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महेश भट्ट के बेबाक बोल, मुझे अपनी रूह बेचनी है तो आपको क्या?

Sat, 10 Sep 2016 05:33 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ Updated Sat, 10 Sep 2016 05:33 PM IST
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film director mahesh bhatt in lucknow
‌‌फिल्मकार महेश भट्ट व अ‌भ‌िनेत्री बरखा ब‌िष्ट - फोटो : amar ujala
प्रसिद्ध फिल्मकार महेश भट्ट छोटे परदे पर धारावाहिक ‘नामकरण’ लेकर आ रहे हैं। यह धारावाहिक एक बच्ची के बहाने पितृसत्तात्मक सत्ता को चुनौती देता है और सवाल उठाता है कि आखिर एक लड़की के लिए पिता या पति का नाम जुड़ना जरूरी क्यों है? यह एक ऐसे घर की कहानी है जहां पिता मौजूद नहीं, लेकिन उसकी छाया उपस्थित है। 
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भट्ट अपनी फिल्मों में भी ऐसी कहानियां उठाते रहे हैं। धारावाहिक में बच्ची का किरदार निभा रही आरशीन नामदार और उसकी मां की भूमिका करने वाली बरखा बिष्ट के साथ शुक्रवार को लखनऊ पहुंचे महेश भट्ट से ‘अमर उजाला’ ने  बातचीत की। पेश है प्रमुख अंश 
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आप छोटे परदे पर एक ऐसा धारावाहिक लेकर आ रहे हैं जो पुरुष प्रधान समाज को चुनौती देता है और उससे जुड़े सवाल उठाता है लेकिन इधर जो आप फिल्म बनाते हैं वह ‘जिस्म’, ‘राज’, ‘मर्डर’ होती हैं?
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- मैंने ‘आशिकी-दो’ भी बनाई है। ‘गैंगस्टर’ भी बनाई है, ‘सिटी लाइट’ भी बनाई है। 12 सितंबर को ‘नामकरण’ शुरू हो रहा है तो 16 सितंबर को ‘राज रिबूट’ भी आ रहा है। ये अलग-अलग धाराएं हैं। हर किस्म का इंसान है समाज में, हर तरह के अनुभव से वह गुजरना चाहता है। 

हम मनोरंजन के व्यवसाय से जुड़े हैं। हर तरह की फिल्में बनाते हैं। हां, आप ये जरूर पूछ सकते हैं कि मुझे किस तरह की फिल्में पसंद हैं? महेश भट्ट ने जो फिल्में बनाई हैं, वे हैं ‘अर्थ’, ‘सारांश’, ‘नाम’। 1998 में आई ‘जख्म’ मेरे द्वारा निर्देशित आखिरी फिल्म थी।

उसके बाद अगर रचनात्मकता से मैंने कोई काम किया है तो ये धारावाहिक ‘नामकरण’ है। कुछ चीजें हम बाजार की पसंद को ध्यान में रखकर बनाते हैं, कुछ चीजें हम अपनी पसंद के हिसाब से इस प्रकार बनाते हैं कि वह बाजार को भी पसंद आए।

समाज का सुधार करने नहीं आए है

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‌‌‌‌फिल्मकार महेश भट्ट व अभ‌िनेत्री बरखा बिष्ष्ट - फोटो : amar ujala

दोनों के बीच एक संतुलन जरूरी होता है?
-किसी फिल्मकार को एक ही रंग में बांधना उसके साथ नाइंसाफी है। मैंने ‘आशिकी’, ‘हम हैं राही प्यार के’, ‘सड़क’, ‘सर’ बनाई, सब अलग-अलग तरह का सिनेमा है। ये और बात है कि ‘जिस्म’ , ‘मर्डर’, ‘राज’ ने पैसा बहुत कमाया। इसे देखने वाले चांद या मंगल से आए हुए लोग तो थे नहीं। 

अगर महेश भट्ट भी बाजार के दबाव में काम करेंगे तो उनकी विशिष्ट पहचान क्यों हो? 
-हम समाज का सुधार करने के लिए इस माध्यम में नहीं आए हैं, शिक्षा देने नहीं आए हैं। हमें भी घर का खर्च निकालना है। मनोरंजन के व्यवसाय में जितना पैसा लगता है, उतना कमाना जरूरी है।  

क्या फिल्मों में रचनात्मक काम से पैसा नहीं कमाया जा सकता है?
-‘जख्म’ बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली, ‘सारांश’ भी नहीं चली थी। हमने ‘सिटी लाइट’ बनाई जिसमें राजकुमार राव थे, कमाल की फिल्म थी। वहीं, महज छह करोड़ में बनी फिल्म ‘जिस्म-2’ ने पहले दिन नौ करोड़ रुपये कमाए, जबकि ‘सिटी लाइट’ ने लाइफ लांग बिजनेस में केवल आठ करोड़ रुपये कमाए। 

 क्या फिल्मकारों को दर्शकों की पसंद परिमार्जित नहीं करनी चाहिए?
-हमने अपने घर का पैसा लगाकर ‘तमन्ना’, ‘जख्म’, ‘डैडी’ बनाई, लेकिन आप कहें कि एक ही रंग की फिल्म बनाएं, यह ठीक नहीं है। आम दर्शक ये नहीं कहता कि आप ‘सारांश’ मत बनाइए।

आपको ‘सारांश’ बनानी है तो बनाइए लेकिन हमको तो ‘सड़क’ देखनी है। आम आदमी को क्या यह तय करने का अधिकार नहीं है कि उसे किस तरह की फिल्म देखनी चाहिए, क्या इसे बुद्धिजीवी ही तय करेंगे।

लेकिन ऐसी फिल्मों को व्यावसायिक रूप से सफल कह सकते हैं, अच्छी फिल्म तो नहीं कहेंगे?
-यह कौन तय करेगा? मुझे ‘जिस्म’, ‘सड़क’, ‘मर्डर’, ‘अर्थ’ या ‘सारांश’ में कोई अंतर नहीं लगता है। मुझे जिस तरह के लोगों से बात करनी है, उसके स्तर पर उतरकर बात करनी होगी।

हम खानों में क्यों बंटवारा करें? मुझे आजादी तो दीजिए जो ‘सारांश’ बनाता है, वह ‘सड़क’ भी बनाता है। मुझे अपनी रूह बेचनी है, आपको क्या समस्या है? अगर आपको ईश्वर को पूजने का अधिकार है तो मुझे शैतान को पूजने का भी अधिकार तो दीजिए। इस देश में इतनी स्वतंत्रता तो है।

शूटिंग के दौरान पढ़ाई करने की छूट

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फिल्मकार महेश भट्ट व अभ‌िनेत्री बरखा ‌ब‌िष्ट - फोटो : amar ujala
निर्देशन में कब वापसी करेंगे? 
-खुद निर्देशन के बजाय मुझे नए लोगों की खोज, उन्हें आगे बढ़ाने में अधिक मजा आता है। वे निखरते हैं तो अच्छा लगता है।

आपके निजी जीवन में इधर काफी परेशानियां थीं, खासकर बेटे को लेकर?
-राजनीतिक षड्यंत्र होता है। एक आदमी जाता है पुलिस की मदद करने, लेकिन वह सेलिब्रेटी है तो उसका नाम लेकर चर्चा शुरू हो जाती है। वह तो गवाह था।

‘नामकरण’ क्या ‘जख्म’ का विस्तार है, वहां भी एक अकेली स्त्री थी?
-मेरी कई फिल्मों में ऐसा हुआ है। मैंने जो जिंदगी में जिया है, उसे ही फिल्मों में उतारता हूं। लैंडस्केप वही होते हैं, आंखें बदल जाती हैं। हां, धारावाहिकों में चरित्रों की जटिलताओं को दिखाने के अवसर अधिक होते हैं। जो चीजें आप ढाई घंटे की फिल्म में नहीं दिखा सकते, उसे धारावाहिक में दिखा सकते हैं। आज जीवन में ऐसी लड़कियों के कई उदाहरण हैं। नीना गुप्ता की बेटी ने अपनी मां का नाम लेकर पहचान बनाई है।

 क्या आप इसके निर्माता-निर्देशक हैं?
-नहीं, मैं इसका क्रिएटर हूं।
 
सेट पर ही पढ़ती हूं : आरशीन
धारावाहिक में मुख्य भूमिका निभाने वाली आरशीन बताती है कि उन्हें शूटिंग के दौरान पढ़ाई करने की छूट है। उन्हें पढ़ाने वहां शिक्षिका भी आती हैं।  
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