नेता से लेकर अभिनेता तक, यहां हर कोई हुआ फ्लॉप
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फीरोजाबाद यानी चूड़ियों का शहर। दुनिया भर में यहां के कांच उद्योग की चमक है लेकिन सुहागनगरी मायानगरी से आए राज बब्बर पर फिदा हो गई। उन्हें संसद भेजा।
अब जब चुनाव सामने है तो विश्लेषण चल रहा है। लोगों को लगता है कि ठगे गए। जैसे पोस्टर की लुभावनी सजावट से खिंचे कोई फिल्म देखने हॉल में बैठ गए और द एंड होने से पहले ही लगने लगा कि कहां फंस गए।
समस्याओं से बदरंग अपना कांच देख रहे फीरोजाबाद संसदीय क्षेत्र के मतदाता अपने को उसी फिल्म के दर्शक जैसा महसूस कर रहे हैं।
वह कुछ समय पहले अपने विवादित बयानों के कारण भी चर्चा में रहे।
गले लगाकर की बेवफाई
वर्ष 2009 के आम चुनाव में मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कन्नौज और फीरोजाबाद से जीते थे। बाद में उन्होंने फीरोजाबाद सीट छोड़ दी।
उपचुनाव में उनकी पत्नी डिंपल यादव को हरा कर राज बब्बर ने यह सीट जीती। 25 साल बाद कांग्रेस यहां लौटी जरूर लेकिन यह जीत राज बब्बर की थी।
फिल्मी ग्लैमर की चकाचौंध के बीच उपजी यह जीत वादों की बुनियाद पर खड़ी थी। उद्योगपति अजय सिंघल कहते हैं भी कि सपने दिखाकर राज बब्बर ने वोट लिया लेकिन पूरा होने के इंतजार में आंखें पथरा गईं।
राज बब्बर की जीत और डिंपल की हार सैफई परिवार को बड़ा सदमा दे गई। अमर सिंह से लेकर कल्याण सिंह तक को सपा ने इस पराजय के बाद ही अलग किया।
नहीं लगी चिप्स फैक्टरी
शीतगृह मालिक गोपाल सिंह को ठीक से याद है कि राज बब्बर ने सिरसागंज में आलू से जुड़ा प्रोजेक्ट (चिप्स फैक्टरी) लगवाने की घोषणा की थी ताकि आलू किसानों को उपज का अच्छा मूल्य मिले पर केंद्र सरकार की घोषणा के बाद भी फैक्ट्री न खुली।
रिटायर्ड शिक्षक राम रक्षपाल सिंह को जसराना में रेल लाइन बिछवाने का सांसद का वादा पूरा नहीं होना खलता है।
गांव नारखी और नारखी तालुका, गढ़ई अफऊ, मिल्क, गोथुआ आदि गांवों के लोग चार किलोमीटर तक दूर लगे नलकूपों से पानी लाते हैं।
बनी हुई है पानी की किल्लत
वह वादा ही रहा, नया चुनाव आ गया। इलाका अब भी पानी संकट से जूझ रहा है। इस संसदीय सीट ने जिसको पसंद किया उसे बार-बार लोकसभा भेजा।
रामजीलाल सुमन यहां से चार बार संसद गए। प्रभुदयाल कठेरिया तीन बार भाजपा से जीते। अभी इस सीट पर खाता नहीं खोल पाई बसपा अब तक दो उम्मीदवार बदल चुकी है।
राज बब्बर वैसे तो यहीं से चुनाव लड़ने की बात कहते रहे लेकिन ऐन वक्त गाजियाबाद चले गए और वहां से चुनाव लड़ रहे हैं।
तीन जिलों में बंटी थी यह सीट
25 लाख की आबादी वाला फीरोजाबाद संसदीय क्षेत्र पहले तीन जिलों में बंटा था। जसराना विधानसभा क्षेत्र मैनपुरी लोकसभा सीट का हिस्सा था।
टूंडला विधानसभा क्षेत्र जलेसर में था। शिकोहाबाद और फीरोजाबाद विधानसभा क्षेत्र के साथ संसदीय सीट में आगरा की बाह और फतेहाबाद क्षेत्र भी जुड़ता था।
सीट आरक्षित हुआ करती थी। परिसीमन में सामान्य हुई और सिरसागंज नई विधानसभा सीट बनी। जसराना और टूंडला को फीरोजाबाद से जोड़ा गया।
सांसद आते जाते गये पर फीरोजाबाद के लोगों को कोई खास फायदा नहीं हुआ।
सपा से युवा अक्षय तो भाजपा से अनुभवी बघेल
अक्षय यादव सपा के राष्ट्रीय महासचिव एवं सांसद रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय सबसे युवा प्रत्याशी हैं। उनका यह पहला चुनाव। सपा ने डेढ़ साल पहले ही उनकी उम्मीदवारी घोषित कर दी थी।
अक्षय विकास कार्यों को मुद्दा बना रहे हैं। यादव और मुस्लिम वोटों के साथ-साथ अन्य जातियों के वोट बैंक पर भरोसा है।
राजनीति के पुराने खिलाड़ी एसपी सिंह बघेल जलेसर लोकसभा क्षेत्र से तीन बार सांसद रह चुके हैं। वह तीन बार दल बदल चुके हैं।
सपा छोड़ कर 2009 का आम चुनाव मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ बसपा की टिकट पर लड़ा और उप चुनाव भी बसपा के टिकट पर लड़ा।
कांग्रेसी नेता का दावा भी है मजबूत
अतुल चतुर्वेदी खांटी कांग्रेसी परिवार से हैं। पिता अशोक चतुर्वेदी नगर पालिकाध्यक्ष रह चुके हैं। अतुल लंबे समय से कांग्रेसी की राजनीति कर रहे हैं।
भाई अभिनव चतुर्वेदी विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं। पेशे से उद्योगपति अतुल चतुर्वेदी कांग्रेस के एआईसीसी सदस्य हैं।
बसपा के विश्वदीप का यह पहला चुनाव है। उनके पिता ब्रजराज सिंह 1957 में सांसद चुने गए थे। उनके बाद कोई स्थानीय उम्मीदवार सांसद नहीं बना।
1957 के बाद कोई दूसरा स्थानीय सांसद न चुने जाने को चुनावी मुद्दा बना रखा है। सपा से नाराजगी और बसपा के वोट बैंक के साथ-साथ शहर में पैठ और स्वजातीय वोट बैंक का फायदा उठाने की कोशिश।
दिग्गजों के बीच नौसिखियों के कदम
वायु सेना में एयर वाइस मार्शल रहे राकेश यादव शिकोहाबाद भारौल के मूल निवासी हैं। दो बार राष्ट्रपति पदक से सम्मानित भी हो चुके हैं।
पिता एमपी यादव एके कॉलेज में प्राचार्य रह चुके हैं। राजनीति में यह पहला कदम है।
राकेश भ्रष्टाचार के खिलाफ बने जनमानस को भुनाने की कोशिश करेंगे। विकास के वादे के साथ हर वर्ग के मतदाताओं को लुभाने की कोशिश।
हालांकि देश में आम आदमी पार्टी के प्रति ठंडे होते लोगों के जोश से उन्हें क्या फायदा मिलेगा ये तो वक्त ही बताएगा।