवाएं आ गई हैं। कोरोना ने सालभर के अंदर मास्क, सैनिटाइजर सहित अन्य का बाजार खड़ा कर दिया है।
प्लाज्मा थेरेपी की हुई शुरुआत
उरई के डॉ. सुनील अग्रवाल की हालत गंभीर होने पर 26 अप्रैल को उन्हें प्लाज्मा थेरेपी दी गई, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। बाद में आईसीएमआर ने भी माना कि प्लाज्मा थेरेपी कोरोना से जान बचाने में कारगर नहीं है। हालांकि, इसके बाद राजधानी के साथ ही प्रदेश के 19 मेडिकल कॉलेजों में बैंक की स्थापना की गई है। सर्पदंश और लिवर के मरीजों में प्लाज्मा थेरेपी कारगर पाई गई है।

कोरोना के जरिये आयुर्वेद का पुनर्जागरण
कोरोना आयुर्वेद का पुनर्जागरण लेकर आया। घर में मौजूद मसाले हेल्थ सप्लीमेंट के रूप में प्रयोग किए जाने लगे। राजधानी के दवा कारोबारियों के मुताबिक सालभर में आयुर्वेद का दवा बाजार करीब 50 फीसदी तक बढ़ा है। हालांकि लोगों के बाहर कम निकलने की वजह से अन्य दवाओं की बिक्री प्रभावित हुई है। सिर्फ इम्यूनिटी बूस्टर की ही मांग ज्यादा रही।
अब तक की स्थिति
18 लाख लोगों की हो चुकी है जांच
82 हजार से ज्यादा मिल चुके पॉजिटिव
1187 की हो चुकी है मौत
क्या कहते हैं आकड़ें
- राजधानी में 12 मार्च को कनाडा से लौटी महिला चिकित्सक की रिपोर्ट पॉजिटिव आई।
- 20 मार्च को पार्श्व गायिका कनिका कपूर की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद मची हलचल।
- दो अप्रैल को पहली बार दहाई में मिले मरीज। 12 मरीज थे, जो सहारनपुर के निवासी थे।
- 15 अप्रैल को एक साथ मिले 31 मरीज।
- 15 अप्रैल को नजीराबाद के वृद्ध के रूप में पहली बार किसी राजधानी निवासी की मौत।
- सात मई को राजधानी में एक साथ लिए गए 100 सैंपल।
18 सितंबर को सर्वाधिक 1244 मरीज एक साथ मिले। संक्रमण दर सर्वाधिक 15.32 फीसदी रही।
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